By विजय कुमार | Feb 03, 2017
पांच सितम्बर को भारत में ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है। इस दिन राष्ट्रपति महोदय देश भर के श्रेष्ठ शिक्षकों को सम्मानित करते हैं। यद्यपि इन दिनों राजनीति जीवन के हर क्षेत्र में हावी हो गयी है। अतः शिक्षकों का चयन भी निष्पक्ष नहीं रहता। फिर भी राष्ट्रपति से सम्मानित होना हर अध्यापक के लिए गौरव की बात तो है ही। गत पांच सितम्बर को हुए समारोह का समाचार दूरदर्शन पर देखते हुए मैं अचानक चौंक गया। सम्मानित शिक्षकों में एक मेरठ के विकलांग अध्यापक मोहन सिंह भी थे। वे पहिया कुर्सी पर चलते हुए आगे आये। उनकी असमर्थता देखकर राष्ट्रपति महोदय स्वयं नीचे उतरे और उन्हें सम्मानित किया। पत्रकारों के लिए यह दृश्य विशेष था। अतः दूरदर्शन पर बार-बार इसे दिखाया गया। अगले दिन समाचार पत्रों ने भी इसे प्रमुखता से छापा।
उन दिनों हमारे गांव में हाई स्कूल तक ही शिक्षा की व्यवस्था थी। सोहन की पढ़ाई में कोई खास रुचि नहीं थी। इसलिए वह दसवीं के बाद पिताजी के साथ खेती में लग गया। सरिता को घर वालों ने हाई स्कूल के बाद पढ़ाना उचित नहीं समझा और उसका विवाह कर दिया; पर मोहन पढ़ने में अच्छा था। उसके पिताजी चाहते थे कि वह पढ़कर कहीं सरकारी नौकरी में लग जाए, तो खेती के अलावा आय का एक स्रोत और हो जाएगा। कुछ ऐसे ही विचार मेरे पिताजी के भी थे। अतः हम दोनों मेरठ में एक कमरा किराये पर लेकर पढ़ने लगे। मई-जून में परीक्षा होनी थी। हम तैयारी में लगे थे। उसी समय हमारे गांव के प्रधान जी के लड़के राहुल का मोदीनगर में विवाह तय हो गया। वह उन दिनों लखनऊ में एम.बी.बी.एस. अंतिम वर्ष का छात्र था। राहुल ने हम दोनों को बारात में चलने को कहा। मोहन तो तैयार हो गया; पर मेरे पिताजी खुद जा रहे थे, अतः इच्छा होने पर भी मेरा नंबर कट गया।
सामान्यतः गांव की बारातें ट्रैक्टर ट्राली में जाती हैं; पर प्रधान जी का परिवार सम्पन्न था। अतः बारात के लिए दो बस और दो कार किराये पर ली गयी थीं। ठीक समय से सब लोग मोदीनगर पहुंच गये। एक धर्मशाला में सबके रुकने की व्यवस्था थी। कुछ विश्राम और फिर बढ़िया नाश्ते के बाद बारात चलने को तैयार हो गयी। दूल्हे राजा घोड़ी पर चढ़ गये। बैंड के स्वर से लोग मस्ती में आ गये। हर कोई दूल्हे के आगे नाचते हुए फोटो खिंचवाकर इस अवसर को यादगार बना लेना चाहता था। डेढ़ घंटे की इस कवायद के बाद बारात कन्या पक्ष के घर पहुंच गयी। द्वाराचार के बाद बाराती भोजन करने लगे। दूसरी ओर दूल्हे के मित्रों और दुल्हन की सहेलियों में जुबानी छेड़छाड़ होने लगी। आखिर दूल्हे ने उन्हें चांदी के छल्ले उपहार में दिये। तब जाकर दूल्हे राजा को भोजन नसीब हुआ। इसके बाद निर्धारित समय पर विवाह की धार्मिक रस्में पूरी हुईं। विदा के समय दूल्हा और दुल्हन एक कार में बैठे, तो दूसरी में कुछ खास सम्बन्धी। बैंड वाले ‘‘छोड़ बाबुल का घर, आज पी के नगर, मोहे जाना पड़ा..’’ जैसी मार्मिक धुन बजा रहे थे। दुल्हन की मां, बहिनें और सहेलियां फफक कर रोने लगीं। उसके पिताजी भी आंसू पोंछ रहे थे।
