प्रभासाक्षी के वेबिनार में गणमान्यों ने बताई हिंदी की महत्वता, बोले- हिंदी के पास है सबसे बड़ा शब्द संसार

By अभिनय आकाश | Sep 14, 2020

लगा रहे प्रेम हिंदी में, पढूं हिंदी लिखूं हिंदी, चलन हिंदी ....चलूं हिंदी पहनना, ओढ़ना खाना। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने दशकों पहले इस भाषा के सुशोभन में इन पंक्तियों का प्रस्तुतीकरण किया था। वर्तमान दौर में हिंदी का डंका देश-दुनिया में बज रहा है। हिंदी पर गर्व अनुभूति करने की बात इसलिए भी है कि हम ऐसी भाषा में पैदा हुए हैं जिसके पास सबसे बड़ा शब्द संसार है। जिसके पास रचनाकारों की एक महान परंपरा है। 14 सितबंर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है और हिंदी दिवस के अवसर पर प्रभासाक्षी.कॉम की तरफ से वेबिनार का आयोजन किया गया। 'आत्मनिर्भर भारत में हिंदी कैसे बन सकती है सबसे बड़ी सहायक' शीर्षक से आयोजित इस वर्चुअल मंथन में आईआईएमसी के महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने अपने वक्तवय दिए और हास्य कवि स्माइल मैन सर्वेश अस्थाना ने अपने काव्य पाठ से भाषा के इस महान दिवस पर इस कार्यक्रम को सुशोभित किया। 

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जिसके बाद आईआईएमसी के महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी से वक्तवय देने के लिए आमंत्रित किया। संजय द्विवेदी जी ने कहा कि ये हर्ष से मनाने वाला प्रसंग है और हिंदी ही नहीं समस्त भारतीय भाषा के उत्सव का दिन है। भारत में सभी बोली अपने आप में समृद्ध है। हिंदी के जरिये आत्मनिर्भर कैसे बनाया जा सकता है इस विषय पर बोलते हुए प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने कहा कि अगर हम हिंदी में सिद्ध हैं तो निर्भर भी हो जाएंगे। उन्होंने अमिताभ बच्चन और पीएम मोदी का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों ने हिंदी के जरिये ही बालीवुड और राजनीति के जरिये देश के दिलों पर राज किया। अपनी भाषा शक्ति को पहचानने की जरूरत है। भाषा अपने आप में एक शक्ति है जो जीवन यापन का माध्यम भी देती है। साहित्य की दुर्दशा पर बोलते हुए संजय द्विवेदी ने कहा कि व्यवसायिकता हिंदी पब्लिकेशन के क्षेत्र में नहीं आ सका। हमारे हिंदी के प्रकाशक किताबों को बेचना नहीं चाहते और किताब से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिये मातृभाषा में शिक्षा की बात को उल्लेखित करते हुए उन्होंने कहा कि इससे आठवीं सूची में शामिल सभी 22 भाषाओं का विकास होगा। कार्यक्रम के समापन सत्र में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे ने कहा कि हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं राजभाषा भी है, हमें इसके उपयोग को लेकर किसी प्रकार की झिझक या शर्म नहीं होनी चाहिए।

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