By नीरज कुमार दुबे | Feb 23, 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि यह यात्रा भारत की सुरक्षा ढाल की नींव मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। हम आपको बता दें कि भारत पहले ही स्वदेशी बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली सुदर्शन चक्र के निर्माण में जुटा है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2035 तक प्रमुख शहरों और सामरिक प्रतिष्ठानों को मिसाइल और ड्रोन हमलों से सुरक्षित करना है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित 30 किलोवाट क्षमता की उच्च ऊर्जा लेजर आधारित निर्देशित ऊर्जा प्रणाली एमके टू ए इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अब भारत की नजर इजरायल की 100 किलोवाट श्रेणी की आयरन बीम प्रणाली पर है, जो आयरन डोम के साथ मिलकर कम दूरी की रॉकेट, मोर्टार और ड्रोन को कुछ ही क्षणों में ध्वस्त कर सकती है।
आयरन बीम की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लागत है। जहां पारंपरिक मिसाइल अवरोधन में भारी खर्च आता है, वहीं लेजर किरण से किया गया एक अवरोधन मात्र कुछ डॉलर के बराबर पड़ता है। ड्रोन झुंड जैसे हमलों के दौर में यह प्रणाली आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टि से क्रांतिकारी साबित हो सकती है।
हम आपको बता दें कि भारत सुदर्शन चक्र के तहत मध्यम और लंबी दूरी की बराक आठ प्रणालियों, एआई आधारित सेंसर और साइबर सुरक्षा तंत्र को एकीकृत कर रहा है। इसी के साथ इजरायल की एरो और डेविड स्लिंग जैसी दूरवर्ती अवरोधन प्रणालियों के तत्वों को भी समझा जा रहा है, ताकि बहुस्तरीय सुरक्षा कवच तैयार हो सके। देखा जाये तो ऑपरेशन सिंदूर ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य का युद्ध पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। उस दौरान भारत ने रैम्पेज मिसाइल, हारोप और हार्पी जैसे कामिकाजे ड्रोन तथा स्पाइस एक हजार सटीक मार्गदर्शित बमों का उपयोग कर पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों और सैन्य संपत्तियों को निशाना बनाया था। इन प्रणालियों ने सटीकता, मारक क्षमता और तकनीकी श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया था।
हम आपको यह भी बता दें कि फोर्ब्स इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 में इजरायल ने भारत के साथ 8.6 अरब डालर के रक्षा सौदों पर सहमति जताई है। इनमें राफेल द्वारा निर्मित स्पाइस एक हजार बम, 250 किलोमीटर मारक क्षमता वाली रैम्पेज वायु से भूमि मिसाइल, एयर लोरा बैलिस्टिक मिसाइल तथा 300 किलोमीटर रेंज वाली आइस ब्रेकर मिसाइल प्रणाली शामिल है। फ्रांस के बाद इजरायल भारत का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बन चुका है।
हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह यात्रा वर्ष 2017 के बाद इजरायल की दूसरी यात्रा है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा सहयोग को नई ऊंचाई दी जाएगी। कनेस्सेट में मोदी का संबोधन इस बढ़ती निकटता का प्रतीक होगा। पिछले नवंबर में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की इजरायल यात्रा के दौरान उन्नत तकनीकों के संयुक्त विकास और सह उत्पादन पर सहमति बनी थी। अब प्रस्तावित समझौता ज्ञापन इस सहयोग को और संस्थागत रूप देगा। भारत केवल खरीददार की भूमिका में नहीं रहना चाहता, बल्कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और स्वदेशी उत्पादन के माध्यम से आत्मनिर्भर रक्षा तंत्र खड़ा करना चाहता है।
देखा जाये तो इजरायल के साथ यह गहन सहयोग दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के सामरिक समीकरणों को नया आकार देगा। पहला प्रभाव प्रतिरोधक क्षमता में भारी वृद्धि का होगा। यदि आयरन बीम जैसी लेजर प्रणाली सुदर्शन चक्र का हिस्सा बनती है, तो पाकिस्तान की ड्रोन या रॉकेट आधारित रणनीति लगभग निष्प्रभावी हो सकती है। कम लागत में निरंतर अवरोधन की क्षमता दुश्मन के लिए हमले को आर्थिक रूप से भी अलाभकारी बना देगी।
दूसरा प्रभाव मनोवैज्ञानिक होगा। बहुस्तरीय वायु रक्षा कवच से लैस भारत के विरुद्ध आक्रामक कदम उठाने से पहले विरोधी को कई बार सोचना पड़ेगा। यह स्पष्ट संदेश होगा कि भारत अब केवल जवाब नहीं देता, बल्कि पहले से तैयार रहता है।
तीसरा प्रभाव क्षेत्रीय गठजोड़ के रूप में दिखेगा। नेतन्याहू द्वारा प्रस्तावित तथाकथित षटकोणीय गठबंधन, जिसमें भारत, ग्रीस, साइप्रस, अरब और अफ्रीकी देश शामिल हो सकते हैं, कट्टर धुरी के मुकाबले संतुलन की नई धुरी बना सकता है। इससे भारत की पश्चिम एशिया में सामरिक उपस्थिति और ऊर्जा सुरक्षा दोनों मजबूत होंगी।
चौथा प्रभाव तकनीकी आत्मनिर्भरता पर पड़ेगा। एआई, क्वांटम और उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग से भारत का रक्षा उद्योग अगली पीढ़ी की युद्ध प्रणालियों में अग्रणी बन सकता है। इस तरह स्पष्ट है कि यह यात्रा केवल द्विपक्षीय औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य की युद्धक तैयारी का खाका है। भारत अब रक्षात्मक प्रतिक्रियावादी राष्ट्र की छवि से बाहर निकलकर तकनीकी रूप से सुसज्जित, बहुस्तरीय और आक्रामक प्रतिरोधक शक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहा है। बहरहाल, यदि आयरन बीम, एरो, डेविड स्लिंग जैसी प्रणालियों के तत्व सुदर्शन चक्र में समाहित होते हैं, तो भारतीय आकाश एक अभेद्य कवच में बदल सकता है।