Parma Ekadashi 2026: परमा एकादशी व्रत से होती है दरिद्रता दूर, आती है समृद्धि

By प्रज्ञा पांडेय | Jun 10, 2026

11 जून को परमा एकादशी है, हिन्दू धर्म में परमा एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। अधिकमास में पड़ने के कारण इस एकादशी का महत्व बढ़ गया है। परमा एकादशी पावन एकादशी है, इस व्रत को करने से व्रत का पूरा पुण्यफल मिलता है तो आइए हम आपको परमा  एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। 

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परमा एकादशी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार अधिकमास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 11 जून 2026 को प्रातः 12 बजकर 57 मिनट पर होगा तथा इसका समापन उसी दिन रात्रि 10 बजकर 36 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार परमा एकादशी का व्रत 11 जून 2026, दिन गुरुवार को रखा जाएगा।

परमा एकादशी का है विशेष महत्व

पंडितों के अनुसार ‘परमा‘ शब्द का अर्थ होता है सर्वोत्तम अथवा श्रेष्ठ। इसी कारण इस एकादशी को सभी एकादशियों में विशेष फलदायी माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार यह व्रत दरिद्रता और पापों से मुक्ति दिलाने वाला है। पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि धन के देवता कुबेर ने इसी व्रत के प्रभाव से भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद पाया था। वहीं सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने भी परमा एकादशी के पुण्य प्रभाव से अपना खोया हुआ वैभव और परिवार पुनः प्राप्त किया था। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि जो भक्त इस दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की आराधना करता है, उसे मृत्यु के पश्चात बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

परमा एकादशी पर ऐसे करें पूजा, मिलेगा लाभ

पंडितों के अनुसार परमा एकादशी का व्रत खास होता है, इसलिए इस पावन दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल को शुद्ध कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।

भगवान को पीले पुष्प, धूप, दीप, चंदन, पंचामृत और फल अर्पित करें। श्रीहरि को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं तथा उसमें तुलसी दल अवश्य रखें, क्योंकि तुलसी के बिना भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते। पूजा के पश्चात परमा एकादशी व्रत कथा का श्रवण करें तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। भक्तजन भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और भगवान के ध्यान में रात्रि व्यतीत करते हैं। परमा एकादशी पर ब्राह्मणों, जरूरतमंदों अथवा दीन-हीन, असहाय लोगों को भोजन एवं दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण किया जाता है।

परमा एकादशी पर दान का भी है महत्व

सनातन संस्कृति में दान को धर्म का प्रमुख आधार माना गया है। विशेष रूप से परमा एकादशी के दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करने वाला बताया गया है। धर्मग्रंथों में वर्णित है कि इस दिन जरूरतमंदों की सहायता करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

 स्कन्द पुराण में दान का उल्लेख करते हुए कहा गया है-

न्यायोपार्जितवित्तस्य दशमांशेन धीमतः।

कर्तव्यो विनियोगश्च ईश्वरप्रीत्यर्थमेव च॥

अर्थात बुद्धिमान मनुष्य को अपने ईमानदारी से अर्जित धन का एक भाग ईश्वर की प्रसन्नता और जनकल्याण के कार्यों में अवश्य लगाना चाहिए। इस दिन अन्नदान, जलसेवा, फल वितरण, धार्मिक ग्रंथों का दान तथा रोगियों एवं दिव्यांगजनों की सहायता करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। नि:स्वार्थ भाव से किया गया दान जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आता है।

परमा एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक

शास्त्रों के अनुसार काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम का एक अत्यंत धार्मिक लेकिन गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी पवित्रा के साथ रहता था। अत्यधिक निर्धनता के कारण कई बार उन्हें भूखा रहना पड़ता था। इसके बावजूद, पतिव्रता पत्नी ने कभी अपने भाग्य की शिकायत नहीं की और पूरी निष्ठा से अपने पति तथा अतिथियों की सेवा की। अपनी पत्नी के कष्टों को देखकर एक दिन सुमेधा परदेश जाने लगे, लेकिन उनकी पत्नी ने उन्हें रोक लिया और कहा कि मनुष्य को अपने पूर्व कर्मों के अनुसार ही धन-संपत्ति प्राप्त होती है। उसी समय संयोग से वहां कौण्डिन्य मुनि का आगमन हुआ।  ब्राह्मण दंपती ने मुनि से दरिद्रता दूर करने का उपाय पूछा। मुनि ने उन्हें अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी के व्रत का विधान बताया। उन्होंने बताया कि यह एकादशी सभी पापों और दरिद्रता को नष्ट करने वाली है। कौण्डिन्य मुनि के निर्देशानुसार सुमेधा और उनकी पत्नी ने पूर्ण श्रद्धा के साथ पांच दिनों तक 'पंचरात्रि' व्रत और परमा एकादशी का उपवास किया। व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और एक राजकुमार के रूप में आकर उन्हें धन-धान्य, सुंदर घर और सुखी जीवन का आशीर्वाद प्रदान किया। पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वयं धन के देवता कुबेर ने भी इसी व्रत के प्रभाव से अपना खोया हुआ वैभव और पद पुनः प्राप्त किया था। इसके अतिरिक्त, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने भी इसी एकादशी के पुण्य से अपने कष्टों से मुक्ति पाई थी। 

परमा एकादशी पर करें महाउपाय

हिंदू मान्यताओं के अनुसार किसी भी देवता या व्रत का पुण्यफल पाने के लिए दान का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है। ऐसे में परमा एकादशी वाले दिन व्यक्ति को यथासंभव पीले वस्त्र, पीले फल, पीले मिष्ठान और चने की दाल, गुड़ आदि का दान करना चाहिए। भगवान श्री विष्णु की महिमा का गान करने वाले श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ सभी कष्टों को दूर करके कामनाओं को पूरा करने वाला माना गया है। ऐसे में परमा  एकादशी व्रत वाले दिन इसका पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करना चाहिए। परमा एकादशी वाले दिन साधक को श्री हरि के साथ विष्णुप्रिया कहलाने वाली तुलसी जी की विशेष पूजा करनी चाहिए। परमा  एकादशी वाले दिन तुलसी जी के पास गाय से बने शुद्ध घी का दीया जलाकर 108 परिक्रमा करने पर लक्ष्मी और नारायण दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

- प्रज्ञा पाण्डेय

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