अब तो हम अनेक हैं (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 06, 2025

बढ़ते विकास के साथ बहुत सी चीज़ें बेकार हो जाती हैं। पुराने दोस्त छूट जाते हैं और नई व्यवसायिक दोस्तियां पनप जाती है। पुरानी सामाजिक सच्चाइयां और राजनीतिक नारे नए वातावरण से बाहर हो जाते हैं। अब सामूहिकता को आराम करने भेज दिया गया है। आवाज़ दो हम एक हैं जैसा सकारात्मक, उत्साह बढाने वाला नारा अब प्राचीन काल का सच लगता है। आजकल हर नई घटना शोर मचाकर यह साबित करने में जुट जाती है कि हम एक नहीं हैं। वैसे तो यह कड़वी सचाई हमेशा हमारे दिमाग में रही, लेकिन दिखाते यही रहे कि हम सब एक हैं। इस सच को हमेशा नकारते रहे, चाहते रहे ताकि एक दूसरे को बुरा न लगे लेकिन परिस्थितियों के बदलते चेहरों ने वक़्त की विशाल दीवार पर सब साफ़ दिखाना शुरू दिया है। दुनिया की बड़ी बड़ी ताकतें मानती हैं कि सफ़ेद और काले अलग अलग हैं। सफल प्रबंधन के परचम हिलाने वाले लोग, राजनीतिक पार्टियां, धार्मिक मंच खास और आम लोगों के बारे अलग अलग नजरिया रखती हैं। ‘दीवान ए ख़ास’ और ‘दीवान ए आम’ की अवधारणा हमारे इतिहास का हिस्सा है।

   

समाज के बुद्धिमान लोग कई साल से कह रहे हैं कि आम और ख़ास लोगों के लिए अलग अलग न्यायिक व्यवस्थाएं होनी चाहिए लेकिन किसी भी अबुद्धिजीवी के पल्ले नहीं पड़ा कि यदि ऐसा हो जाए तो काफी कुछ सुचारू रूप से चल सकता है। सबको पता रहेगा कि किनके लिए क्या नियम हैं। मिसाल के तौर पर किसी भी प्रसिद्द, धनवान, शक्तिशाली या अन्य तरह से विशिष्ट व्यक्ति को दंड नहीं दिया जा सकता, तो साफ़ है उसके खिलाफ कोई कारवाई शुरू करने के लिए समय नष्ट न किया जाए। प्रसिद्ध व्यक्ति बीमार हो जाए तो पूरा देश भजन हवन करना शुरू कर देता है और चैनल के मंच पर वाद विवाद बेहोश हो जाते हैं। व्यक्तिपूजा शुरू हो जाती है। बेचारे राष्ट्रीय मसले स्टूडियो के बाहर बारिश में, बिना छतरी के खड़े कर दिए जाते हैं। जब बार बार यह नंगा सच सामने आता है कि हम गरीब अमीर, छोटे बड़े, लाल, पीले, काले रंग के अलग अलग लोग हैं तो सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक व शासकीय व्यवस्था को सबके लिए अलग व्यवहारिक नियम बनाने बारे विचार करना चाहिए। 

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जिस व्यक्ति के खिलाफ सख्त कारवाई की जा सकती हो, अविलम्ब की जाए ताकि उसे पता चले कि अनुशासन और क़ानून तोड़ने के क्या परिणाम होते हैं। जिसके खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता, अच्छी व्यवहारिक समझ का प्रयोग करते हुए, कुछ न किया जाए बलिक सामाजिक आयोजन कर उन्हें सफ़ेद गुलाब भेंट किया जाए। इस उचित निर्णय से बहुत लोगों की जान बच सकती है, न्यायिक प्रक्रिया के दर्जनों राष्ट्रीय बरस व धन गर्क होने से बचाया जा सकता है। अलग अलग होने का सच आत्मसात हो जाए तो चैन फैलाया जा सकता है और अपना बहुमूल्य समय वीडियो बना वायरल कर, कविताएं गढ़ कर फेसबुक पर चिपकाने, व्ह्त्सेप पर कहानियां डालने, मनचाहे गीत गाकर फेसबुक को हिलाने, पत्नी को खुश करने के लिए छत पर किचन गार्डन स्थापित करने में प्रयोग किया जा सकता है।

- संतोष उत्सुक

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