By अनन्या मिश्रा | May 16, 2026
पौराणिक कथा है कि एक बार मलमास यानी की अधिकमास जगत पिता भगवान श्रीहरि विष्णु के पास पहुंचा। अश्रुपूरित नेत्रों से मलमास बोला, 'हे कृपानिधान क्या मैं त्याज्य हूं। सूर्य की संक्रांति विहीन होने की वजह से जगत के लोगों द्वारा मेरा तिरस्कार कर दिया गया है। ऐसे में मैं स्वामी रहित होने की वजह से शुभ कार्यों के लिए ग्राह्य नहीं माना गया हूं, मैं क्या करूं।' इसलिए, 'हे शरणागतवत्सले मैं आपकी शरण में आया हूं और अब आप ही मेरा उद्धार कीजिए।' मलमास की बात सुनकर कृपानिधान विष्ण भगवान बोले कि मेरा धाम अजर और अमर है, फिर आप ऐसे वचन क्यों बोल रहे हैं और आपको क्या दुख है।
श्रीकृष्ण, भगवान श्रीहरि विष्णु के पूर्वावतार हैं औऱ जगत के आधार हैं। वहीं श्रीकृष्ण कलियुग के आख्याता हैं। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जो काम भगवान विष्णु स्वयं कर सकते थे, वह उन्होंने क्यों नहीं कराया और अपने पूर्वावतार से क्यों कराया। इसका उत्तर है कि भगवान विष्णु जानते हैं कि कब, किससे और क्या कर्म कराना है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने जगत को दृष्टि दी है और जब तक दृष्टि नहीं बदलेगी, तब तक कल्याण नहीं होगा।
मलमास की कथा सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, जिसका कोई नाम, गोत्र, पिता और वेश नहीं उसको मेरा स्मरण करना चाहिए। क्योंकि मैं ही उसका नाम, गोत्र, वंश और पिता हूं। वेदों ने मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है। इसलिए मैं स्वयं को मलमास का स्वामी प्रतिष्ठापित करता हूं। आज से मलमास को पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाएगा। वहीं जो भी इस मास में मेरा (श्रीकृष्ण) का ध्यान, अनुष्ठान और स्तवन आदि करेगा, उसको गोलोक की प्राप्ति होगी।
यस्मिन मासे न संक्रांतिः, संक्रांति द्वमेव वा। मलमासः स विज्ञेयो मासे त्रिंशत्तमे भवेत्।। (ब्रह्मसिद्धांत) अर्थात, जिस महीने में भगवान सूर्य का किसी भी राशि पर संक्रमण नहीं होता, उसको मलमास, अधिमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। वहीं एक ही महीने में संक्रांतिद्वय होने पर वह मास क्षय मास कहलाता है।