वैश्विक उथल पुथल के बीच मोदी की कूटनीति मचा रही धमाल, PM ने Netanyahu से की बात, German Chancellor आ रहे भारत, जयशंकर पहुँचे Luxembourg

By नीरज कुमार दुबे | Jan 07, 2026

अंतरराष्ट्रीय राजनीति इस समय तेज उथल पुथल के दौर से गुजर रही है और इसी हलचल के बीच भारत की कूटनीति पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। देखा जाये तो नई दिल्ली आज केवल प्रतिक्रियाएं देने वाली राजधानी नहीं रही बल्कि वैश्विक घटनाओं की दिशा को प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में उभर रही है। इस बदलते परिदृश्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सक्रिय कूटनीति भारत की विदेश नीति को नई धार दे रही है।

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यह वार्ता उस समय हुई है जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में कई मुद्दों पर मतभेद सामने आ रहे हैं। इसके बावजूद भारत ने यह दिखाया है कि वह किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर नहीं है। इजराइल से मजबूत संवाद यह संदेश देता है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सर्वोपरि मानता है और अपने हितों के अनुरूप साझेदारियां गढ़ता है। रक्षा तकनीक, खुफिया सहयोग और आतंकवाद विरोधी रणनीति में भारत और इजराइल की नजदीकी लंबे समय से जानी जाती है और यह संवाद उसी निरंतरता का प्रमाण है।

इसी बीच, भारत की कूटनीतिक गतिविधियां केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं हैं। अगले सप्ताह जर्मन चांसलर की भारत यात्रा प्रस्तावित है। यह यात्रा भारत और यूरोप के रिश्तों में एक और मजबूत कड़ी जोड़ेगी। हम आपको बता दें कि जर्मनी यूरोप की आर्थिक और राजनीतिक धुरी माना जाता है और उसके शीर्ष नेतृत्व का भारत आना यह दर्शाता है कि नई दिल्ली वैश्विक शक्ति संतुलन में एक अनिवार्य साझेदार बन चुकी है। व्यापार, तकनीक, जलवायु और रक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर जर्मन चांसलर की यह यात्रा भारत के लिए नई संभावनाएं खोल सकती है।

साथ ही विदेश मंत्री एस जयशंकर इस समय फ्रांस और लक्जमबर्ग की महत्वपूर्ण यात्रा पर हैं। यह दौरा भारत की बहुस्तरीय कूटनीति का सशक्त उदाहरण है। फ्रांस भारत का पुराना रणनीतिक साझेदार है जहां रक्षा और अंतरिक्ष सहयोग से लेकर हिंद प्रशांत क्षेत्र तक दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं। साथ ही लक्जमबर्ग जैसे छोटे लेकिन आर्थिक रूप से प्रभावशाली देश के साथ संपर्क यह दिखाता है कि भारत केवल बड़ी शक्तियों तक सीमित नहीं बल्कि हर उस मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है जहां उसके दीर्घकालिक हित सुरक्षित हो सकते हैं।

इन तमाम पहलुओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि भारत की विदेश नीति अब प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि पूर्व नियोजित और आक्रामक हो चुकी है। मोदी की कूटनीति का मूल मंत्र साफ है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा और आतंकवाद के मुद्दे पर दोहरे मापदंड स्वीकार नहीं करेगा। इजराइल से संवाद हो या यूरोप के साथ साझेदारी, भारत हर मोर्चे पर अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट और निर्भीक तरीके से रख रहा है।

मोदी सरकार की यह सफलता इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि दुनिया इस समय ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है। ऐसे दौर में संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। फिर भी भारत ने यह दिखाया है कि वह अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ, सभी के साथ संवाद रखते हुए अपनी स्वतंत्र पहचान कायम रख सकता है।

बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि आज भारत की कूटनीति केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है। फोन पर हुई बातचीत, यात्राओं की श्रृंखला और निरंतर संवाद यह साबित करते हैं कि भारत वैश्विक मंच पर एक निर्णायक और भरोसेमंद शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है। मोदी की सक्रियता और स्पष्ट दृष्टि ने भारत की विदेश नीति को न केवल मजबूती दी है बल्कि उसे नई दिशा भी दी है।

-नीरज कुमार दुबे

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