पश्चिम एशिया संकट की मार! Petrol- Diesel पर ₹18 तक पहुँचा तेल कंपनियों का घाटा, सब्सिडी का बोझ बढ़ने के आसार

By रेनू तिवारी | Apr 29, 2026

पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के बावजूद घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतें स्थिर रहने से सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल की बढ़ती लागत और पंपों पर स्थिर कीमतों के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। वर्तमान में तेल कंपनियों को हो रहा नुकसान इस प्रकार है: पेट्रोल: ₹14 प्रति लीटर का घाटा। डीजल: ₹18 प्रति लीटर का घाटा।

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वहीं, इस अवधि में उर्वरक सब्सिडी बढ़कर 2.05 लाख करोड़ से 2.25 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुंच जाने का अनुमान है, जो 1.71 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान से काफी अधिक है। इक्रा ने कहा कि करीब 20 प्रतिशत वैश्विक तेल एवं गैस आपूर्ति वाले समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधाओं के कारण ईंधन, उर्वरक और रसायनों की उपलब्धता प्रभावित हुई है। इससे कीमतों में वृद्धि और तेल रिफाइनरी और विपणन कंपनियों पर लागत दबाव बढ़ा है। फरवरी अंत में पश्चिम एशिया संकट शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत 70-72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर थी, जो 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक है।

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रिपोर्ट के मुताबिक, ऊर्जा और कच्चे माल की अधिक लागत का असर तेल विपणन, उर्वरक, रसायन और शहरी गैस वितरण क्षेत्रों की लाभप्रदता पर पड़ेगा, क्योंकि कंपनियां लागत का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पा रही हैं। इक्रा ने कच्चे तेल रिफाइनिंग क्षेत्र के लिए परिदृश्य ‘स्थिर’ रखा है, लेकिन ईंधन खुदरा बिक्री, उर्वरक, बेसिक केमिकल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्रों के लिए ‘नकारात्मक’ दृष्टिकोण जताया है। उर्वरक क्षेत्र में सल्फर और अमोनिया की कीमतों में वृद्धि तथा प्राकृतिक गैस महंगी होने से लागत में तेज इजाफा हुआ है।

यूरिया पूल की कीमत अप्रैल 2026 में बढ़कर करीब 19 डॉलर प्रति यूनिट हो गई है, जो संकट से पहले लगभग 13 डॉलर थी। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि कच्चे माल की महंगाई और सब्सिडी में पर्याप्त संशोधन नहीं होने से फॉस्फेटिक और पोटाश (पीएंडके) उर्वरक कंपनियों का मुनाफा प्रभावित हो सकता है। मौसम संबंधी जोखिम भी किसानों की कीमत बढ़ोतरी सहने की क्षमता को सीमित कर सकते हैं।

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