Mahananda Navami: महानंदा नवमी व्रत से जीवन के संकट होते हैं दूर

By प्रज्ञा पांडेय | Nov 29, 2025

आज महानंदा नवमी है, यह हिंदूओं का प्रमुख त्योहार है जिसे मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इसे "ताला अष्टमी" के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन देवी दुर्गा और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, और यह पर्व शक्ति, धन, सुख-समृद्धि और शत्रु बाधा से मुक्ति के लिए मनाया जाता है तो आइए हम आपको महानंदा नवमी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। 

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महानंदा नवमी पर करें ये उपाय, मिलेगा लाभ

पंडितों के अनुसार यदि नदी पास में हो तो नदी में स्नान करें। जरूरतमंदों को दान करें। व्रत के दौरान फलाहार कर सकते हैं। 

महानंदा नवमी व्रत से होते हैं ये लाभ

पंडितों के अनुसार महानंदा नवमी व्रत से धन संपत्ति में वृद्धि होती है। मां की कृपा से घर में बरकत बढ़ती है और आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं। इस स्वास्थ्य लाभ होता है एवं बीमारियों से राहत और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है। घर-परिवार में झगड़े समाप्त होते हैं और संबंधों में मधुरता आती है। किसी भी तरह की बाधा, डर, नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। साथ ही संतान प्राप्ति और विवाह संबंधी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। महानंदा नवमी आध्यात्मिक ऊर्जा, भक्ति और आशीर्वाद से भरपूर दिन है। इस दिन किया गया पूजन और व्रत जीवन में सकारात्मकता, समृद्धि और शांति लाता है। मां महानंदा की कृपा से भक्तों के जीवन में सभी बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।

महानंदा नवमी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा 

पंडितों के अनुसार मां महानंदा की पूजा सरल है, लेकिन अत्यंत फलदायी मानी जाती है। सबसे पहले सुबह सूर्योदय से पहले उठें। स्वच्छ वस्त्र पहनें। एक कलश में जल भरकर व्रत का संकल्प लें। किसी शांत स्थान पर मां महानंदा और भगवान शिव की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। पास में दीपक, धूप, चंदन, पुष्प आदि रखें। दीपक जलाएं। धूप अर्पित करें। लाल या पीले फूल चढ़ाएं। मां को अक्षत, हल्दी-कुमकुम अर्पित करें। शुद्ध दूध, दही, घी, शहद और जल से पंचामृत तैयार करें। भगवान शिव और नंदी को पंचामृत अर्पित करें। आरती गाएं और प्रसाद में फल, गुड़ या मिठाई अर्पित करें।

महानंदा नवमी व्रत के ये हैं नियम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत दिनभर रखा जाता है। शाम में माता की आरती के बाद फलाहार किया जाता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, दीपक या तिल दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

महानंदा नवमी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा

श्री महानंदा नवमी व्रत कथा के अनुसार एक समय की बात है कि एक साहूकार की बेटी पीपल की पूजा करती थी। उस पीपल में लक्ष्मी जी का वास था। लक्ष्मीजी ने साहूकार की बेटी से मित्रता कर ली। एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी को अपने घर ले जाकर खूब खिलाया-पिलाया और ढेर सारे उपहार दिए। जब वो लौटने लगी तो लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से पूछा कि तुम मुझे कब बुला रही हो? अनमने भाव से उसने लक्ष्मी जी को अपने घर आने का निमंत्रण तो दे दिया किंतु वह उदास हो गई। साहूकार ने जब पूछा तो बेटी ने कहा कि लक्ष्मी जी की तुलना में हमारे यहां तो कुछ भी नहीं है। मैं उनकी खातिरदारी कैसे करूंगी? साहूकार ने कहा कि हमारे पास जो है, हम उसी से उनकी सेवा करेंगे। फिर बेटी ने चौका लगाया और चौमुख दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का नाम लेती हुई बैठ गई। तभी एक चील नौलखा हार लेकर वहां डाल गया। उसे बेचकर बेटी ने सोने का थाल, शाल दुशाला और अनेक प्रकार के व्यंजनों की तैयारी की और लक्ष्मीजी के लिए सोने की चौकी भी लेकर आई। थोड़ी देर के बाद लक्ष्मी जी गणेश जी के साथ पधारीं और उसकी सेवा से प्रसन्न होकर सब प्रकार की समृद्धि प्रदान की। अत: माना जाता है कि जो व्यक्ति महानंदा नवमी के दिन यह व्रत रखकर श्री देवी लक्ष्मी जी का पूजन-अर्चन करता है उनके घर स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तथा दरिद्रता से मुक्ति मिलती है तथा दुर्भाग्य दूर होता है।

महानंदा नवमी का महत्व

महानंदा नवमी का व्रत करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। यह व्रत देवी नंदा को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का एक उत्तम तरीका है। यह त्योहार देवी नंदा को समर्पित है, जो माता पार्वती का ही एक रूप हैं। इस दिन, भक्त देवी नंदा की पूजा करते हैं और उनसे आशीर्वाद मांगते हैं। महानंदा नवमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह दिन उन भक्तों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है, जो जीवन की समस्याओं से जूझ रहे हैं या शत्रुओं के कारण परेशान हैं।

- प्रज्ञा पाण्डेय 

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