Partition Horrors Remembrance Day I 1947 में लिए गये Congress के गलत फैसले की कीमत आज भी चुका रहा है भारत

By नीरज कुमार दुबे | Aug 13, 2026

1947 का भारत विभाजन इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। लाखों लोग अपने घर-परिवार, जमीन-जायदाद छोड़ने पर मजबूर हुए, लाखों लोगों की हत्या हुई और करोड़ों लोग विस्थापन की त्रासदी से जूझे। यह एक ऐसा स्थायी घाव था, जो आज भी भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। देखा जाये तो कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने अंग्रेजों द्वारा पेश किए गए विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर ऐतिहासिक भूल की थी, जिसकी कीमत देश आज भी चुका रहा है।

इसे भी पढ़ें: World Organ Donation Day 2026: अंगदान की संस्कृति ही मानवता को नई दिशा दे सकती है

हम आपको याद दिला दें कि 1947 में विभाजन के समय पंजाब और बंगाल सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में रहे। परिवार बिछड़े, गांव और संपत्तियां सीमा के दो हिस्सों में बंट गईं और लाखों लोगों को अचानक अनिश्चित भविष्य की ओर पलायन करना पड़ा। विभाजन के कारणों को लेकर इतिहास में अलग-अलग व्याख्याएं देखने को मिलती हैं। मुस्लिम लीग की दो-राष्ट्र सिद्धांत की राजनीति, पाकिस्तान नामक अलग देश की मांग, सांप्रदायिक तनाव और ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति इसके प्रमुख संदर्भ रहे। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन योजना की घोषणा की और इसके बाद रैडक्लिफ आयोग ने भारत-पाकिस्तान की सीमा निर्धारित की। सीमाएं इतनी तेजी से खींची गईं कि लाखों लोग अपनी जमीन, पहचान और सुरक्षा को लेकर असमंजस में पड़ गए।

यहीं से कांग्रेस नेतृत्व के फैसले पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मांग और ब्रिटिश जल्दबाजी के सामने विभाजन स्वीकार करके उस विचार को अप्रत्यक्ष मान्यता दी कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। वहीं विभाजन समर्थक इतिहासकारों का कहना है कि उस समय व्यापक हिंसा, राजनीतिक गतिरोध और ब्रिटिश सत्ता की वापसी की जल्दबाजी के बीच एकीकृत भारत को बनाए रखना अत्यंत कठिन हो चुका था। इसलिए यह बहस आज भी जारी है कि क्या विभाजन टाला जा सकता था या वह उस समय की परिस्थितियों का लगभग अपरिहार्य परिणाम बन चुका था।

विभाजन की राजनीतिक कीमत के साथ इसकी भू-राजनीतिक कीमत भी सामने आई। पाकिस्तान के अस्तित्व ने भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में नई सुरक्षा चुनौतियां पैदा कीं। कश्मीर विवाद ने 1947 के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों को स्थायी तनाव में बदल दिया। इसके बाद 1947-48, 1965, 1971 और 1999 के युद्ध हुए तथा सीमा पार आतंकवाद लंबे समय तक राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती बना रहा। पाकिस्तान के साथ स्थायी सुरक्षा तनाव ने भारत के संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव डाला और रक्षा व्यय का बड़ा हिस्सा इस चुनौती से निपटने में लगा।

महात्मा गांधी का दृष्टिकोण भी इस पूरी कहानी को एक अलग नैतिक आयाम देता है। वह धर्म के आधार पर देश के विभाजन के विरोधी थे और ऐसी स्वतंत्रता चाहते थे, जिसमें शांति, सद्भाव और समानता हो। 15 अगस्त 1947 को उनका दिल्ली के सत्ता-केंद्रित समारोहों में शामिल नहीं होना इसी पीड़ा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि वह मानते थे कि यह वह ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ नहीं थी जिसके लिए उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग आंदोलनों की अगुवाई की थी।

साथ ही, इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने जिन देशों में विभाजन कराया उनमें भारत का विभाजन ही सबसे रक्तरंजित रहा। लाखों जानें गईं, करोड़ों लोग बेघर हुए और पीढ़ियों तक घाव ताजा रहे। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कांग्रेस का तत्कालीन नेतृत्व अंग्रेजों की चाल और उनकी ‘फूट डालो, राज करो’ नीति को भली-भांति समझता था, तब भी उन्होंने विभाजन का खुलकर विरोध क्यों नहीं किया था? क्या यह राजनीतिक थकान थी, साम्प्रदायिक हिंसा के दबाव में लिया गया समझौता था? या फिर सत्ता तक शीघ्र पहुंचने की अधीरता थी? जो भी कारण रहे हों, उनका परिणाम आज भी भारत भुगत रहा है। देखा जाये तो इतिहास के उस मोड़ पर लिया गया निर्णय न केवल तत्कालीन पीढ़ी के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्थायी संकट का कारण बन गया।

बहरहाल, 79 साल बाद भी विभाजन के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कश्मीर, सीमा पार आतंकवाद, रक्षा बोझ, सामाजिक अविश्वास और राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे इस इतिहास की लंबी छाया की याद दिलाते हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा सबक यही है कि राजनीतिक फैसलों के परिणाम केवल तत्कालीन पीढ़ी तक सीमित नहीं रहते। इसलिए 14 अगस्त का विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल शोक का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन भी है। साथ ही उन लाखों लोगों को नमन करने का दिन भी है जिन्होंने अपनी जान, घर और पहचान खोई; और यह संकल्प लेने का दिन भी है कि इतिहास की त्रासदियों को दोहराने की बजाय उनसे सीख लेकर भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को और मजबूत किया जाए।

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

Election Commission ने 17 राज्यों में वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण का दिया निर्देश, 4 जनवरी को अंतिम प्रकाशन

BJP का Rahul Gandhi पर हमला, सत्ता के लिए देश में तख्तापलट की साजिश का लगाया आरोप

लखनऊ में PM Narendra Modi को समर्पित ‘नमो डिजिटल मंदिर’ शुरू, निर्माण के लिए मिला 11 लाख का दान

Nedumbassery Car Crash: केरल में कार हादसे की जांच सही दिशा में, CM Satheesan ने विपक्ष के आरोप नकारे