By नीरज कुमार दुबे | Mar 30, 2026
बिहार की राजनीति में आज एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हाल ही में राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद उनका यह कदम संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने कहीं ज्यादा गहरे हैं। इस फैसले ने बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को और तेज कर दिया है और माना जा रहा है कि राज्य में अब नए दौर की शुरुआत होने वाली है।
हम आपको बता दें कि उनका इस्तीफा विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने स्वीकार कर लिया। बताया गया कि जनता दल यूनाइटेड के सदस्य संजय कुमार सिंह द्वारा नीतीश कुमार का इस्तीफा पत्र सौंपा गया था। यह कदम उन नियमों के अनुरूप है जिनके तहत संसद सदस्य बनने पर राज्य विधानमंडल की सदस्यता छोड़नी होती है।
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना केवल पद परिवर्तन नहीं बल्कि बिहार की राजनीति में एक युग के समाप्त होने का संकेत माना जा रहा है। दो दशकों से अधिक समय तक राज्य की राजनीति के केंद्र में रहने वाले कुमार अब वापस राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने खुद कहा है कि वह हमेशा से राज्य विधानमंडल और संसद के दोनों सदनों में सेवा करना चाहते थे।
पिछले महीने पांच मार्च को उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ने का संकेत देते हुए राज्यसभा जाने का निर्णय सार्वजनिक किया था। उन्होंने अपने लंबे कार्यकाल के दौरान मिले जनसमर्थन के लिए जनता का आभार जताया और कहा कि उनकी सरकार ने विकास और सम्मान दिलाने का प्रयास किया।
नीतीश कुमार के इस कदम के बाद अब यह लगभग तय माना जा रहा है कि बिहार में अगला मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी से हो सकता है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की जीत के बाद भाजपा मजबूत स्थिति में है और पहली बार राज्य में अपना मुख्यमंत्री बना सकती है।
इस बदलाव के साथ ही लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के बीच दशकों पुरानी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का अध्याय भी लगभग समाप्त होता दिख रहा है। लालू यादव सक्रिय राजनीति से दूर हैं, जबकि तेजस्वी यादव विपक्ष का चेहरा बने हुए हैं।
इसी बीच, एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने बांकीपुर सीट से विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने भावुक संदेश के जरिए अपने समर्थकों को इस फैसले की जानकारी दी और कहा कि यह अंत नहीं बल्कि एक नई भूमिका की शुरुआत है। नितिन नबीन ने अपने दो दशक लंबे राजनीतिक सफर को याद करते हुए बताया कि कैसे वर्ष 2006 में पहली बार विधायक बनने के बाद उन्होंने लगातार पांच बार जनता का विश्वास जीता। उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास और जनता की समस्याओं को उठाने को अपनी प्राथमिकता बताया।
नितिन नबीन के इस्तीफे से अब यह भी साफ हो गया है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे। हम आपको बता दें कि एक दिन पहले उन्हें विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना था, लेकिन इस्तीफे में हुई देरी के कारण यह अटकलें लग रही थीं कि उन्हें राज्य की कमान सौंपी जा सकती है। अब उनके राज्यसभा जाने के साथ यह संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई है।
बिहार की राजनीति अब संक्रमण काल से गुजर रही है। एक तरफ नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर पर नई भूमिका निभाने जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य में नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हैं। भाजपा के पास मौका है कि वह पहली बार राज्य में अपने दम पर मुख्यमंत्री पद संभाले। माना जा रहा है कि वर्तमान में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपी जा सकती है जबकि नीतीश कुमार के बेटे को उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।
बहरहाल, आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि बिहार की कमान किसे सौंपी जाएगी, लेकिन इतना तय है कि राज्य की राजनीति में यह बदलाव लंबे समय तक प्रभाव डालने वाला है। नीतीश कुमार का सक्रिय राज्य राजनीति से हटना और नितिन नबीन का नया राजनीतिक सफर बिहार में नई शक्ति संतुलन की शुरुआत का संकेत है। देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है और आने वाले समय में यहां की राजनीतिक दिशा देश की राजनीति को भी प्रभावित कर सकती है।