स्वरा भास्कर जैसे लोग हिंदुत्व को आतंक से जोड़कर समाज में जहर घोल रहे हैं

By डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र | Aug 23, 2021

कट्टरपंथी तालिबानी ताकतों की जीत पर भारतीय कट्टरपंथियों की प्रसन्नता जहां भारत में आने वाले भावी संकटों का संकेत देती है वहां कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली स्वरा भास्कर जैसी हिंदुत्व विरोधी शक्तियों के भ्रामक बयान भी चिंता उत्पन्न करते हैं। स्वरा ने ट्वीट करके लिखा है- "हम हिंदुत्व आतंक के साथ ठीक नहीं हो सकते हैं और तालिबान आतंक से सभी हैरान और तबाह हो गए हैं।" स्वरा की नजर में हिंदुत्व और तालिबान समान हैं। जैसे तालिबानी आतंकवादी है वैसे ही हिंदुत्व की बात करने वाले भी आतंकवादी हैं। यह बयान स्वयं को चर्चा में लाने के लिए जानबूझ कर दिया गया है। स्वरा को इस बात की कोई परवाह नहीं कि उनके ऐसे अनर्गल प्रलाप से न केवल करोड़ों हिन्दुओं की भावनाएं आहत हुई हैं अपितु देश के बहुसंख्यक वर्ग की छवि भी विश्वपटल पर धूमिल होती है। स्वरा को बताना चाहिए कि हिंदुओं ने तालिबानियों की तरह कब-कब लोकतंत्र की हत्या करके अपने देश की सत्ता पर कब्जा किया है और लोकतांत्रिक-संवैधानिक मानमूल्य ध्वस्त किए हैं ? हिंदुओं के कौन-से समूह ने देश के किस भाग से अन्य धर्मावलंबियों को पलायन करने पर विवश किया है ? उनकी संपत्ति लूटी है अथवा उनकी स्त्रियों पर बलात्कार किए हैं ? यदि नहीं तो इस प्रकार का गैर-जिम्मेदाराना बयान देना कहां तक उचित है ?

पिछले सत्तर वर्षों में इस्लामिक आतंकवाद ने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं का लगभग सफाया कर दिया है, अभी भी कर रहे हैं जबकि हिंदुस्तान में मुस्लिम आबादी हिंदुओं की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ी है। यह प्रमाण है कि हिंदुओं के शासन में आतंक का स्थान नहीं, हिंदू सहिष्णु हैं, उदार हैं। इसीलिए हिंदुओं ने बहुसंख्यक होकर भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा स्वीकार कर ली। यदि हिंदू कट्टर और आतंकवादी होते तो यह देश हिंदू-राष्ट्र होता। इसमें कश्मीरी पंडितों को पलायन नहीं करना पड़ता और गोधरा में उनसठ हिंदुओं को जिंदा जलाने जैसी भीषण दुर्घटनाएं नहीं होतीं। तब शायद हिंदू-विरोध की पर्याय बन चुकी कम्युनिस्ट विचारधारा का चिह्न भी इस देश में ना होता।

क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया दोनों भिन्न कार्य हैं। उन्हें समान समझना अथवा समान बताना भ्रम उत्पन्न करना है। यदि क्रिया न हो तो प्रतिक्रिया के लिए अवसर ही नहीं रह जाता। अतः क्रिया-प्रतिक्रिया के अंतर को समझते हुए तथ्यों और घटनाओं का विश्लेषण किया जाना चाहिए। सैंकड़ों वर्षों तक मंदिरों का बार-बार तोड़ा जाना क्रिया है और विवादित ढांचे का ध्वंस उसकी प्रतिक्रिया है। दोनों को एक समझना भूल होगी। क्रिया और प्रतिक्रिया की भांति हिंसा और प्रतिहिंसा भी भिन्न अर्थ व्यक्त करते हैं। गोधरा में हिंदुओं का जिंदा जलाया जाना क्रिया थी और उसके बाद हुए गुजरात दंगे उसकी प्रतिक्रिया थे। दोनों एक नहीं थे। समाज के कर्णधार कहे जाने वाले बुद्धिजीवियों-विचारकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे तथ्यपरक और सुचिंतित लेखन से समाज को सही दिशा देंगे किंतु दुर्भाग्य से हमारे देश में स्वयं को चर्चा में लाने के लिए जानबूझकर कुछ भी कहने-लिखने की कुरीति चल पड़ी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर तथाकथित महान लोगों का कुछ भी कहना-लिखना और समाज तथा शासन का उसे चुपचाप सह जाना इस लोकविरोधी दूराचरण को और भी प्रोत्साहित कर रहा है। बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर का ताजा ट्वीट इस तथ्य का साक्षी है।

