जनसंख्या नियंत्रण कानून समय की माँग, पर इसे भी कुछ लोग विवादित बनाने में लगे

By दीपक कुमार त्यागी | Jan 23, 2020

देश में दो बच्चों की नीति लागू करने के संदर्भ में बहुत लंबे समय से विचार चल रहा है। देश के नीति-निर्माता इसके लाभ व हानि को दृष्टिगत रखकर इस पर विचार करने का कार्य कर रहे है, लेकिन हमारे देश के बेहद उथलपुथल भरे अनिश्चितता पूर्ण राजनीतिक हालातों को देखकर अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि देश में दो बच्चों का कानून कब आ पायेगा। लेकिन जब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि आरएसएस की आगामी योजना देश में दो बच्चों का क़ानून लागू करवाना है, तब से देश के आम जनमानस व राजनीतिक दलों में एक बार फिर से दो बच्चों के कानून पर तेजी से बहस व जमकर राजनीति भी शुरू हो गयी है। आज हमारी सबसे बड़ी दुविधा यह है कि चंद लोगों व नेताओं की कृपा से हमारे देश में हर मुद्दे पर इतनी ज्यादा राजनीति होने लगी है कि आम आदमी के समझ में ही नहीं आता है कि उसके लिए क्या सही व क्या गलत है। देश में राजनीति की अति के चलते ऐसे हालात हो गये हैं कि जब तक हर बात का आम जनता के बीच में बतंगड़ ना बन जाये तब तक देश के कुछ राजनेताओं को तो चैन की नींद तक भी नहीं आ पाती है।

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वैसे हमारे देश में बच्चों के पैदा होने की दर को आकडों के रूप में देखें तो देश में वर्ष 1950 में देश की महिलाओं की औसतन प्रजनन दर छह के आसपास थी, यानी कि देश की एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन छह बच्चों को जन्म देती थी जो बहुत अधिक थी। लेकिन हाल के वर्षों में देखें तो देश में अब औसतन प्रजनन दर 2.2 प्रति महिला हो गई है, इसका मतलब यह है कि देशवासी इस ज्वंलत समस्या के प्रति काफी जागरूक तो हुए हैं। लेकिन विचारणीय यह है कि हमारे देश में प्रजनन दर अब भी 2.1 के एवरेज रिप्लेसमेंट रेट (औसत प्रतिस्थापन दर) तक नहीं पहुंच पायी है। औसत प्रतिस्थापन दर (एवरेज रिप्लेसमेंट रेट) प्रजनन क्षमता का वो स्तर है जिस पर एक आबादी खुद को पूरी तरह से एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में बदल देती है। लेकिन यह भी तय है कि चंद लोगों के विरोध व बरगलाने के बाद भी अब देश में धीरे-धीरे स्थिति रिप्लेसमेंट लेवल पर जल्द ही पहुंचने वाली है। परंतु समस्या यह है कि अभी भी देश के कुछ राज्यों में ऐसा नहीं हो पा रहा है। जो देश की आने वाली पीढियों के शानदार उज्जवल भविष्य के लिए ठीक नहीं है। संतोष की बात यह है कि पश्चिम भारत व दक्षिण भारत में ये हर जगह हो गया है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इसके उलट हिंदी भाषी क्षेत्र उत्तर भारत और पूर्वी भारत के क्षेत्र में महिलाओं की औसतन प्रजनन दर अब भी तीन है और कुछ जगह तो यह चार तक बनी हुई है। जिसमें सबसे अधिक योगदान बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि जैसे राज्यों का है। इसका सबसे बड़ा नकारात्मक प्रभाव यह है कि संसाधनों के अभाव में जनसंख्या के बढ़ते दवाब की वजह से इन राज्यों की बहुत सारी जनता गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने के लिए मजबूर है। सोचने वाली बात यह है कि अपने परिवारों का लालनपालन करने के उद्देश्य से रोजगार की तलाश में सबसे अधिक पलायन भी इन राज्यों में ही होता है। क्योंकि यह एक नेचुरल प्रक्रिया है कि जब देश के किसी एक भू-भाग में विकास कम होगा, गरीब अधिक होगी और प्रजनन दर के चलते जनसंख्या अधिक होगी, तो वहां के लोग परिवार पालने के लिए अपने परिवार से दूर होकर प्रवासी बनकर देश के दूसरे राज्यों में रोज़गार खोजने के लिए जायेंगे ही। लेकिन मौजूदा समय में जब देश में रोजीरोटी रोजगार पर मंदी की जबरदस्त मार है, तो उस समय जब प्रवासी लोगों की वजह से किसी राज्य के संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और वहां के मूलनिवासियों को यह लगने लगता है कि तुम इन प्रवासियों की वजह से बेरोजगार हो, तो उस स्थिति में एक बेवजह का समाज में संघर्ष उत्पन्न होता है। यह भी कटु सत्य है कि हमारे देश में अभी भी ऐसी मानसिकता है कि जो लोग दूसरी जगह प्रवासी बनकर काम ढूंढते हैं, उनकी स्थिति कुछ लोगों को छोड़कर अपने घर या गृहराज्य से कभी भी बेहतर नहीं हो पाती है। इस सब स्थिति के लिए हमारी बढ़ती जनसंख्या जिम्मेदार है।

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आज हम सभी को सोचना होगा कि परिवार की अच्छी सेहत व बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए हर हाल में बच्चों की संख्या को जाति-धर्म से ऊपर उठाकर नियंत्रित करना होगा। तब ही देश में उपलब्ध संसाधनों, रोजगार के अवसरों, तरक्की के विकल्पों और सरकार की सेवाओं का हम व हमारे बच्चे सही ढंग से लाभ ले सकते हैं या उपयोग कर सकते हैं। क्योंकि आज के व्यवसायिक दौर में परिवार को भावनात्मक लगाव के साथ-साथ आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए की संसाधनों से परिपूर्ण होकर आर्थिक रूप से सुदृढ़ होना बेहद जरूरी है, जिस लक्ष्य को छोटे परिवार के रहते आसानी से हासिल किया जा सकता है। इसलिए दो बच्चों के कानून के मसले पर अपने दिल व परिवार के हित की सुने व देशहित में उस पर अमल करें।

दीपक कुमार त्यागी

स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

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