By प्रज्ञा पांडेय | Oct 23, 2026
आज आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत है, यह व्रत माता लक्ष्मी और सुख-सौभाग्य की कामना से सम्बन्धित होता है। शुक्र प्रदोष व्रत शिव-शक्ति की उपासना के साथ-साथ पारिवारिक सुख, मानसिक शांति और जीवन में सकारात्मकता की प्रार्थना का अवसर प्रदान करता है तो आइए हम आपको आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
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वर्ष 2026 में अगला शुक्र प्रदोष व्रत 23 अक्टूबर, शुक्रवार को है। इस दिन प्रदोष काल की पूजा का शुभ समय शाम 5 बजकर 43 मिनट से रात 8 बजकर 16 मिनट तक है (कुल 2 घंटे 33 मिनट)। त्रयोदशी तिथि 23 अक्टूबर को दोपहर 2:34 बजे से शुरू होकर 24 अक्टूबर को दोपहर 1:35 बजे समाप्त होगी।
पंडितों के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास का वह विशेष समय होता है, जिसमें भगवान शिव की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस समय शिव-आराधना, मंत्र-जप, ध्यान और दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त आराधना के लिए रखा जाता है। शुक्रवार को पड़ने के कारण इसे शुक्र प्रदोष कहा जाता है, जो दांपत्य जीवन में मधुरता, प्रेम, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि प्रदान करता है। भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना का एक पावन अवसर है। यह पर्व हमें श्रद्धा, संयम, करुणा और पारिवारिक प्रेम का महत्व समझाता है। भगवान शिव की पूजा करते हुए हमें अपने जीवन में सत्य, सदाचार और सेवा के मूल्यों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। शुक्र प्रदोष व्रत का वास्तविक महत्व केवल उपवास रखने या पूजा करने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य मन को निर्मल बनाना, नकारात्मक विचारों से दूर रहना और दूसरों के प्रति प्रेम तथा सहानुभूति का भाव विकसित करना भी है।
पंडितों के अनुसार आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत का दिन विशेष होता है इसलिए इस दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। व्रत अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार रखें। शाम को प्रदोष काल में पूजा की तैयारी करें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। शिवलिंग उपलब्ध हो तो श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करें। परंपरा के अनुसार दूध, पुष्प, बेलपत्र, चंदन, धूप और दीप का उपयोग भी करें। पूजा सामग्री अर्पित करते समय स्वच्छता और श्रद्धा का ध्यान रखें। इसके बाद भगवान शिव के मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करें। शिव चालीसा, प्रदोष व्रत कथा अथवा शिव स्तुति का पाठ करें। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करके परिवार तथा समाज के कल्याण की प्रार्थना करें। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार कर सकते हैं। पूजा में दिखावे के बजाय श्रद्धा, संयम और सद्भाव को प्राथमिकता देनी चाहिए।
प्रदोष व्रत से संबंधित विभिन्न धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं में भगवान शिव की करुणा, भक्तों की निष्ठा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। पंडितों के अनुसार जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान शिव की उपासना करता है, वह कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और अपने जीवन को सदाचार की दिशा में आगे बढ़ाने की प्रेरणा प्राप्त करता है। प्रदोष व्रत की कथा सुनने का उद्देश्य केवल पुण्य प्राप्ति की कामना करना नहीं, बल्कि उसके नैतिक संदेश को अपने जीवन में उतारना भी है। सत्य बोलना, दूसरों के प्रति दया रखना, माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना भी शिवभक्ति के महत्वपूर्ण अंग हैं।
धार्मिक विश्वास के अनुसार, शुक्र प्रदोष व्रत करने से भक्त को भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत को सुख-सौभाग्य, पारिवारिक शांति और समृद्धि की कामना से जोड़ा जाता है। पूजा, ध्यान और मंत्र-जाप से मन को एकाग्र करने में सहायता मिल सकती है। शिव-पार्वती की आराधना परिवार में प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना विकसित करने की प्रेरणा देती है। व्रत और प्रार्थना व्यक्ति को आत्मचिंतन तथा संयम का अवसर प्रदान करते हैं। जरूरतमंदों की सहायता करना करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत करता है। भगवान शिव का स्मरण आत्मअनुशासन, वैराग्य और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इन लाभों को धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए।
पंडितों के अनुसार आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत के दिन मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। किसी के प्रति कटु वचन न बोलें और यथासंभव विवादों से दूर रहें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र अथवा अन्य उपयोगी सामग्री दान कर सकते हैं। व्रत के दौरान स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को उपवास संबंधी निर्णय अपनी आवश्यकताओं और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार लेना चाहिए। भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा के लिए शरीर को कष्ट देना आवश्यक नहीं है।
- प्रज्ञा पाण्डेय