स्वरा भास्कर के ट्वीट की पृष्ठभूमि में हिंदुत्व-विरोधी ताकतों की सक्रियता विद्यमान है। वोटबैंक की राजनीति करने वाले कुछ बड़े नेताओं ने मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए इस्लामिक आतंकवाद के प्रतिपक्ष में भगवा आतंकवाद का जुमला गढ़ा था। ओसामा-बिन-लादेन जैसे कुख्यात आतंकवादी सरगना को ओसामाजी कहकर संबोधित करने वाले और जाकिर नायक तथा हाफिज सईद जैसे कट्टरपंथियों को आदर देने वाले नेतृत्व ने इस्लामिक आतंक के बचाव में अपने प्रतिद्वंद्वी हिंदुत्ववादी दल को जनता के बीच बदनाम करने के लिए भगवा आतंकवाद का काल्पनिक और भ्रामक भूत खड़ा किया जिसे उनके समर्थकों ने हिंदुत्व आतंकवाद के नाम से प्रचारित किया है।

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इस्लाम के नाम पर जिहाद कहकर हिंसक आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहने वालों को क्लीन चिट देने के लिए जिन नेताओं ने कहा कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता उन्होंने ही हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए भगवा आतंकवाद कहकर उसे एक रंग दे दिया। कैसे दोहरे बयान हैं! वास्तव में किसी भी निर्दोष की हत्या किसी भी दृष्टि से सही नहीं कही जा सकती। किसी के भी साथ हुए अन्याय को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। किसी को भी किसी को डरा-धमका कर उससे अपनी बात मनवाने, उसे अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर करने का कोई हक नहीं है। इसलिए आतंक का कोई भी रूप कहीं से भी समर्थन योग्य नहीं कहा जा सकता फिर भी हिंदुस्तान में ऐसे नेताओं, कलाकारों और बुद्धिजीवियों की कमी नहीं दिखती जो एक ओर इस्लामिक आतंकवाद पर चुप्पी साध लेते हैं और दूसरी और प्रतिक्रिया स्वरूप होने वाली दुर्घटनाओं पर आसमान उठा लेते हैं। कश्मीरी पंडितों को पलायन पर विवश किए जाने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। पालघर में हिंदू साधुओं की पीट-पीटकर हत्या किया जाना उन्हें साधारण घटना लगती है लेकिन अशफाक की हत्या से वे इतने डर जाते हैं कि उन्हें देश छोड़ने पर विचार करने को मजबूर होना पड़ता है। कश्मीर घाटी में जान हथेली पर रखकर आतंकियों से जूझने वाले सैनिक उन्हें अत्याचारी लगते हैं और सैनिकों पर पत्थर बरसाने वाले उनकी नजर में भूले और भटके हुए बेरोजगार नौजवान हैं। पाकिस्तान में महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति तोड़े जाने की ताजी दुर्घटना पर इनके मुख से एक शब्द नहीं निकलता। आतंक की अमानवीय दुर्घटनाओं पर भारतीय समाज में होने वाली यह दोहरी मानसिकता जनित प्रतिक्रियाएं सामाजिक समन्वय के लिए घातक हैं। निजी स्वार्थों के लिए, अपनी राजनीति चमकाने अथवा संचार साधनों के माध्यम से चर्चा में बने रहने के लिए ऐसे भ्रामक बयानबाजों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही अपेक्षित है। समाज में जो जितना अधिक प्रसिद्ध-प्रतिष्ठित और चर्चित है, समाज को सही दिशा देने का उसका उत्तरदायित्व भी उतना ही अधिक है। अतः बड़े मुख से पक्षपात भरे छोटे बोल बोलना उचित नहीं है।

       

स्वरा जैसे लोगों को ‘हिंदुत्व आतंक’ जैसी भ्रामक शब्दावली गढ़ने से बाज आना चाहिए। सबके सुख के लिए पक्षपात रहित होकर सही को सही और गलत को गलत कहना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। अपराध, आतंक और अन्याय के विरोध में सबका एक साथ खड़ा होना आवश्यक है, एक साथ बोलना आवश्यक है। पक्षपात पूर्ण मनमाने बयान सामाजिक सद्भाव को आहत करते हैं। अतः सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोकप्रिय लोगों से संतुलित, सकारात्मक और तथ्यपूर्ण बयान अपेक्षित है।

-डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र

विभागाध्यक्ष-हिन्दी

शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय 

होशंगाबाद म.प्र.

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