अचानक पीछे वाली कार का चालक गाड़ी को चालू हालत में छोड़कर किसी काम से नीचे उतरा। अगली सीट पर बैठा एक युवक भी उधर से ही उतरने लगा। समय की बात, उसका पैर क्लच पर पड़ा और हाथ गियर से टकरा गया। इससे कार गियर में आकर झटके से आगे बढ़ गयी। मोहन उस समय कार के आगे से निकल रहा था। कार से टकराकर वह नीचे गिरा और कार उसकी कमर पर से होती हुई अगली कार से जा टकराई।
चारों तरफ हाहाकार मच गया। मोहन को देखा, तो वह बेहोश हो चुका था। उसके सिर पर भी चोट आयी थी। विदाई का सारा माहौल खराब हो गया। जैसे-तैसे लोगों ने दूल्हे वाली कार को घर रवाना किया और दूसरी कार में मोहन को डालकर मेरठ के मैडिकल कॉलेज में दौड़े। वहां आपातकालीन कक्ष में उसे भर्ती कर लिया गया। अगले दिन कई तरह की जांच से पता लगा कि उसकी रीढ़ की हड्डी बुरी तरह टूट चुकी थी। इलाज के दौरान कई ऑपरेशन हुए। घर वालों ने खूब पैसा खर्च किया; पर छह महीने बाद जब वह घर आया, तो उसकी दोनों टांगें बेकार हो चुकी थीं। इससे भी खराब बात यह थी कि कमर से नीचे के अंगों पर उसका अब कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। उसे पता ही नहीं लगता था कि कब उसके कपड़े गंदे हो गये। कमरे में हर समय दुर्गन्ध फैली रहती थी। अतः उसके मित्र और परिचितों ने वहां आना बंद कर दिया। इससे उसका मनोबल गिर गया और उसने घर वालों से भी बोलना कम कर दिया।
इस दुर्घटना से मोहन की पढ़ाई छूट गयी। दूसरी ओर मैंने गणित में एम.एस-सी. और फिर पी-एच.डी. किया। इससे मुझे दिल्ली वि.वि. में नौकरी मिल गयी। मैं घर में अकेला पुत्र था। दोनों बहिनों का विवाह हो चुका था। गांव में हमारी छोटी सी जमीन थी। नौकरी पक्की होने पर मैंने पिताजी को उसे बेचने के लिए राजी कर लिया। इस प्रकार हम गांववासी से दिल्लीवासी हो गये। जब तक पिताजी जीवित रहे, वे किसी सुख-दुख में गांव हो आते थे; पर उनके बाद गांव से हमारा नाता टूट गया।
इसी तरह समय बीतता रहा। मोहन का कष्ट उसके पूरे परिवार का कष्ट हो गया। सबसे बड़ी समस्या उसकी सफाई की थी। बड़े शहरों में तो पैसे लेकर ऐसे सेवक उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां हैं; पर यहां तो ये जिम्मेदारी उसके माता-पिता ही निभाते थे। इस बीच उसके पिताजी कैंसर के शिकार हो गये। मोहन की बीमारी ने उन्हें आर्थिक रूप से तो कमजोर कर ही दिया था, अब कैंसर ने उन्हें मन से भी तोड़ दिया। दो महीने के इलाज के बाद वे समझ गये कि अब मामला किनारे पर है। अतः उन्होंने एक वकील बुलाकर अपनी सम्पत्ति का पहला वारिस अपनी पत्नी को बनाया और उसके बाद अपने बेटों को। वे जानते थे कि मोहन अब कभी खेती नहीं कर सकेगा। अतः खेत उन्होंने सोहन के नाम कर दिये और मकान मोहन के नाम। इसके एक महीने बाद वे चल बसे।
