लॉकडाउन के दुष्प्रभाव भले रहे हों लेकिन इसके सकारात्मक पहलू भी बहुत हैं

By सुरेश जैन | May 15, 2020

पूरी दुनिया में कोरोना वायरस मानव जीवन में मौत के सौदागर के रूप में सामने आया है तो लॉकडाउन ने जिंदगी को दोबारा से पढ़ने, सुनने और गुनने का स्वर्णिम मौका दिया है। बदले हालात ने जीवन में और वैकल्पिक सुनहरे पन्ने खोल दिए हैं। हमारी सोच में आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया है। यदि हम पहले घोर नास्तिक थे तो अब ईश्वर के अस्तित्व को मानने लगे हैं। यदि हम पहले लोभी थे तो अब सोच में मोल-भाव का प्रतिशत कम हुआ। नीयत में खोट था तो सोचने के दायरों में रचनात्मक और सकारात्मक बदलाव आया है। धन का लोभ, विलासता की सोच, और चाहिए-और चाहिए, आलीशान मोटर गाड़ियों की होड़, गगनचुम्बी इमारतों के निर्माण की प्रतिस्पर्धा, रेस्त्रां के स्वादिष्ट व्यंजनों के प्रति हमारा चश्मा बदल गया है। घर की सोंधी-सोंधी महक नथुनों को भाने लगी है। लॉकडाउन परिवार के हर सदस्य को और करीब ले आया है। उनकी पसंद और नापसंद के अलावा खुशी और नाराज़गी को हम और संजीदगी से समझने लगे हैं।

24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी जी का दुनिया को जियो और जीने दो का संदेश हम सब के मनन और चिंतन में फिर से जागृत हो गया है। लॉकडाउन में शहरों और छोटे कस्बों की बात करें तो पशु-पक्षियों के प्रेम और दया में वृद्धि हुई है। घरों की मुंडेर पर अब गौरेया, कौए, चिड़ियों, कबूतर, गिलहरी, चीटियों के लिए दाना-पानी का प्रावधान करने लगे हैं। घर-आंगन या ऑफिस में बरसों से सेवारत कारिंदे भले ही अब अपनी ड्यूटी से दूर घरों में हैं लेकिन उनके प्रति चिंता हमारी प्राथमिकता में शामिल है। नकदी से लेकर दाल-आटा चावल, तेल, चीनी, सब्जी, दवा सरीखी जरूरतें मालूम करना हमारे एजेंडे में है। यह सिर्फ हमारे चिंतन ही शामिल नहीं है बल्कि जैसे भी संभव हो, हम उनकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मदद कर रहे हैं। ठीक वैसे ही ईश्वर जैसे हम सब पर अपने वात्सल्य की वर्षा कर  रहा है। नौकर-चाकरों, रिश्तों-नातेदारों, मित्रों, पड़ोसियों, समाज के अंतिम छोर तक के व्यक्ति हमारी मानवीय संवेदनाओं की फेहरिस्त में हैं। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात से लेकर टेलीफोनिक संवाद तक हम सबको यही पॉजिटिव राह दिखा रहे हैं। हमारी भारतीय परम्परा, संस्कार और संस्कृति यही है। इन्हें हम बिसरा बैठे थे। पूरा भारतीय समाज प्रधानमंत्री का अनुसरण और अनुकरण कर रहा है। पूरी दुनिया रेशम की डोर की मानिंद सामाजिक ताने-बाने में बंधी हुई है। कोरोना वायरस के कहर से पहले दुनिया को एक ग्लोबल विलेज यानी वैश्विक गांव माना जाता था। कोरोना के संक्रमण ने देशों को देशों से और शहरों को शहरों से काट दिया है। हमें कतई नाउम्मीदी नहीं करनी चाहिए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर विमान जल्द फर्राटे भरने लगेंगे। एक देश से दूसरे देश और एक शहर से दूसरे शहरों की दूरी आंख झपकते ही कम हो जाएगी।

यह धरती, अम्बर, हवा, पानी, चाँद-सूरज, तारे, पेड़-पौधे, हरियाली कुदरत की अमानत हैं। इन पर जितना इंसानी हक़ है, उससे कहीं ज्यादा बेजुबानों का है। इन सबसे हम नाहक छेड़छाड़ करते हैं तो मानवजीवन की कीमत भी भुगतते हैं। कहते हैं, इतिहास अपने को दोहराता है। 1914 की महामारी ने 1 करोड़ 80 लाख भारतीयों को अपना ग्रास बना लिया था। इतिहास बताता है, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द भी संक्रमित हुए थे, लेकिन उनके संयम, संकल्प और समर्पण ने महामारी को परास्त कर दिया था। मौजूदा परिदृश्य सबके सामने है। हम चिंतन और क्रियान्वयन में कितने बोंसाई हो गए हैं। यह लोकमंगल प्रेमियों के सामने विचारणीय प्रश्न है।

