By नीरज कुमार दुबे | Aug 12, 2026
हाल ही में आई वॉर ड्रामा सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने कारगिल युद्ध से जुड़े कई अहम पहलुओं को फिर चर्चा में ला दिया है। खासकर उस दौर में जीपीएस जैसी तकनीक के लिए विदेशी निर्भरता और अमेरिकी सैन्य-स्तरीय जीपीएस सुविधा नहीं मिलने की बात ने यह सवाल फिर खड़ा किया है कि युद्ध जैसे संकट के समय किसी दूसरे देश की तकनीक पर कितना भरोसा किया जा सकता है। कारगिल की यही सीख आज भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता को और भी महत्वपूर्ण बनाती है।
1999 की गर्मियों में पूरा देश कारगिल की बर्फीली चोटियों की ओर देख रहा था। मई की शुरुआत में ऊंची पहाड़ियों पर संदिग्ध गतिविधियों की खबरें आने लगीं थीं। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के नेतृत्व वाली पहली पेट्रोलिंग पार्टी के पकड़े जाने और उसके सदस्यों के साथ अमानवीय व्यवहार ने संकट की भयावहता का संकेत दे दिया। इसके बाद स्थिति तेजी से स्पष्ट हुई कि पाकिस्तानी घुसपैठिए 14,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर रणनीतिक चोटियों पर जम चुके थे।
फिर आया वह आदेश जिसने युद्ध की दिशा बदल दी। 26 मई को भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर शुरू किया। चुनौती असाधारण थी। दुनिया की किसी वायुसेना ने इस पैमाने पर इतनी ऊंचाई पर एयर-टू-ग्राउंड युद्ध नहीं लड़ा था। पतली हवा में इंजन का थ्रस्ट घट रहा था, हथियार प्रणालियां कम ऊंचाई के हिसाब से कैलिब्रेट थीं और कुछ मीटर की चूक बम को लक्ष्य से किलोमीटर दूर घाटी में गिरा सकती थी। ऊपर से राजनीतिक आदेश साफ था कि LoC पार नहीं करनी है। यानी लड़ाई सिर्फ दुश्मन से नहीं थी। लड़ाई भूगोल, मौसम, ऊंचाई, तकनीकी सीमाओं और समय, चारों से एक साथ थी।
शुरुआती दिनों में भारतीय वायुसेना को भारी कीमत चुकानी पड़ी। 27 मई 1999 को फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता का मिग-27 इंजन फेल होने के बाद नियंत्रण से बाहर होने लगा और उन्हें विमान से इजेक्ट करना पड़ा। वे पाकिस्तानी सेना के कब्जे में चले गए और बाद में उन्हें यातनाएं दी गईं। उसी दौरान नचिकेता का पता लगाने के लिए चोटियों के बीच उड़ रहे स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा अपने मिग-21 को थोड़ा नीचे लेकर आए। इसी बीच, पाकिस्तानी सेना ने उनके विमान पर स्टिंगर मिसाइल दागी, जिससे विमान क्षतिग्रस्त हो गया और आहूजा को भी इजेक्ट करना पड़ा। वह सुरक्षित रूप से नीचे उतरे, लेकिन पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया और हिरासत में यातनाएं देने के बाद उनकी हत्या कर दी गयी। भारत को बाद में उनका शव वापस मिला, जिस पर अमानवीय यातनाओं और गोली लगने के निशान थे।
इसके अलावा, स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर के नेतृत्व वाला एमआई-17 हेलीकॉप्टर भी स्टिंगर मिसाइल की चपेट में आ गया था। इस हमले में पुंडीर समेत चार वायुसेनाकर्मी शहीद हुए। शुरुआती नुकसान ने भारतीय वायुसेना को अपनी रणनीति पर तत्काल पुनर्विचार के लिए मजबूर किया। दुश्मन की कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलों के खतरे को देखते हुए वायुसेना ने ऊंचाई से हमले की नई रणनीति अपनाई और आगे चलकर जीपीएस-सहायता प्राप्त बमबारी तथा मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों के इस्तेमाल ने अभियान की दिशा ही बदल दी।
उस दौरान जीपीएस और हाथ में पकड़े जाने वाले कैमरों जैसी उपलब्ध तकनीक का तत्काल संचालन संबंधी जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया गया। पायलटों ने हमले के लिए नई रणनीतियां और नए कोण विकसित किए। कम ऊंचाई वाले तोशे मैदान अभ्यास क्षेत्र में इनका परीक्षण किया गया और वहां मिले आंकड़ों को 18,000 फीट तक की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप दोबारा समायोजित किया गया। यह कोई जुगाड़ नहीं था; यह युद्ध के दबाव में पैदा हुआ रणक्षेत्र का नवाचार था।