मोहन की मां पर तो इससे मानो वज्रपात ही हुआ। उनका घर से निकलना बिल्कुल बंद हो गया। सोहन के मन में छोटे भाई के प्रति प्रेम था; पर उसकी पत्नी पूजा उसे बोझ समझती थी। जब से पिताजी ने मकान मोहन के नाम किया, तब से उसका व्यवहार और कठोर हो गया था। इससे मां बहुत परेशान रहने लगीं। उन्हें हमेशा ये डर लगता था कि मेरे बाद मोहन का क्या होगा ? वे बार-बार सोहन और बहू को समझाती थीं। जब कभी सरिता और उसके पति यहां आते, तो मां उनसे भी अपने बाद मोहन का ध्यान रखने को कहती थीं। इसी तरह दो साल और बीत गये। मां की स्थिति अब अच्छी नहीं थी। उनकी कमजोरी बढ़ने के साथ ही पूजा की उग्रता भी बढ़ रही थी। उसे लगता था कि मां के बाद मोहन की सफाई उसे ही करनी पड़ेगी। वह इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। उसके व्यवहार से लगता था कि वह मां की आंखें बंद होते ही मोहन को कहीं घर से न निकाल दे। यद्यपि मकान मोहन के ही नाम था; पर पूजा जानती थी कि वह मुकदमा नहीं लड़ सकता। एक बार मां ने किसी काम से वह संदूक खोला, जिसमें महत्वपूर्ण कागज रखे थे, तो वहां वसीयत न पाकर उसका माथा ठनक गया। अर्थात सोहन ने वह वसीयत अपने कब्जे में कर ली थी। इससे मां कई आशंकाओं से घिर गयीं।
उधर जिस राहुल के विवाह में यह दुर्घटना हुई थी, वह विवाह के एक साल बाद पत्नी सहित विदेश चला गया। वहां उसे एम.एस. में तथा उसकी पत्नी ममता को नर्सिंग के पाठ्यक्रम में प्रवेश मिल गया। पढ़ाई पूरी कर उन्होंने वहीं नौकरी कर ली। दस साल बाहर रहकर उन्होंने खूब धन कमाया और फिर वापस आकर मेरठ में अपना अस्पताल बना लिया। उनके परिश्रम से वह अस्पताल शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया। व्यस्तता के बावजूद राहुल और ममता कभी-कभी गांव भी आ जाते थे। राहुल को मोहन की स्थिति पता थी। एक बार जब वह उससे मिलने गया, तो सोहन सपरिवार कहीं बाहर गया था। घर पर मां और सरिता ही थी। बातचीत में मां की पीड़ा आंखों से बह निकली। राहुल के मन में यह अपराधबोध तो था ही कि उसके विवाह में हुई दुर्घटना से मोहन की यह स्थिति हुई है। उसने मांजी के पांव छूकर वचन दिया कि वह उसका पूरा ध्यान रखेगा। उसने सरिता को कहा कि यदि कोई गड़बड़ हो, तो उसे तुरंत सूचना दे।
और छह महीने बाद वही हुआ, जिसका डर था। मांजी का निधन होते ही मोहन के लिए मुसीबत आ गयी। कुछ दिन सरिता उसके पास रही; पर उसके जाते ही पूजा ने मोहन का पलंग कमरे से हटाकर पीछे वाले बरामदे में लगा दिया। सोहन ने गांव के एक सफाई कर्मचारी को नियुक्त कर दिया। वह सुबह और शाम वहां आता था; पर बाकी सारे दिन मोहन गंदगी में ही पड़ा रहता था। एक बार वह सफाई कर्मचारी ही बीमार हो गया। अतः दो दिन तक मोहन ऐसे ही पड़ा रहा। उसका जीवन मानो नरक जैसा हो गया। सरिता ने एक बार घर में बात की, तो पूजा ने उसे डांट दिया। इसके बाद तो पूजा का व्यवहार और भी खराब हो गया। वह प्रायः मोहन को भोजन देर से देती थी। कभी सब्जी में नमक कम होता था, तो कभी दाल में मिर्च अधिक। एक बार उसने मोहन को धमकाते हुए कहा कि वह मकान से अपना दावा छोड़ दे, वरना ठीक नहीं होगा। इससे मोहन को लगा कि कहीं वह धोखे से उसे जहर न दे दे। इससे वह खाना खाते हुए डरने लगा।
