आतंक से लड़ने वाले अब तक के कानूनों को देखेंगे तो बहुत बेहतर लगेंगे NIA, UAPA विधेयक

By नीरज कुमार दुबे | Jul 27, 2019

नरेंद्र मोदी सरकार आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने की दिशा में अपने पहले ही कार्यकाल से प्रतिबद्ध दिखी और यही कारण रहा कि 2014 से पहले जहाँ देश में आतंकवादी घटनाओं का बोलबाला रहता था वहीं मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से सरकार की आतंकवाद के प्रति कठोर नीति का असर दिखा। जम्मू-कश्मीर को अपवाद मानें तो मोदी सरकार के शासन में देश आतंकवाद की घटनाओं से लगभग मुक्त रहा और सीमा पार आतंकवाद को भी लगातार मुँहतोड़ जवाब दिया गया। पिछले पांच साल के आंकड़े देखें तो मोदी सरकार के आने के बाद देश में आतंकवाद और उग्रवाद के मामलों में कमी आई है। नक्सलवाद भी केवल 60 जिलों तक सीमित रह गया है। यही कारण रहा कि हालिया लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी सरकार को पूरे अंक दिये और उसे 303 सीटों के साथ देश की सत्ता दोबारा सौंप दी।

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NIA और UAPA में संशोधन क्यों किये गये ?

 

नरेंद्र मोदी ने दोबारा सत्ता में आते ही संकेत दिये कि सरकार आतंकवाद और उसके पनाहगारों का पूरी तरह सफाया करने और जांच एजेंसियों को और ताकत देने के काम को आगे बढ़ायेगी। हाल ही में कुछ ऐसे कदम उठाये गये जिससे साफ हो गया कि मोदी सरकार देश को बाह्य और आंतरिक मोर्चों पर एकदम सुरक्षित कर देश के विकास की ओर ही ध्यान देने के प्रति कृतसंकल्प नजर आ रही है। इस दिशा में हालिया बड़े कदमों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से संबंधित विधेयक में संशोधन करके इसको जो अधिक अधिकार दिये गये हैं या फिर विधि विरूद्ध क्रियाकलाप निवारण संशोधन विधेयक 2019 (UAPA) को जो मंजूरी प्रदान की गयी है उसका उद्देश्य और भाव समझना चाहिए। आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए देश में कठोर से कठोर कानून की जरूरत है और UAPA कानून में संशोधन देश की सुरक्षा में लगी जांच एजेंसी को मजबूती प्रदान करने के साथ ही आतंकवादियों से हमारी एजेंसियों को चार कदम आगे रखेगा।

 

आतंक पर कांग्रेस का नरम रुख!

 

कांग्रेस आज एनआईए को और अधिकार देने तथा UAPA में लाये गये संशोधनों का विरोध कर रही है तो यह कोई नयी बात नहीं है क्योंकि आतंकवाद के प्रति उसकी नरम नीति बरसों पुरानी है और इसका खामियाजा इस देश ने बरसों तक भुगता है। जरा सन् 2004 को याद कीजिये। केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनते ही जो काम पहले किये गये थे उनमें आतंकवाद निरोधक कानून पोटा को हटाना था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद के दोनों सदनों की बैठक बुलाकर इस कानून को पास कराया था और इस कानून को खत्म करने का चुनावी वादा कांग्रेस ने किया था इसलिए मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही पोटा कानून को खत्म कर दिया गया। लेकिन इससे हुआ क्या? आतंकवादियों के हौसले बुलंद हुए। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि राज्यों के अलावा राजधानी दिल्ली तक अलग-अलग समयों पर विस्फोटों से दहली। आतंकवादियों के स्लीपर सेलों ने देश के विभिन्न राज्यों में अपने पाँव फैला लिये थे, केरल में चरमपंथी संगठनों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था और मनमोहन सिंह की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी नजर आ रही थी।

जरा POTA को समझिये

 

