By नीरज कुमार दुबे | Oct 09, 2026
पाकिस्तान में असली सत्ता प्रधानमंत्री और संसद के हाथ में है या सेना प्रमुख असीम मुनीर के? यह सवाल एक बार फिर इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि असीम मुनीर ने सऊदी अरब में अतिरिक्त पाकिस्तानी सैनिक भेजने का फैसला किया है। खास बात यह है कि 2015 में पाकिस्तान की संसद ने यमन युद्ध से दूर रहने का फैसला किया था, लेकिन अब उसी फैसले के उलट सैन्य तैनाती की तैयारी हो रही है। बताया यह भी जा रहा है कि अतिरिक्त सैनिक भेजने से पहले शहबाज शरीफ से कोई मशविरा भी नहीं किया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान में अब संसद की नहीं, बल्कि सेना प्रमुख की ही चलती है?
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रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान पहले ही सऊदी अरब में करीब 8,000 सैनिक भेज चुका था। अब अतिरिक्त सैन्य सहायता की प्रतिबद्धता सामने आई है। हालांकि, सैनिकों की नई संख्या, उनकी तैनाती की अवधि, मिशन और युद्ध में उनकी संभावित भूमिका सार्वजनिक नहीं की गई है। पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने कहा है कि आवश्यक सरकारी प्रक्रियाएं पूरी की गई हैं, लेकिन उसने स्पष्ट नहीं किया कि इस फैसले में मंत्रिमंडल या संसद की क्या भूमिका रही।
यही वह बिंदु है जहां सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति में निर्वाचित संस्थाओं की भूमिका लगातार सीमित हो रही है? बताया जा रहा है कि यह सारे फैसले अकेले मुनीर ने किये और इसकी भनक शहबाज शरीफ तक को नहीं लगने दी। हम आपको यह भी याद दिला दें कि अप्रैल 2015 में यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में शामिल होने के सवाल पर पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से तटस्थ रहने का फैसला किया था। साथ ही उसने सऊदी अरब की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के प्रति समर्थन जताया था। संसद का रुख था कि पाकिस्तान को यमन के संघर्ष में सीधे उतरने के बजाय संकट का शांतिपूर्ण समाधान तलाशना चाहिए।
आज की स्थिति में अंतर यह है कि सऊदी अरब की रक्षा के लिए सैन्य प्रतिबद्धता बढ़ाई जा रही है, जबकि 2015 में संसद ने सीधे यमन अभियान में भाग लेने से परहेज किया था। देखा जाये तो नई तैनाती के संभावित युद्ध संबंधी परिणामों पर पाकिस्तान संसद में बहस नहीं होना लोकतांत्रिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न है। यह साफ दिख रहा है कि पाकिस्तानी सेना अब घरेलू सत्ता-संरचना में कहीं अधिक प्रभावशाली हो चुकी है।
वैसे पाकिस्तान में असीम मुनीर की स्थिति को समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। अप्रैल 2022 में इमरान खान की सरकार गिरने के बाद नवंबर 2022 में मुनीर सेना प्रमुख बने। इसके बाद सैन्य प्रतिष्ठान का राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में प्रभाव लगातार चर्चा में रहा। 2025 में किए गए संवैधानिक बदलावों ने मुनीर को तीनों सेनाओं की कमान 2030 तक रखने, आजीवन फील्ड मार्शल का दर्जा पाने और आपराधिक अभियोजन से प्रतिरक्षा का प्रावधान दिया। इन बदलावों से सैन्य नेतृत्व की संस्थागत स्थिति और मजबूत हुई है। ऐसे में सऊदी अरब में सैनिकों की अतिरिक्त तैनाती का फैसला केवल विदेश नीति का मामला नहीं है। यह इस बात की भी परीक्षा है कि पाकिस्तान में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों पर संसद कितनी प्रभावी निगरानी रख सकती है।
दूसरी ओर, सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष भी तेजी से बढ़ रहा है। 7 और 8 अक्टूबर को रियाद और आभा के हवाई अड्डों पर हुए हमलों में तीन लोगों की मौत हुई और 36 लोग घायल हुए। 8 अक्टूबर को रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर फिर धमाके हुए और सऊदी एयरलाइंस के एक विमान को नुकसान पहुंचने की खबर आई। इसके बाद एयर इंडिया, इंडिगो और अकासा एयर ने रियाद आने-जाने वाली उड़ानें अस्थायी रूप से रोक दीं, जबकि लुफ्थांसा ने 16 अक्टूबर तक उड़ानें निलंबित करने की घोषणा की। रियाद में 275 से अधिक उड़ानें रद्द होने की खबर है। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने जवाबी कार्रवाई में हूतियों के 80 से अधिक ठिकानों पर हमले किए हैं। इस तरह इस बढ़ते संघर्ष ने न केवल खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात और व्यापार पर भी गंभीर असर डालना शुरू कर दिया है।
बहरहाल, पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा जोखिम यह है कि सऊदी अरब की रक्षा के लिए शुरू की गई तैनाती धीरे-धीरे यमन के भीतर प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई में बदल सकती है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। एक तो हूतियों की ओर से पाकिस्तानी सैनिकों या सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने का जोखिम बढ़ेगा। साथ ही इससे ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंधों पर दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, किसी लंबे सैन्य अभियान से पाकिस्तान के आर्थिक संसाधनों और घरेलू राजनीतिक स्थिरता पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
-नीरज कुमार दुबे