अब यूक्रेन से लौटे मेडिकल छात्रों के भविष्य की चुनौती

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Mar 07, 2022

इस बात पर संतोष व्यक्त किया जाना चाहिए कि यूक्रेन से भारत के 17 हजार छात्रों को सुरक्षित लाया जा चुका है। युद्धरत यूक्रेन में फंसे शेष भारतीयों को भी लाने के प्रयास जारी है। जैसे हालात दिख रहे हैं उनमें रुस-यूक्रेन युद्ध का हल अभी नहीं दिख रहा है। यूक्रेन में चारोंओर तबाही का मंजर देखा जा रहा है। हांलाकि यूक्रेन द्वारा भी रुसी सेना को काफी नुकसान पहुंचाने के दावे किए जा रहे हैं पर इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती की नुकसान यूक्रेन का ही अधिक हो रहा है। यूक्रेन को जो बाहरी सहायता मिलनी थी वो किसी भी देश से अभी प्रत्यक्ष रुप से नहीं मिल रही हैं वहीं रुस पूरी तरह से आक्रामक मूड में लगता है। दरअसल पुतिन के हौसले इस समय बुलंद है। पुतिन की धमकियों के आगे नाटो को भी बैकफुट पर आना पड़ रहा है। कहा जाए तो अभी तक तो पुतिन का ही पलड़ा भारी है।

यूक्रेन की समस्या के बहाने देश में मेडिकल शिक्षा के हालातों पर नए सिरे से चिंतन करने की आवश्यकता हो गई है। देश में वर्तमान में एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर है जबकि इसका वैश्विक ओसत एक हजार पर चार डॉक्टर होना चाहिए। यानि कि मोटे मोटे रुप से देखा जाए तो देश में वैश्विक ओसत की तुलना में एक चौथाई चिकित्सक ही है। इसका साफ साफ मतलब यह हो जाता है कि देश में मेडिकल कालेजों की संख्या और सीटे बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद उपलब्ध डाक्टरों में से भी अधिकांश डाक्टर ग्रामीण क्षेत्र में जाने को तैयार नहीं होते। इससे ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था प्रभावित है। हांलाकि पिछले कुछ सालों से योजनावद्ध तरीके से सरकारी व गैरसरकारी क्षेत्र में मेडिकल कालेज खोले जा रहे हैं। हांलाकि स्तर को लेकर अभी से चर्चा होने लगी है। जहां तक यूक्रेन में मेडिकल शिक्षा के लिए भारतीयों के जाने के प्रमुख कारकों में बिना किसी नीट जैसी प्रवेश परीक्षा के ही वहां आसानी से एडमिशन हो जाता है। इसलिए जो विद्यार्थी नीट जैसी प्रवेश परीक्षा में पास नही हो पाते हैं या झंझट में नहीं पड़ना चाहते वे आसानी से यूक्रेन में एडमिशन ले लेते हैं। जहां तक मेडिकल शिक्षा पर होने वाले फीस आदि के खर्च की बात है तो वह भी भारत से आधी से भी कम है। माना जाता है कि देश में जहां सालाना 10 से 12 लाख का खर्च आता है तो यूक्रेन में चार से पांच लाख में ही काम चल जाता है। इसके साथ ही यूक्रेन में माना जाता है कि आधारभूत संरचना भी स्तरीय है इसलिए दुनिया के देशों में वहां की एमबीबीएस डिग्री की मान्यता है। प्रेक्टिकल की बेहतर व्यवस्था बताई जाती है। इसके साथ ही देश में एमबीबीएस की सीटें कम होने के कारण डाक्टर बनने की चाहत रखने वाले यूक्रेन आदि विदेशों का रुख कर लेते है। हांलाकि पिछले तीन साल तो इस मायने में निराशा भरे माने जा सकते हैं कि अभी कोरोना महामारी से उभर भी नहीं पाए हैं कि यूक्रेन-रुस की लड़ाई का नया संकट आ गया है।

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तात्कालीक समस्या तो यूक्रेन आए मेडिकल छात्रों के भविष्य को लेकर है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कई मुख्यमंत्री चिंता जता चुके हैं। केन्द्र सरकार भी गंभीर हो गई है और संभावित विकल्पों खासतौर से सरकारी और निजी क्षेत्र के मेडिकल कालेजों की सीटों के अलावा इन छात्रों के लिए सीटों की व्यवस्था करने पर विचार कर रही है। इंटर्नशिप से वंचित छात्रों को इंटर्नशिप फीस नहीं लेकर इंटर्नशिप कराने की पहल हो चुकी है। सरकार ने देश में ही फीस स्ट्रक्चर में सुधार और सीटें बढ़ाने के विकल्पों पर सुझाव के लिए संबंधित संस्थाओं खासतौर से स्वास्थ्य मंत्रालय, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और नीति आयोग को ठोस सुझाव देने को कहा है। सरकारी स्तर पर समस्या के हल की शुरुआत तो हुई है। पर आज तात्कालीक आवश्यकता यूक्रेन से लौटे मेडिकल छात्रों के भविष्य को लेकर है। हांलाकि सरकार युद्ध के हालातों में नजर टिकाये हैं और जल्दी ही युद्ध समाप्त हो और हालात सुधरे तो सरकार व विद्यार्थी राहत की सांस ले सकते हैं। पर बेहतर विकल्प इन छात्रों का भविष्य देश में ही खोजना होगा।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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