बुढ़ापे का बीमा (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Nov 13, 2025

आज का दिन तो यूँ समझो कि 'इतिहास' में दर्ज होने लायक था। राय बहादुर धर्मपाल जी और उनकी धर्मपत्नी दामिनी जी के 'टैक्स फ्री' आँसुओं का जैसे आज बाँध टूट गया था। क्यों न हो? उनकी इकलौती 'पुत्र-तुल्य' पुत्री, डॉक्टर दीप्ति जो पूरे सात साल बाद, यानी M.B.B.S. की 'डिग्री' रूपी 'सोने का अंडा' लेकर घर लौट रही थी। धर्मपाल जी ने तुरंत पंद्रह लाख की एफ.डी. तुड़वाकर 'ग्रैंड वेलकम' का आयोजन किया था; पकवान नहीं, मानो 'दहेज बाजार' के सैम्पल सजे थे। दीप्ति ने जैसे ही 'हाई-हील' की धमक से घर में कदम रखा, माँ-बाप दोनों ने उसे कलेजे से नहीं, अपनी 'बैंक-स्टेटमेंट' से लगाया। पिता ने तुरंत एक 'कैश फ्लो' स्टेटमेंट दी: "बेटी, तुम्हें पता है? तुम्हारी 'डॉक्टरी' पर हमने अपनी आधी ज़िंदगी की 'पूंजी' फूंक दी। बेटा पैदा नहीं हुआ, इसलिए तुम्हें 'लड़की' होने के बावजूद 'पूंजी निवेश' का मौका दिया। अब 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' (R.O.I.) का वक्त है। तुम्हारी 'लाइसेंस' की कीमत अब लाखों में नहीं, करोड़ों में होगी। जाओ, थोड़ी हवा खाओ, फिर 'करोड़पति दामाद' प्रोजेक्ट पर मीटिंग है।" दीप्ति के चेहरे पर, 'एम.बी.बी.एस.' की थकान से ज़्यादा, 'पिताजी के खर्च' का हिसाब तैर रहा था।

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दीप्ति ने जब काँपते हुए, लरजती आवाज़ में कहा कि "पापा, मेरा ऐसा कोई 'विशेष दोस्त' नहीं है," तो धर्मपाल जी का चेहरा ऐसा हो गया, मानो उन्हें 'टैक्स नोटिस' मिल गया हो। वातावरण में एक 'अघोषित श्मशान' का सन्नाटा पसर गया। अगले दिन, 'सेकंड चांस' के तौर पर, पिता ने फिर से 'इंटरव्यू' लिया। "बेटी, संकोच मत करो, यह 'ऑफर लिमिटेड टाइम' के लिए है! बताओ, कहीं 'गरीब' डॉक्टर तो नहीं फँसा लिया? कोई 'अछूत' तो नहीं?" दीप्ति ने फिर वही 'भयानक' जवाब दिया। अब, 'सभ्यता' का बाँध टूट गया। धर्मपाल जी, जो कल तक 'प्यार' का नाटक कर रहे थे, एकदम 'जज' की मुद्रा में आ गए, मानो कोर्ट में 'फैसला' सुना रहे हों। वह दहाड़े, "तुम्हें 'पढ़ाना' हमारी सबसे बड़ी 'गलती' थी! तुम तो 'नकारा', 'गैर-जिम्मेदार' और 'अयोग्य' निकली! इतनी महंगी 'एजुकेशन' पर खर्च किया, लाखों रुपया फूँका, और तुम एक अदना सा 'करोड़पति लड़का' भी अपने 'प्रेम जाल' में फँसा नहीं पाई! धिक्कार है तुम्हारी डॉक्टरी पर! धिक्कार है तुम्हारी 'सफलता' पर! क्या करेंगी तुम्हारी यह 'एम.बी.बी.एस.' जब तुम 'रिश्ते' नहीं 'खरीद' सकतीं?" यह 'क्रोध' नहीं था, यह था 'पूंजी निवेश' पर 'जीरो रिटर्न' का गुस्सा। बेटी नहीं, उन्हें 'फेल हुआ स्टॉक' दिख रही थी।

पिता के ये 'घोषणा-पत्र' सुनकर दीप्ति का दिल नहीं, बल्कि उसका 'आत्म-सम्मान' तार-तार हो गया। उसकी आँखों से जो आँसू बह रहे थे, वे 'दुःख' के नहीं, बल्कि 'घृणा' और 'निराशा' के थे। उसने सोचा, 'वाह रे मेरे पिता! जिस 'योग्यता' के लिए मैंने दिन-रात एक किए, वह 'डिग्री' आज मेरे 'गैर-जिम्मेदार' होने का प्रमाण बन गई।' उनके मापदंडों पर खरा उतरने के लिए मुझे 'चरित्र' नहीं, 'चालबाज़ी' सीखनी चाहिए थी! मुझे 'अध्ययन' की जगह 'शिकार' करना चाहिए था! उनकी नज़र में, एक 'सफल डॉक्टर' नहीं, बल्कि 'असफल शिकारी' खड़ी थी। दीप्ति ने मन ही मन एक 'संकल्प' लिया, एक ऐसा कड़वा संकल्प जो उस क्षण की पूरी 'पीड़ा' को समेटे हुए था: "मैं अपने पिता के 'मापदंडों' पर, यानी 'डॉक्टर-पति' के साथ 'करोड़पति' के जाल में फँसने के 'मापदंड' पर, कभी खरी नहीं उतर सकती! अब चाहे मुझे अपनी 'एम.बी.बी.एस.' की डिग्री को गले लगाकर, पूरी ज़िंदगी 'अविवाहित' ही क्यों न गुजारनी पड़े। मेरा 'ज्ञान' मेरी 'कीमत' तय करेगा, कोई 'लड़का' नहीं। मैं 'गैर-जिम्मेदार' हूँ, तो हूँ! कम से कम, मैं 'बिकाऊ' तो नहीं हूँ!" यह व्यंग्य, पिता पर नहीं, बल्कि 'समाज' की उस सोच पर था, जो बेटी की 'सफलता' को 'दहेज' की चाबी से तौलती है, और जहाँ 'अविवाहित' रहना भी 'अयोग्यता' का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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