By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 07, 2026
हॉकी अंपायरिंग को बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण कैरियर बताते हुए भारतीय दिग्गजों ने नीदरलैंड और बेल्जियम में 15अगस्त से शुरू हो रहे विश्व कप में करीब तीन दशक बाद एक भी भारतीय अंपायर नहीं होने पर निराशा जताते हुए कहा कि अंपायरों की संख्या बढाने की बजाय गुणवत्ता पर फोकस करना होगा। नीदरलैंड के यूट्रेक्ट में 1998 में हुए विश्वकप के बाद पहली बार टूर्नामेंट के अंपायरों या तकनीकी अधिकारियों में किसी भारतीय को जगह नहीं मिली है और सूची में यूरोपीय देशों का बोलबाला है। भारत के आरवी रघु प्रसाद (2010, 2014, 2018, 2023) , सतिंदर शर्मा (2002, 2006, 2010) , तरलोक सिंह भुल्लर (1994) और अमरजीत सिंह बावा (1990) विश्व कप में अंपायरिंग कर चुके हैं।
पुरूष वर्ग में छह एफआईएच पैनल के अंपायर हैं जिनमें से रघुप्रसाद पिछले साल रिटायर हो चुके हैं। वहीं महिला वर्ग में एफआईएच पैनल की चार अंपायर हैं। तकनीकी अधिकारियों में महिला वर्ग में इन्हीं चार श्रेणियों में 50 से अधिक नाम हैं लेकिन एफआईएच पैनल में सिर्फ दो अधिकारी रोहिणी बोपन्ना और सोनिया बाथला हैं।
पुरूष वर्ग में करीब 70 नाम हैं लेकिन एफआईएच पैनल के चार ही अधिकारी इसमें शामिल हैं। शर्मा ने कहा कि संख्या की बजाय गुणवत्ता पर फोकस करना जरूरी है और इसके लिये अंपायरों को अधिक एक्सपोजर देना होगा। उन्होंने कहा ,‘‘घरेलू अंपायर बड़े टूर्नामेंटों में अंपायरिंग नहीं करेंगे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव कैसे मिलेगा।
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अंपायरिंग में जमीन आसमान का फर्क है। भारतीय टीमों के शिविर में भी अंपायरों को साथ रखा जाना चाहिये।हमारे पास प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन अंपायरों को भी मेहनत करनी होगी और महासंघ को इसमें सहयोग देना होगा।’’ उन्होंने कहा ,‘‘ अंपायरों के विकास के लिये सही प्लानिंग और ढांचे की जरूरत है ताकि अगले विश्व कप या ओलंपिक में हमारा प्रतिनिधित्व रहे।’’ 1994 में अंपायरिंग से विदा ले चुके बावा भारतीय टीम के साथ दौरों पर जाते थे जिसमें 1981 का यूरोप दौरा और 1983 में पाकिस्तान में टेस्ट श्रृंखला शामिल है। लाहौर विश्व कप 1990 और सियोल ओलंपिक 1988 में अंपायरिंग कर चुके बावा ने कनाडा से से कहा ,‘‘उस दौर में अंपायरों को खेल का हिस्सा नहीं माना जाता था लेकिन मैने हालात बदलने की कोशिश की।
जब मैने शुरूआत की जब 20 रूपये रोज भत्ता मिलता था जिसे केपीएस गिल के दौर में मैने बढवाकर 100 रूपये कराया।’’ उन्होंने बताया ,‘‘ तब अंपायरों को कोई पदक या सोवेनियर नहीं दिये जाते थे लेकिन 1977 में अमृतसर में रणजीत सिहं टूर्नामेंट के दौरान हमने सुनिश्चित कराया कि अंपायरों को भी सम्मान और स्मृति चिन्ह दिये जायें।’’ तीनों दिग्गजों ने कहा कि इस पेशे में वित्तीय सुरक्षा नहीं है और महज जुनून के लिये वे इससे जुड़े रहे। शर्मा ने कहा ,‘‘ हमारे समय में 150 या 200 रूपये रोज और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 40 . 50 डॉलरभत्ता मिलता था जो हमारा महासंघ ही देता था। अगर आप किसी टूर्नामेंट में तटस्थ हैं तो टूर्नामेंट का मेजबान बोर्डिंग, लॉजिंग और 40 . 50 डॉलर दैनिक भत्ता देता है।
हमारे अधिकांश अंपायरों के पास नौकरी नहीं है और घरेलू टूर्नामेंटों पर ही काम चल रहा है।’’ पिछले साल संन्यास के बाद काफी प्रयासों के बाद निजी नौकरी कर रहे रघु ने कहा ,‘‘ जब तक अंपायरिंग की, उसी पर फोकस रहा और नौकरी के बारे में सोचा नहीं। केएसएचए में नौकरी निजी कारणों से छोड़नी पड़ी। अभी अपने प्रयासों से एक निजी नौकरी शुरू की है लेकिन उतनी कमाई नहीं है।
कोई भी मां बाप ऐसे हालात में बच्चे को अंपायर क्यो बनाना चाहेंगे।’’ उन्होंने कहा ,‘‘खिलाड़ियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद पुरस्कार और सरकारी नौकरी मिल जाती है लेकिन अंपायरों को कोई पुरस्कार या वेतन नहीं मिलता। जो अंपायर नौकरी कर रहे हैं, उन्हें कभी कभार टूर्नामेंटों के लिये छुट्टी नहीं मिलती। एक महिला अधिकारी ने तो यह भी कहा कि कई बार महासंघ से सहयोग नहीं मिलता और पक्षपात के कारण आगे की संभावना खत्म हो जाती है।