बजट के शुभ अवसर पर (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jul 27, 2024

लो जी बजट आ गया। विपक्षी और पक्षी नेताओं के बीच, एक दूसरे को बातों से पीटने की परम्परा निभाई जाने लगी। कहा जा रहा था बजट में यह होगा, वह होगा। उनको यह देना चाहिए, वैसा करना चाहिए।  आयकर सीमा बढनी और महंगाई घटनी चाहिए। लाखों नौकरियां पैदा करने की ज़रूरत है जैसे ठीक इसके उलट लाखों बच्चे कम पैदा करने की राष्ट्रीय नसीहत है।   

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महान नेता जो पहले सरकार की ऐसी तैसी करते रहते थे, लेकिन चुनाव से पहले विपक्ष के आंगन से, सरकारी पक्ष की सुविधा कोठी में आ गए थे, उन्होंने कहा, सामाजिक न्याय की बात करता, स्वागत योग्य सर्वोत्तम बजट है। विपक्षी नेता ने कहा, कुर्सी बचाने वाला बजट है। हमारे चुनावी घोषणा पत्र की नक़ल है। उम्मीद के मुताबिक कुछ नहीं मिला। नेता पक्ष बोले, विकसित देश के लक्ष्यों को साकार करने की दिशा में मील पत्थर है। सभी वर्गों के सशक्तिकरण करने के लिए कदम उठाए हैं। अर्थशास्त्री बोले कृषि, रोज़गार, करदाता, बुनियादी ढांचा सभी के लिए कुछ है।

विपक्ष पार्टी के मुख्यमंत्री बोले, बेरोजगारी, गरीबी, कीमतों पर लगाम लगाने में विफल है। आंकड़ों का जाल है। बजट हताश करता है। पूर्व सख्त वित्तमंत्री ने कहा, न घटेगी महंगाई, रोज़गार के अवसर नहीं बढ़ेंगे।  बेरोजगारी की स्थिति गंभीर होगी। उन्होंने बजट को आंकड़ों का जाल नहीं आंकड़ों की कलाबाजी कहा। वैसे यह भी कहा गया कि बजट में आदिवासी, दलित और पिछड़ों को सशक्त बनाने के लिए मज़बूत योजनाएं हैं जो बाद में कमज़ोर पड़ जाती हैं। 

अनेक लेखक और टिप्पणीकार बरसों पहले लिखी बजटीय टिप्पणी को संपादित कर तैयार रखते हैं। जो हर साल बजट आने पर फिर से प्रयोग हो जाती है।  

सवाल है आम आदमी क्या करे। जवाब है, आम आदमी को बजट समझने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। उसे अपना मोबाइल रिचार्ज रखना चाहिए। जो कम्पनी सस्ता डाटा दे उसमें नंबर पोर्ट करा लेना चाहिए।  स्वादिष्ट टिप्पणियों का मज़ा लेना चाहिए। जितनी मासिक आमदनी हो उसमें से पहले बचत करनी चाहिए फिर खर्च बारे सोचना चाहिए। भूख से कम खाना चाहिए। सुबह उठकर व्यायाम करना चाहिए। बजट के प्रावधान समझने के लिए एक से एक धुरंधर अर्थ शास्त्री हैं। बजट के अनुरूप योजनाएं बनाकर, उन्हें जहां चाहे वहां लागू करने के लिए यशस्वी अफसर, बुद्धिमान देशप्रेमी नेता और अनुभवी ठेकेदार भी हैं।

- संतोष उत्सुक

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