By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Oct 23, 2021
ढाई महीने से गिरती-लुढ़कती हमारी विदेश नीति अपने पांवों पर खड़े होने की कोशिश कर रही है, यह बात मेरे लिए विशेष खुशी की है। मैं बराबर पहले दिन से ही लिख रहा था कि भारत सरकार को तालिबान से सीधे बात करनी चाहिए लेकिन नौकरशाहों के लिए कोई भी पहल करना इतना आसान नहीं होता, जितना कि किसी साहसी और अनुभवी नेता के लिए होता है। जो भी हो, इस समय दो सकारात्मक घटनाएं हुई हैं। पहली, मास्को में तालिबान के साथ हमारी सीधी बातचीत और दूसरी, अमेरिका, इस्राइल, यूएई तथा भारत के नए नए चौगुटे की शुरुआत!
यदि अगले कुछ हफ्तों में तालिबान सरकार का बर्ताव ठीक-ठाक दिखा तो कोई आश्चर्य नहीं कि उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलनी शुरू हो जाए। लेकिन गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने कल-परसों ही तालिबानी खीर में कुछ नीम की पत्तियां डाल दी हैं। उन्होंने ऐसे ‘शहीदों’ का सम्मान किया है और उनके परिजन को कुछ धनराशि भेंट की है, जिन्होंने पिछली सरकार के फौजियों और नेताओं पर जानलेवा हमले किए थे। ऐसी उत्तेजक कार्रवाई से उन्हें फिलहाल बचना चाहिए था। यदि भारत सरकार अपना दूतावास काबुल में फिर से खोल दे तो हमारे राजनयिक तालिबान को उचित सलाह दे सकते हैं। भारत ने अमेरिका के साथ मिलकर पश्चिम एशिया में जो चौगुटा बनाया है, वह अफगान-संकट के हल में तो मददगार होगा ही, इस्लामिक जगत से भी भारत के संबंध मजबूत बनाएगा लेकिन भारत को दो बातों का ध्यान जरूर रखना होगा। एक तो वह अमेरिका का चप्पू होने से बचता रहे और दूसरा, इस नए चौगुटे को ईरान के खिलाफ मोर्चाबंदी न करने दे।
-डॉ. वेदप्रताप वैदिक