कोविड-19 की जंग में डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ हकीकत में देवदूत के रूप में सामने आए हैं। इन्हें कोरोना वॉरियर्स की संज्ञा से भी नवाजा गया है। कहीं-कहीं इन कोरोना योद्धाओं के साथ बदसलूकी की खबरें देखने और सुनने को मिली हैं तो ऐसे तत्वों के खिलाफ न केवल त्वरित एक्शन हुआ बल्कि केंद्र और यूपी की सरकारों ने कड़े कानूनों का प्रावधान कर दिया है। यदि मेडिकल स्टाफ के साथ बदसलूकी करता है तो नए कानून में सजा और जुर्माना दोनों का प्रोविजन किया गया है। विशेषकर डॉक्टर के लिए कहा जाता है कि ये धरती के भगवान हैं। सच में यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और यूपी के लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इनके सम्मान में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। देश की तीनों सेनाओं- जल, थल और नभ से इन कोरोना योद्धाओं को सैल्यूट किया गया है। देशभर के बड़े कोविड हॉस्पिटल्स पर आसमान से पुष्प वर्षा हुई। नौसेना के जहाजों ने आतिशबाजी की तो कोविड-19 अस्पतालों में सैन्य बैंड बजाए गए। दिल छूने वाला यह सम्मान भारतीय समाज में ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए अप्रतिम उदाहरण है।

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लॉकडाउन के सभी चरणों में खाकी से लेकर स्वयंसेवी संगठनों का भी अति मानवीय चेहरा दिल को सुकून देने वाला है। पुलिस वालों की तो अपनी कड़क छवि से एकदम उलट दोस्ताना छवि दिखाई दी। लॉकडाउन के दौरान सख्त ड्यूटी के संग-संग पशु-पक्षियों से लेकर प्रवासी मजदूरों के लिए लंगर, नकदी, चप्पल, पेयजल जैसे बुनियादी जरूरतों को पूरा करते नजर आए। गलियों और चौराहों पर लॉकडाउन की लक्ष्मण रेखा न पार करने के लिए गीत सुनाकर सबको जीवन का महत्व बताया। बैंक अफसरों और कर्मियों ने केंद्र और राज्य की मानव कल्याणकारी योजनाओं विशेषकर जन-धन योजना और किसान समृद्धि योजना के क्रियान्वन में पूरी ताकत झोंक दी। आम आदमी से लेकर ख़ास आदमी तक यानी सभी से मिलकर एक ही सार्थक संदेश दिया- कोरोना की इस भीषणतम लड़ाई में हम सब हिंदुस्तानी एक है। हमारी भाषा, हमारी बोली, हमारी जाति, हमारी संस्कृति, हमारी छत-आंगन, हमारा रंग, हमारे रीति-रिवाज भले ही जुदा-जुदा हों लेकिन हम तिरंगे के नीचे मुठ्ठी तानकर 135 करोड़ लोग खड़े होते हैं तो बड़े गर्व से कहते हैं- हम हैं हिंदुस्तानी...।

सच मानिए, घोर अंधेरी रात का यह आखिरी पहर है। सूरज की लालिमा धरा को प्रकाशवान करने को आतुर है। किरणें मानव जीवन को और ऊर्जावान बनाने को बेताब हैं। मानव जीवन की खातिर भगवान महावीर स्वामी जी स्वर्णिम अक्षरों में नया इतिहास लिखने को आतुर हैं। महायज्ञ में आखिरी आहुति दी जानी बाकी है। आइए, लोकमंगल की खातिर महायज्ञ में हम सब आहुति दें। देखिए, वैश्विक लोकमंगल के लिए चौतरफा प्रकाश की पौ फटने वाली है। आओ... आओ... दुनिया के मानव इस नए सवेरे के स्वागत की तैयारी करें। पौ फटते ही मंगल गीत की बयार बहेगी। चिड़ियां चहकेंगी। जंगल में मोर नाचेंगे। धरती पुत्र कंधों पर हल लिए खेतों की ओर कूच करेंगे। कारखानों की चिमनियों से धुआं उठता दिखाई देगा। मंदिरों, मस्जिदों, जिनालयों, गुरुद्वारों और गिरजाघरों के कपाट खुलने की मद्धिम-मद्धिम आवाजें जीवन को और मंगलकारी कर देंगी।

-सुरेश जैन

(लेखक तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कुलाधिपति हैं)

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