इस तरह की बातें दबी भले ही रहें; पर सदा के लिए छिपती नहीं हैं। अतः सोहन और पूजा के दुर्व्यवहार की चर्चा गांव से होते हुए राहुल तक भी पहुंच गयी। उसने अपने पिताजी से बात की। उसके पिताजी गांव के प्रधान थे। उन्होंने सोहन को समझाया; पर सोहन का कहना था कि घर में काम करने वाला मैं अकेला हूं। मोहन के खाने, दवाई और सफाई पर एक हजार रु. महीना खर्च हो रहा है। मुझे अपना परिवार भी देखना है। फिर भी जितना संभव है, मैं कर रहा हूं। प्रधान जी ने कहा, ‘‘सुना है गजेसिंह अपनी वसीयत में मकान मोहन के नाम कर गये हैं।’’ सोहन यह सुनकर चौंका। इसका पता उन्हें कैसे लगा ? हो सकता है पिताजी ने कभी उन्हें बताया हो; पर इसके कागज तो उसके ही पास थे। अतः वह संभलकर बोला, ‘‘जी नहीं। पिताजी ऐसी कोई वसीयत करके नहीं गये।’’ प्रधान जी समझ गये कि अब सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा। अतः उन्होंने उंगली टेढ़ी कर दी।
इस क्षेत्र के साठ गांवों में सैकड़ों साल से जिस वंश और गोत्र के लोग बसे थे, प्रधान जी उनके भी मुखिया थे। इस नाते उन्हें ‘साठा स्याणा’ कहा जाता था। ग्राम प्रधान का पद तो राजनीतिक था; पर ‘साठा स्याणा’ का पद परम्परागत था। सामाजिक क्षेत्र में उनका कहा टाला नहीं जा सकता था। मासिक ‘स्याणा पंचायत’ में बिरादरी का कोई भी व्यक्ति अपनी बात कह सकता था। इससे अनेक घरेलू समस्याएं वहीं निबट जाती थीं। प्रधान जी ने जब देखा कि सोहन आसानी से मानने वाला नहीं है, तो उन्होंने उसे अगली पंचायत में हाजिर होने को कहा। पहले तो सोहन ने सोचा कि वहां न जाए। पिताजी की वसीयत का किसी और को क्या पता है ? पर पूजा के कहने से वह चला गया। वहां प्रधान जी तथा अन्य सदस्यों ने उसे एक बार फिर समझाया; पर सोहन ने पुरानी बातें दोहरा दीं। इस पर प्रधान जी ने उसके पिता की वसीयत उसके सामने रख दी।
सोहन के माथे पर पसीना आ गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह वसीयत प्रधान जी के पास कैसे आ गयी ? असल में उसके पिताजी ने मूल वसीयत के साथ ही उसकी एक दूसरी प्रति बनवाकर सरिता के पास रखवा दी थी। प्रधान जी के पास जो प्रति थी, वह सरिता वाली ही थी। पिछले कुछ दिनों से पूजा भाभी द्वारा मोहन से हो रहे दुर्व्यवहार से सरिता बहुत दुखी थी। उसने राहुल को सब बताया और वसीयत की यह प्रति उसे दे दी। राहुल ने अपने पिताजी से बात की और सोहन को पंचायत में बुलवा लिया। लेकिन सोहन इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था। वह बोला, ‘‘आप जो वसीयत मुझे दिखा रहे हैं, वह झूठी है। मैं इसे अदालत में चुनौती दूंगा।’’