24 अक्टूबर 2001 को तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा लाया गया आतंकवाद निरोधक कानून पोटा इन उम्मीदों के साथ लाया गया था कि आतंक के साये में रह रहे घाटी के लोगों के साथ ही यह समूचे देशवासियों को भी राहत दिलाएगा। जो कांग्रेस 1985 में टाडा जैसे कानून को लागू कर चुकी थी वह पोटा को लेकर आक्रामक मुद्रा में आ गई और इसे पारित नहीं होने देने का हर संभव प्रयास किया लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर इसे पारित करा लिया। कांग्रेस चूँकि तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है इसलिए उसने आतंकवाद पर चोट करने के प्रयासों का सदैव विरोध किया। यही नहीं जो टाडा कानून उसने बनाया था उसे भी अपनी मौत मर जाने दिया। दरअसल मई 1985 में टाडा अधिनियम बनाया गया था और यह कानून मई 1995 तक लागू रहा और फिर इसकी अवधि समाप्त होने पर इसे खत्म हो जाने दिया गया। कांग्रेस को चूँकि 1996 के लोकसभा चुनावों का सामना करना था, इसलिए उसने टाडा कानून को अपनी मौत मर जाने दिया। टाडा कानून अपने कथित दुरुपयोग को लेकर काफी बदनाम रहा। कांग्रेस ने पोटा कानून जिस समय खत्म किया था उस समय देश में 'यूएसए-पैट्रियोट एक्ट' जैसे सख्त कानून की जरूरत थी जोकि 11 सितंबर की घटना के बाद अमेरिकी प्रशासन ने 26 अक्टूबर 2001 को बनाया था। इसका असर भी देखने को मिला, भले ही अमेरिका के आतंकवादियों के निशाने पर होने की कितनी ही खबरें आती हों लेकिन अमेरिका में 11 सितम्बर जैसी बड़ी घटना की हिमाकत करने की बात सोचना भी अब मुश्किल है। यही नहीं लंदन में 7 जुलाई 2005 को हुए आतंकवादी हमलों के बाद ब्रिटेन ने भी 30 मार्च 2006 को सख्त कानून 'टेररिज्म एक्ट-2006' बनाया। 2007 के कार बम हमलों को छोड़ दें तो ब्रिटेन में आतंकवादी घटनाओं की इक्का-दुक्का वारदातें ही सामने आई हैं। फिलीपीन्स ने भी आतंकवाद की वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर मिल रही चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए फरवरी 2007 में सख्त आतंकवाद निरोधक कानून बनाया जिसे 'ह्यूमन सिक्योरिटी एक्ट ऑफ 2007' के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा आस्ट्रेलिया में सत्तापक्ष और विपक्ष ने 2004 में आपस में सहयोग कर आतंकवाद निरोधी कानून बनाया। लेकिन अपने यहां कुछ राजनीतिक दलों को आतंकवाद से खतरा नहीं बल्कि अपने वोट बैंक के नाराज होने का खतरा ज्यादा रहता है।

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वो चेहरे याद हैं आपको?

 

याद कीजिये तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल के वह बयान जोकि उन्होंने हर आतंकवादी घटना के बाद दोहराये। उन बयानों में बड़ी बेबसी-सी नजर आती थी। आपको जनवरी 2009 का एक वाकया याद दिलाते हैं। तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम, जिन्होंने अपना पद संभालते ही जिस तेजी के साथ राष्ट्रीय जांच एजेंसी और आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कानून संसद से पारित कराकर यह संदेश देने का प्रयास किया था कि आतंकवाद की अब खैर नहीं। उन्होंने उक्त कार्यों को हुये महीना भर भी नहीं गुजरा कि कह दिया कि आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून के प्रावधानों पर पुनर्विचार के लिए वह तैयार हैं। उन्होंने यह बयान देकर सही नहीं किया क्योंकि इससे देश के सॉफ्ट स्टेट होने की धारणा एक बार फिर बलवती हुई थी। 2009 में तत्कालीन मंत्रिमंडल आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को लेकर एकराय नहीं था यह बात तब साबित हो गयी थी जब तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मुंबई हमला मामले में कहा था कि भारत ने अपनी ओर से पाकिस्तान को सबूत पेश कर दिये हैं और उसके जवाब का इंतजार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है जबकि तत्कालीन रक्षा मंत्री तब कह रहे थे कि भारत के पास सभी विकल्प खुले हैं।

इस अमेरिकी रिपोर्ट को भी देखिये

 

