वो रात जब अजीत डोभाल पाकिस्तान में लगभग पकड़े गए थे, क्या है ऑपरेशन अभय जिससे लाहौर आज भी कांपता है

By अभिनय आकाश | Mar 03, 2026

एक ऐसा भारतीय जो खुलेआम पाकिस्तान को एक और मुंबई के बदले बलूचिस्तान छीन लेने की चेतावनी देने से भी गुरेज नहीं करता। एक ऐसा जासूस जो लाहौर में सात साल मुसलमान बनकर देश की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहा हो। साल 1980 का दशक पाकिस्तान के सबसे संवेदनशील इलाकों में एक शख्स घूम रहा है। सिर पर टोपी, दाढ़ी, पठानी सूट और जुबान पर उर्दू, मस्जिदों में नमाज पढ़ता है। मदरसों में जाता है। आईएसआई के अफसरों से मिलता है। पाकिस्तानी सेना के ठिकानों के पास से गुजरता है। कोई उसे शक की नजर से नहीं देखता क्योंकि हर किसी को लगता है कि यह उन्हीं में से एक है। लेकिन यह शख्स पाकिस्तानी नहीं है। यह मुसलमान भी नहीं है। यह शख्स एक मध्यमवर्गीय हिंदू परिवार का लड़का जो भारत की खुफ़िया एजेंसी आईबी का अफसर है। इसका नाम है अजीत कुमार डोभाल और अगले 7 साल तक यह शख्स पाकिस्तान की जमीन पर दुश्मन की आंखों के सामने रहेगा। उनकी सबसे गहरी साजिशें सुनेगा। उनके सबसे बड़े राज चुराएगा और उन्हें पता तक नहीं चलेगा। यह कहानी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं है। 

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डोभाल के लिए एक पूरी नई पहचान तैयार की गई

किसी ऐसे इंसान को, जो पाकिस्तानी बन कर रह सके, जो मस्जिद में नमाज़ पढ़ सके, जो उर्दू इतनी अच्छी बोले कि कोई फर्क ना पकड़ पाए। जो दबाव में ना टूटे और जो अगर पकड़ा जाए तो मौत से पहले अपनी असली पहचान मिटा दे। इंटेलिजेंस ब्यूरो ने कई नामों पर विचार किया। लेकिन एक नाम बार-बार सामने आता रहा अजीत डोभाल क्योंकि डोभाल में वो सब कुछ था जो इस मिशन के लिए जरूरी था। डोभाल की उर्दू बेहद मजबूत थी। उनके चेहरे की बनावट ऐसी थी कि वो पश्तून या पंजाबी मुसलमान के रूप में आसानी से पास हो सकते थे। उन्हें इस्लाम की गहरी समझ थी। नमाज, रोजा, कलमा, कुरान की आयतें, सब कुछ। यह कोई रटी हुई जानकारी नहीं थी। डोभाल ने इसे इतनी गहराई से समझा था कि कोई आलिम भी उन्हें परख कर शक नहीं कर सकता था और सबसे अहम बात डोभाल डरते नहीं थे। मिजोरम के जंगलों में उन्होंने विद्रोहियों के बीच रहकर यह साबित कर दिया था कि जान की परवाह उनके डिक्शनरी में नहीं है। मिशन की तैयारी महीनों पहले शुरू हो गई। सबसे पहले डोभाल के लिए एक पूरी नई पहचान तैयार की गई। नया नाम, नया बैकग्राउंड, नई कहानी। यह सब इतना डिटेल में था कि अगर कोई उनसे उनके दादा का नाम पूछता तो वह बता सकते थे। अगर कोई उनके गांव का रास्ता पूछता तो वह बता सकते थे। 

7 साल तक चला ऑपरेशन

अजीत डोभाल ने भारत की सरहद पार की और पाकिस्तान की जमीन पर कदम रखा। इसके बाद जो शुरू हुआ वो 7 साल तक चला। 7 साल 2555 दिन 61320 घंटे। हर एक पल में पकड़े जाने का खतरा। हर एक पल में मौत का साया। डोभाल पाकिस्तान में एक मुसलमान के रूप में रह रहे थे। वो मस्जिदों में जाते थे। जुम्मे की नमाज पढ़ते थे। रमजान में रोजा रखते थे। लोगों के साथ उठते बैठते थे।  चाय पीते थे, बातें करते थे और इन्हीं बातों के बीच वो जानकारियां निकालते थे। ऐसी जानकारियां जो भारत की सुरक्षा के लिए सोने से भी ज्यादा कीमती थी, लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था जितना सुनने में लगता है। पाकिस्तान में हर मोहल्ले में आईएसआई के इंफॉर्मर्स थे। तो तुरंत रिपोर्ट होती थी। डोभाल को हर वक्त सतर्क रहना पड़ता था। एक छोटी सी गलती, एक गलत लहजा, एक गलत शब्द और खेल खत्म। आईबी का कोई भी एजेंट अगर पाकिस्तान में पकड़ा जाता, तो भारत सरकार उसे पहचानने से इंकार कर देती। कोई बचाने नहीं आता, कोई डिप्लोमेटिक चैनल काम नहीं करता।

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