प्रधान जी बोले, ‘‘देखो सोहन, अदालत का रास्ता तो खुला ही है; पर गांव और बिरादरी की बात यहीं निबट जाए, तो अच्छा है। जिस सरकारी वकील ने तुम्हारे पिताजी की वसीयत लिखी थी, मेरी उससे बात हो गयी है। अदालत में वह हमारी ओर से खड़ा होगा। हमने इस मामले पर खूब विचार किया है। हम जो कह रहे हैं, पूरी तरह ठोक बजाकर ही कह रहे हैं। सोहन ने सोचने के लिए कुछ समय मांगा। प्रधान जी ने उसे अगली पंचायत में फिर आने को कहा। जब वह चलने लगा, तो प्रधान जी बोले, ‘‘एक बात और भी समझ लो सोहन। अदालत का निर्णय तो पता नहीं दस साल में आये या बीस साल में; पर यदि तुमने हमारी बात नहीं मानी, तो बिरादरी में तुम्हारा हुक्का-पानी बंद रहेगा। मोहन की व्यवस्था तो हम कर लेंगे; पर तुम्हारा क्या होगा, ये सोच लो।’’
सोहन की रातों की नींद उड़ गयी। हुक्का-पानी बंद होने का अर्थ था कि सुख-दुख में अब कोई उसके घर नहीं आएगा और न ही कोई उसे अपने घर बुलाएगा। उसके बच्चों के विवाह बिरादरी में नहीं होंगे। उसने अपनी ससुराल में पूछा, फिर सरिता और उसके पति से बात की। सबने उसे प्रधान जी की बात मानने को कहा। उसने राहुल से भी बात की। उसने साफ कह दिया कि हुक्का-पानी बंद होने पर उसे यह मकान भी खाली करना होगा। क्योंकि यह मोहन का है। सोहन का दिमाग एक महीने से पहले ही ठिकाने पर आ गया। अगली पंचायत में आकर उसने माफी मांगी और मोहन का पूरा ध्यान रखने का लिखित में वचन दिया।
लेकिन घर में कुछ व्यावहारिक समस्याएं भी थीं। सोहन के बच्चे बड़े हो रहे थे। उन्हें भी रहने के लिए जगह चाहिए थी। दो कमरे नीचे थे और एक ऊपर। अतः ऊपर दो नये कमरे बनवाये गये। अब सोहन का परिवार ऊपर ही चला गया। इधर राहुल ने अपने अस्पताल से एक सेवक वहां भेज दिया। भोजन की व्यवस्था सोहन के जिम्मे थी। दवाइयां अस्पताल से आ जाती थीं। गीत-संगीत सुनने के लिए राहुल ने एक अच्छा टू इन वन भी भेज दिया। इस सबसे मोहन का जीवन कुछ आसान हो गया। सेवक शाम को उसे पहिया कुर्सी पर लेकर घुमाने लगा। इससे गांव वालों से उसकी राम-राम होने लगी। कुछ पत्र-पत्रिकाएं भी वहां आने लगीं। इससे उसका मन भी क्रमशः ठीक होने लगा।
राहुल स्वयं एक सर्जन था। उसने अपने अस्पताल में मोहन का ऑपरेशन कर उसकी मूत्रनली में स्थायी रूप से एक नली डाल दी, जिससे मूत्र एक थैली में जमा होता रहता था। एक थैली उसके पेट पर लग गयी, इसमें उसका मल एकत्र होने लगा। दिन में दो बार उन्हें साफ करना पड़ता था। इसके लिए प्रशिक्षित सेवक था ही। इससे मोहन हर समय की गंदगी से मुक्त हो गया; पर राहुल अपने अपराधबोध से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ था। उसे अभी और भी बहुत कुछ करना था। मोहन प्रथम श्रेणी का विद्यार्थी रहा था। यद्यपि पढ़ाई छूटे 15 साल हो चुके थे, फिर भी राहुल ने उसे ग्राम सभा के विद्यालय में पढ़ाने के लिए राजी कर लिया। प्रधान जी को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी।