2009 ही वह वर्ष था जब पहली बार अमेरिका ने माना था कि भारत विश्व के सर्वाधिक आतंकवाद प्रभावित देशों में से एक है। हालांकि इसके साथ ही अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के अभियान की धीमी प्रक्रिया पर भी चिंता जताई थी। अमेरिकी विदेश विभाग की वार्षिक 'कंट्री रिपोर्ट्स ऑन टेरेरिज्म-2008' में कहा गया था कि मुंबई और देश भर में हुए ऐसे ही हमले बताते हैं कि आतंकियों को चंदे में मोटी रकम मिल रही है और वे आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध हैं। मुंबई हमलों को देश के सबसे खतरनाक हमले की उपमा देते हुए रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में स्थानीय और प्रदेश की पुलिस प्रशिक्षण के मामले में बहुत कमजोर है और सभी के बीच समन्वय की भारी कमी है। यह पूरी रिपोर्ट आप निम्न लिंक पर जाकर डाउनलोड कर सकते हैं- http://www.scribd.com/doc/11536774/Country-Reports-on-Terrorism-Report-२००८

 

विफल गृहमंत्री थे चिदम्बरम

 

उस समय अमेरिका जहाँ आतंकी हमलों को भारत के साम्प्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ने की साजिश और भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने की कार्रवाई बता रहा था तो तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने नई दिल्ली में राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और पुलिस महानिरीक्षकों के तीन दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कह दिया कि हाल ही में हुए कई बम विस्फोटों से ‘भगवा आतंकवाद’ का नया स्वरूप सामने आया है। चिदम्बरम ने यह बात कह कर साम्प्रदायिक सौहार्द्र कायम रखने के अपने ही सरकार के वादे को तोड़ने का प्रयास तो किया ही साथ ही आतंकवाद की मूल समस्या की ओर से आंखें भी फेर लीं।

 

 

बहरहाल, UAPA विधेयक की बात करें तो इस पर चर्चा की शुरूआत करते हुए कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा, ‘‘देश में यह बड़ा दुष्प्रचार किया जा रहा है कि कठोर कानून ही हर समस्या का समाधान है।’’ तिवारी ने टाडा और पोटा कानूनों का जिक्र करते हुए कहा कि इनके भी दुरुपयोग के मामले सामने आये और इनके लागू होने के बाद भी देश में आतंकी हमलों की बड़ी घटनाएं हुई हैं। बाद में इन्हें समाप्त कर दिया गया। यहाँ मनीष तिवारी को याद दिला देना जरूरी है कि जब दिसंबर 2008 में तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए जो दो विधेयक पेश किये थे उनका क्या प्रभाव रहा। आतंकवाद खत्म हुआ, कम हुआ या बढ़ गया, यह सबके सामने है। यूएपीए कानून भी सबसे पहले 1967 में कांग्रेस के समय में आया और इसके बाद तीन बार संशोधन कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान ही किया गया।

 

एनआईए को अधिक ताकतवर बनाया गया

 

गृहमंत्री अमित शाह ने सही कहा है कि पोटा को भंग किये जाने के बाद आतंकवाद इतना बढ़ा कि स्थिति काबू में नहीं रही और संप्रग सरकार को ही एनआईए को लाने का फैसला करना पड़ा। लेकिन बतौर गृहमंत्री चिदंबरम ने एनआईए का जो स्वरूप पेश किया था उसके तहत राष्ट्रीय जांच एजेंसी सभी तरह के आपराधिक मामलों की जांच नहीं कर सकती थी। एनआईए को देश में कहीं भी जांच करने और अपने मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें तो मिल गयीं थीं लेकिन चिदंबरम ने एनआईए को काम क्या सौंपे जरा यह भी देखने चाहिए। भगवा आतंकवाद का हौवा खड़ा करके एनआईए को ऐसे कामों में लगा दिया गया जिसके सुबूत और दोषी उसे ढूंढ़े नहीं मिलते थे और सालों तक मामले अदालतों में चक्कर लगाने के बाद खत्म हो जाते थे। एनआईए को जिस जोर-शोर से शुरू किया गया था उसकी सफलता की दर को देखें तो निराशा होगी। एनआईए ने अब तक 272 मामलों में प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की। इनमें 52 मामलों में फैसले आये और 46 में दोषसिद्धी हुई जबकि 99 मामलों में आरोपपत्र दाखिल हुआ।

 

 

लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में परिस्थितियां बदली हैं, उसने एनआईए को और मजबूत बनाने के लिए ‘राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण संशोधन विधेयक 2019’ को मंजूरी दिलाई जिसमें राष्ट्रीय जांच एजेंसी को भारत से बाहर भी किसी अनुसूचित अपराध के संबंध में मामले का पंजीकरण करने और जांच का निर्देश देने का प्रावधान किया गया है। प्रस्तावित विधेयक से एनआईए की जांच का दायरा बढ़ाया जा सकेगा और वह विदेशों में भी भारतीय एवं भारतीय परिसम्पत्तियों से जुड़े मामलों की जांच कर सकेगी जिसे आतंकवाद का निशाना बनाया गया हो। इसमें मानव तस्करी और साइबर अपराध से जुड़े विषयों की जांच का अधिकार देने की बात भी कही गई है। जहां तक एनआईए अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति का विषय है तो उस प्रक्रिया को सिर्फ सरल बनाया गया है क्योंकि कई बार देखने में आता था कि किसी जज का तबादला हो जाता है या पदोन्नति हो जाती है, तब सरकार को अधिसूचना जारी करनी पड़ती है और इस क्रम में दो तीन माह निकल जाते हैं। देखा जाये तो वर्तमान में एनआईए आतंकवाद से संबंधित मामलों के अन्वेषण और अभियोजन की प्रक्रिया में कई कठिनाइयों का सामना करता है। कुछ कानूनी कमजोरियों के कारण आतंकवाद से संबंधित मामलों के अन्वेषण और अभियोजन में एनआईए के सामने आने वाली कठिनाइयों पर काबू पाने के लिये ही मोदी सरकार ने अधिनियम में संशोधन किये हैं। अब एनआईए के महानिदेशक को संपत्ति की कुर्की का अनुमोदन मंजूर करने की शक्ति भी दे दी गयी है। अभी एक जांच अधिकारी को आतंकवाद से जुड़े किसी भी मामले में संपत्ति की कुर्की करने के लिए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) से अनुमति लेनी होती थी। इसके अलावा अब इंस्पेक्टर रैंक या उससे ऊपर के अधिकारी भी किसी मामले की जांच कर सकेंगे जबकि अभी तक किसी मामले की जांच डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस या असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस रैंक के अधिकारी को ही करने की अनुमति थी।

 

UAPA में संशोधन के बाद आतंकियों की अब खैर नहीं

 

बहरहाल, UAPA कानून को सशक्त इस कदर बना दिया गया है कि अब केंद्र सरकार किसी भी संगठन को आतंकी संगठन घोषित कर सकती है यदि वह आतंकवाद से संबंधित किसी भी तरह की गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है। यह विधेयक सरकार को यह भी अधिकार देता है कि वह किसी को व्यक्तिगत तौर पर भी आतंकवादी घोषित कर सकती है। मोदी सरकार ने शहरी माओवाद (अर्बन माओइज्म) के खिलाफ भी कड़ा रुख बरकरार रखा है जोकि सराहनीय है। इसी रुख के चलते मोदी सरकार-1 में उन शहरी माओवादियों के चेहरे सामने आये थे जो दुनिया को दिखाने के लिए कुछ और काम करते हैं और अंदर ही अंदर देश की जड़ें खोदने का काम करते हैं। यह शहरी माओवादी वैचारिक आंदोलन का चोला पहन कर लोगों को गुमराह करने का काम करते हैं। यकीनन इनके प्रति सभ्य समाज में कोई संवेदना नहीं होनी चाहिए। UAPA कानून में संशोधन लाना समय की जरूरत थी और इस बात को गृहमंत्री अमित शाह ने एक उदाहरण से समझाया भी। संशोधन विधेयक में आतंकी कार्यों में लिप्त व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने के प्रावधान का जिक्र करते हुए अमित शाह ने कहा कि आतंकवाद बंदूक से पैदा नहीं होता बल्कि उन्माद फैलाने वाले प्रचार से पैदा होता है। उन्होंने इस दौरान आतंकी मौलाना मसूद अजहर और यासिन भटकल का भी जिक्र किया और कहा कि ये बार-बार संगठन का नाम बदल रहे थे और कानून से बच रहे थे। ये लोग काफी वर्षों से रडार पर थे, उन्हें बहुत पहले ही पकड़ लिया जाता अगर उन्हें आतंकवादी घोषित कर दिया जाता। उम्मीद है आतंक के खिलाफ प्रहार के जो कदम उठाये गये हैं वह सार्थक सिद्ध होंगे और इस कानून की राह में कथित मानवाधिकारवादी कोई अड़चन नहीं पैदा करेंगे।

 

-नीरज कुमार दुबे

 

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