लेकिन जीपीएस की कहानी में भी एक बड़ा मिथक है। हम आपको बता दें कि उपलब्ध विवरण वेब सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में दिखाई गई कहानी से विपरीत बातें कहते हैं। विवरण के अनुसार, अमेरिका ने जानबूझकर भारत के जीपीएस संकेत को बिगाड़कर भारतीय सेना को धोखा नहीं दिया था। तत्कालीन वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ के अनुसार, समस्या भारतीय सैन्य नक्शों में इस्तेमाल होने वाली पुरानी एवरेस्ट स्फेरॉयड संदर्भ प्रणाली और जीपीएस में इस्तेमाल होने वाली डब्ल्यूजीएस-84 निर्देशांक प्रणाली के बीच अंतर से पैदा हुई थी। पायलटों को कागजी नक्शों पर लक्ष्यों को चिह्नित करके समोच्च रेखाओं की गणना करनी पड़ती थी और निर्देशांकों में मैन्युअल रूप से सुधार करना पड़ता था।
साथ ही उस समय अमेरिका की चयनात्मक उपलब्धता नीति के तहत नागरिक जीपीएस की सटीकता जानबूझकर घटाई जाती थी और भारत, 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण, सैन्य-स्तरीय एनकोडेड जीपीएस सेवा तक पहुंच से वंचित था। यही तकनीकी निर्भरता आगे चलकर भारत की रणनीतिक सोच में निर्णायक साबित हुई।
इसके अलावा, उस समय बेंगलुरु स्थित विमान एवं प्रणाली परीक्षण प्रतिष्ठान में विमानों को तेजी से लेजर-निर्देशित बमों और लाइटनिंग लक्ष्य-निर्देशन उपकरणों के लिए तैयार किया गया था। जून की शुरुआत तक मिराज-2000 विमान अभियान के लिए तैयार हो चुके थे। 17 जून को मुंथो धालो में पाकिस्तानी रसद अड्डे पर हमला हुआ, जिसने उनकी आपूर्ति व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया। इसके बाद टाइगर हिल पर मिराज-2000 के सटीक हमलों ने जमीनी सैनिकों के लिए निर्णायक बढ़त तैयार की।
उधर, युद्ध के बाद यह एहसास गहरा हुआ कि युद्धकाल में स्थिति-निर्धारण और दिशा-निर्धारण जैसी बुनियादी क्षमताओं के लिए भी किसी विदेशी शक्ति पर निर्भर रहना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम है। इसी सोच से भारत ने अपना स्वतंत्र क्षेत्रीय उपग्रह-आधारित दिशा-निर्धारण तंत्र विकसित करने की दिशा पकड़ी और आगे चलकर नाविक सामने आया। यह प्रणाली भारत और उसकी सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र को कवर करने के लिए तैयार की गई।
NavIC की असली ताकत सिर्फ मोबाइल फोन में रास्ता दिखाना नहीं है। इसका एक खुला सिग्नल आम नागरिक उपयोग के लिए है, जबकि एन्क्रिप्टेड प्रतिबंधित सिग्नल सैन्य उपयोग के लिए बनाया गया है। भारत ने अपनी जरूरतों के मुताबिक ऐसी व्यवस्था तैयार की जिसमें संकट की घड़ी में नेविगेशन की चाबी किसी बाहरी शक्ति के हाथ में न रहे।
अब नाविक की अगली पीढ़ी भी तैयार हो रही है। एनवीएस श्रृंखला के नए उपग्रह पुराने उपग्रहों की कई कमियों को दूर कर रहे हैं। इनमें ज्यादा लंबी उम्र, बेहतर संकेत और भारत में ही बनाए गए परमाणु घड़ियों जैसी अहम तकनीकें शामिल हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें एल-1 संकेत भी जोड़ा गया है। इससे नाविक को अब विशेष उपकरणों तक सीमित रखने के बजाय आम स्मार्टफोन में भी सीधे इस्तेमाल करना आसान हो जाएगा।
देखा जाये तो यही कारगिल की सबसे बड़ी रणनीतिक विरासत है। आज नेविगेशन सिर्फ Google Maps का मामला नहीं है। यह मिसाइलों की दिशा, युद्धपोतों की स्थिति, सीमावर्ती गश्त और सैन्य अभियानों की सटीकता से जुड़ा है। 1999 में भारत ने बर्फीली चोटियों पर लड़ते हुए एक सबक सीखा था कि युद्ध के मैदान में आत्मनिर्भरता कोई नारा नहीं, युद्धक क्षमता है। कारगिल की चोटियों पर भारतीय पायलटों ने जब पतली हवा, सीमित तकनीक और असंभव लगते लक्ष्यों के बीच रास्ता बनाया था, तब शायद उन्हें अंदाजा नहीं था कि उस संघर्ष की एक अदृश्य लड़ाई अंतरिक्ष में भी शुरू हो चुकी है। वह लड़ाई थी किसी और के GPS पर निर्भर भारत और अपने नेविगेशन सिस्टम वाले भारत के बीच।
बहरहाल, उस दौर से मिली सीख को मोदी सरकार ने गंभीरता से लिया। मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता बनाया और हथियारों, मिसाइलों, विमानों, तोपों, युद्धपोतों से लेकर रक्षा तकनीक तक देश में ही विकसित और निर्मित करने पर जोर दिया। अब इन प्रयासों के नतीजे भी दिखाई देने लगे हैं। भारत न केवल अपनी सेनाओं की जरूरतों के लिए तेजी से स्वदेशी प्रणालियां तैयार कर रहा है, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों को भी रक्षा उपकरण निर्यात करने की स्थिति में पहुंच रहा है। यानी कारगिल के समय जिस तकनीकी निर्भरता ने भारत को अपनी कमजोरियां दिखाईं थीं, आज वही भारत रक्षा आत्मनिर्भरता के रास्ते पर आगे बढ़कर अपनी सामरिक स्वतंत्रता को मजबूत कर रहा है।
-नीरज कुमार दुबे