विद्यालय मोहन के घर के पास ही था। मोहन अपने सेवक के साथ पहिया कुर्सी पर चलकर विद्यालय आने लगा। मल और मूत्र की थैलियां उसके कपड़ों के नीचे छिपी रहती थीं। शुरू में उसे प्राथमिक कक्षाएं पढ़ाने का काम मिला; पर उसकी पढ़ाने की शैली इतनी अच्छी थी कि प्राचार्य जी ने दो साल बाद ही उसे जूनियर कक्षा में गणित पढ़ाने की जिम्मेदारी दे दी। इस सबसे मोहन का विश्वास फिर जाग्रत होने लगा। दो साल में उसकी नौकरी पक्की हो गयी और उसे सरकार द्वारा निर्धारित वेतन मिलने लगा। उसने शाम को अपने घर पर आसपास के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना शुरू कर दिया। अब सोहन के बच्चे भी वहीं बैठकर पढ़ने लगे। पूजा के मन में वहां की गंदगी के कारण जो दुराव था, वह भी अब दूर हो गया।
धीरे-धीरे ऐसे ही आठ साल और बीत गये। मोहन ने इस दौरान अपनी पढ़ाई को पूरा करते हुए एम.ए. और बी.एड. कर लिया। अतः विद्यालय के प्रधानाचार्य जब सेवामुक्त हुए, तो इस पद पर उसे नियुक्ति मिल गयी। अब तो उसकी सक्रियता और भी बढ़ गयी। पढ़ने में कमजोर बच्चों के लिए उसने विशेष कक्षाएं शुरू करवा दीं। उसका अपना खर्च तो कुछ खास था नहीं। अतः अपने वेतन से वह इन कक्षाओं का खर्च उठाने लगा। इससे जहां एक ओर छात्रों का परीक्षा परिणाम अच्छा हुआ, वहां गांव में उसकी लोकप्रियता भी बढ़ने लगी। बड़े लोग भी अब उसे ‘गुरुजी’ कहने लगे। प्रधान जी के निधन के बाद पूरा गांव उसे निर्विरोध ग्राम प्रधान बनाने को तैयार था; पर उसने हाथ जोड़ लिये। वह अपनी पूरी शक्ति छात्रों के विकास में ही लगाना चाहता था।
मोहन के परिश्रम और लगन से उसके विद्यालय के छात्र परीक्षा में शीर्ष स्थान पाने लगे। इससे जिला प्रशासन का ध्यान इस ओर गया। अतः उसे कई सम्मानों से अलंकृत किया गया। पिछले साल गांव के एक छात्र ने इंटर की परीक्षा में उ.प्र. में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये। जब अखबार और दूरदर्शन वाले उससे मिले, तो उसने इसका श्रेय मोहन गुरुजी को दिया। इस पर जिलाधीश महोदय ने ‘आदर्श शिक्षक सम्मान’ के लिए उनके नाम की संस्तुति प्रदेश शासन को कर दी। वहां से यह नाम केन्द्र में पहुंच गया और इससे आगे की घटना का उल्लेख शुरू में हुआ ही है।
मोहन अपनी कहानी सुनाते हुए कई बार भावुक हुआ, ‘‘राहुल के विवाह में जो दुर्घटना हुई, वह शायद मेरे पूर्वजन्म के किसी पाप का फल होगा; पर ये भी सच है कि यदि राहुल ने रुचि न ली होती, तो मैं आज भी घर के पिछले बरामदे में गंदगी में ही पड़ा होता। राहुल मेरे लिए देवता के समान है। मैं उसका उपकार कभी नहीं भूल सकता।’’ घर आकर मैंने टी.वी. खोला। वहां एक फिल्मी गीत बज रहा था- गरीब जान के हमको न तुम मिटा देना। तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना..।
मैं अभी तक असमंजस में हूं कि मोहन और राहुल के रिश्ते को क्या नाम दूं? दर्द, दवा या दोनों?
- विजय कुमार