अन्नदाता की खुशहाली के लिए गैरसरकारी संगठनों को भी निभानी होगी बड़ी भूमिका

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Jun 16, 2025

केन्द्र सरकार द्वारा विकसित कृषि संकल्प अभियान के माध्यम से जिस तरह से देश के कोने कोने में किसानों तक पहुंचने का प्रयास किया गया है और जिस तरह से खेती और उससे जुड़ी किसानों से संबंधित जानकारी को साझा किया गया है यह इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि अन्नदाता की खुशहाली में ही देष की खुषहाली संभव है। सरकार के साथ ही खेती किसानी क्षेत्र में जुड़े गैरसरकारी संगठन भी आगे आते हैं तो अन्नदाता की खुशहाली की और अधिक तेजी से राह प्रशस्त होगी। हांलाकि मिशन फार्मर साइंटिस्ट परिववार जैसे संगठन नवाचारी किसानों के नवाचारों को पहचान दिलाने और किसानों के हित में लगातार प्रयासरत है। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनावों के समय सभी राजनीतिक दलों के केन्द्र में किसान ही रहता है और किसानों के लिए लोकलुभावन वादों की बरसात कर दी जाती है पर कभी इस बात को गंभीरता से नहीं समझा गया कि किसान का भला कर्ज माफी से नहीं हो सकता। किसान का भला चंद मिनी किट वितरण से नहीं हो सकता। दरअसल अन्नदाता और खेती किसानी का भला किसान के खेत को ही प्रयोगशाला बनाने से संभव होगा तो किसानों को उनकी मेहनत का पूरा पैसा दिलाने से संभव होगा। कैसी बिड़म्बना है कि छोटी से छोटी वस्तु का  उत्पादन कर्ता अपनी वस्तु को बेचने का दाम खुद तय करता है वहीं दूसरी और अन्नदाता जो अपने खून पसीने से सबका पेट ही नहीं भरता बल्कि इससे भी अधिक यह कि देश की अर्थ व्यवस्था को गति देने का प्रमुख कारक भी है। इस सबके बावजूद किसान को अपनी उपज ओने पोने भावों में बेचने को मजबूर होना पड़ता है। उसकी मेहनत का फल बिचौलियों को चला जाता है। टमाटर इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जा सकता है जो कभी अन्नदाता को रुलाता है तो कभी आमजन को पर कभी भी किसी मण्डी के आड़तियें को रुलाते नहीं देखा होगा। यहां तक देखने को मिलता है कि अन्नदाता को लागत तो दूर मण्डी में ले जाने तक के खर्च की राषि भी नहीं मिल पाती है। टमाटर तो एक उदाहरण मात्र है। 

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कोरोना काल का उदाहरण हमारे सामने हैं। जब समूचे  विश्व में सब कुछ बंद हो गया तो सबसे बड़ा सहारा कृषि क्षेत्र ही बनकर आया। किसानों की मेहनत से भरे अन्न धन इस संकट के समय में बड़ा सहारा बने। सरकारें अपने नागरिकों को आसानी से खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकी। आज भी देश दुुनिया में खाद्य संकट से जूझने में अन्नदाता की मेहनत ही काम आ रही है। कर्जमाफी की यहां इसलिए चर्चा करना जरुरी हो जाता है कि कर्जमाफी की राषि जितनी राशि के कृषि इनपुट यानी कि खाद-बीज कीटनाशक किसानों को उपलब्ध करा दी जाए तो इस राशि का वास्तव में खेती किसानी क्षेत्र में उत्पादकता के रुप में उपयोग हो सकेगा। कर्ज माफी को इसतरह से समझना होगा कि किसान भी यह समझने लगा है कि चुनाव आने पर कर्ज तो माफ होना ही है  ऐसे में कर्ज चुकाना ही क्यों। दूसरा यह कि सरकार की कर्ज माफी का बोझ तो उठाना ही पड़ता है पर फिर भी वह ना तो किसानों को ही संतुष्ट कर पाती है और ना ही यह राशि किसानों के काम आ पाती है। ऐसे में सरकार को ब्याज अनुदान या इस तरह के अनुदान पर होने वाले व्यय को किसानों को इनुपट के रुप में उपलब्ध कराने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इससे एक तो इनपुट खेती में ही काम आयेगा और इनपुट की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया तो खेती किसानी में उत्पादकता बढेगी और इसका लाभ देषको ही प्राप्त होगा। देश में अन्नधन के भण्डार भरेंगे। आयात पर निर्भरता कम होगी और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

सरकार के 15 दिवसीय संवाद को अच्छी पहल माना जा सकता है और इस तरह के अभियान खरीफ और रवी दोनों ही फसलों की बुवाई से पहले चलाया जाएं तो निश्चित रुप से देश को लाभ होगा। इसके साथ ही इस तरह के अभियान के दौरान खेती क्षेत्र की अनुदान राशि के एक बड़े हिस्से को इनपुट वितरण के रुप में उपयोग होगा तो यह किसानों के लिए वास्तविक लाभकारी होगा। कृषि क्षेत्र से जुड़े मिशन फार्मर साइंटिस्ट परिवार जैसे संगठनों को भी इससे जोड़ा जाना चाहिए। इसके साथ ही क्षेत्र के नवाचारी किसानों को प्रोत्साहित, सम्मानित और उनके अनुभवों को साझा करने के समन्वित प्रयास किये जाने चाहिए। यहां तक कि कृषक भ्रमण कार्यक्रमों में स्थानीय नवाचारी किसानों के खेत को बतौर प्रयोगशाला भ्रमण कराया जाना चाहिए ताकि एक दूसरे के अनुभवों को साझा करने के साथ ही नवाचारी किसानों को भी प्रोत्साहन मिल सकेगा। 

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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