By रेनू तिवारी | Jan 23, 2026
भारत आज अपने सबसे तेजस्वी और निडर स्वतंत्रता सेनानियों में से एक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मना रहा है। हर साल 23 जनवरी को पूरा देश इस दिन को 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाता है। यह दिन न केवल नेताजी के जन्म का उत्सव है, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के लिए उनके अदम्य साहस, अद्वितीय त्याग और अटूट समर्पण के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक जरिया भी है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे साहसी, ओजस्वी और क्रांतिकारी नेता थे। उन्होंने भारत की आज़ादी के लिए न केवल देश के भीतर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया। उन्हें आज भी उनके अडिग इरादों और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" जैसे प्रेरक नारों के लिए याद किया जाता है।
अक्सर कहा जाता है कि जब आज़ादी का सपना एक अटूट संकल्प में बदल जाता है, तो सुभाष चंद्र बोस जैसा क्रांतिकारी पैदा होता है। उनका जीवन असाधारण, साहसी और बहुत प्रेरणादायक पलों से भरा था। भारत सरकार ने नेताजी की 125वीं जयंती के अवसर पर 23 जनवरी को 'पराक्रम दिवस' के रूप में घोषित किया था। इसका उद्देश्य युवाओं को नेताजी के जीवन से प्रेरणा लेने और विपरीत परिस्थितियों में भी निडर होकर देश सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
अक्सर इस दिन नेताजी के सैन्य नेतृत्व को याद करते हुए सशस्त्र बलों द्वारा विशेष प्रदर्शन किए जाते हैं। इस अवसर पर 'सुभाष चंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार' की घोषणा की जाती है, जो आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को दिया जाता है। दिल्ली के लाल किले और नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में नेताजी के जीवन और 'आजाद हिंद फौज' से जुड़ी दुर्लभ तस्वीरों और दस्तावेजों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। भारत सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के 21 सबसे बड़े अनाम द्वीपों का नाम 'परमवीर चक्र' विजेताओं के नाम पर रखा है, जिसकी घोषणा पराक्रम दिवस पर ही की गई थी। इंडिया गेट पर नेताजी की भव्य होलोग्राम और ग्रेनाइट प्रतिमा का अनावरण भी इसी समारोह की श्रृंखला का हिस्सा रहा है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस नरम स्वभाव वाले, इंतज़ार करने वाले नेता नहीं थे। वह साहसी थे, अन्याय के प्रति अधीर थे, और मानते थे कि आज़ादी के लिए लड़ाई ज़रूरी है, न कि अनुरोध। 23 जनवरी को जन्मे, वह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे शक्तिशाली चेहरों में से एक बन गए। वह इंडियन नेशनल आर्मी (आज़ाद हिंद फौज) के प्रमुख और आज़ाद हिंद सरकार के संस्थापक-प्रमुख थे। जबकि कई नेता बातचीत और चर्चा में विश्वास करते थे, नेताजी कार्रवाई में विश्वास करते थे। उनकी आग, अनुशासन और निडर रवैया आज भी ताज़ा लगता है।
नेताजी का मानना था कि "स्वतंत्रता दी नहीं जाती, ली जाती है।" उनका जीवन हमें सिखाता है कि आत्म-सम्मान और मातृभूमि की सेवा से बढ़कर कुछ भी नहीं है। आज भी उनका प्रसिद्ध नारा "जय हिंद" हर भारतीय के भीतर जोश भर देता है।
23 जनवरी, 1897 को ओडिशा के कटक में एक संपन्न परिवार में हुआ। वे बचपन से ही मेधावी थे। उन्होंने 1920 में इंग्लैंड में कठिन ICS (इंडियन सिविल सर्विस) परीक्षा पास की और चौथा स्थान प्राप्त किया। अंग्रेजों की सेवा करने के बजाय, उन्होंने अपनी शानदार नौकरी से इस्तीफा दे दिया और देश सेवा के लिए भारत लौट आए।
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और दो बार (1938 हरिपुरा और 1939 त्रिपुरी) कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए। महात्मा गांधी के अहिंसक मार्ग के प्रति सम्मान रखते हुए भी, नेताजी का मानना था कि अंग्रेजों को केवल अहिंसा से नहीं हराया जा सकता। इसी वैचारिक मतभेद के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और 'फॉरवर्ड ब्लॉक' नामक अपनी अलग पार्टी बनाई।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, नेताजी ने भारत से बाहर जाकर जर्मनी और जापान से मदद मांगी। उन्होंने 'आज़ाद हिंद फौज' (Indian National Army) की कमान संभाली और 'दिल्ली चलो' का नारा दिया। उन्होंने सिंगापुर में 'आज़ाद हिंद सरकार' (भारत की पहली अस्थायी सरकार) का गठन किया, जिसे कई देशों ने मान्यता दी थी।
उन्हें 'नेताजी' की उपाधि जर्मनी में भारतीय प्रवासियों और सैनिकों द्वारा दी गई थी। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि वे जहां भी गए, लोगों ने उन्हें अपना सर्वोच्च नेता माना।
आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि, उनकी मृत्यु आज भी भारतीय इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में से एक मानी जाती है, क्योंकि कई लोग इस दुर्घटना की थ्योरी पर विश्वास नहीं करते।