Prajatantra: वसुंधरा और पायलट के बिना राजस्थान की चुनावी गणित अधूरी, अपनी-अपनी पार्टी के लिए बने जरूरी

By अंकित सिंह | Jul 07, 2023

देश में सियासी उठापटक का दौर लगातार जारी है। 2024 में लोकसभा के चुनाव होने हैं। लेकिन उससे पहले इस साल के आखिर में देश के तीन महत्वपूर्ण राज्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होंगे। इन तीनों ही राज्यों के चुनाव को भाजपा और कांग्रेस के हिसाब से सेमीफाइनल माना जा रहा है। इन तीनों ही राज्यों में भाजपा और कांग्रेस अपनी चुनावी तैयारियों में जुटी हुई है। राजस्थान को लेकर भी चर्चा जबरदस्त तरीके से जारी है। एक ओर जहां राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच अंतर्कलह जारी है। तो वहीं भाजपा भी कई खेमों में बंटी हुई है। राजस्थान में इन्हीं दोनों दलों के बीच मुकाबला रहता है। हर चुनाव में यहां सत्ता परिवर्तन होता रहा है। पिछले ढाई दशकों को देखें तो राजस्थान की कमान या तो भाजपा की ओर से वसुंधरा राजे ने संभाला है या फिर कांग्रेस की ओर से अशोक गहलोत रहे हैं।

अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट

राजस्थान में फिलहाल अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता है। लेकिन 2018 के चुनाव के बाद से लगातार अशोक गहलोत और युवा नेता सचिन पायलट के बीच अदावत देखी गई। दोनों ही नेताओं की ओर से एक दूसरे पर जबरदस्त तरीके से बयानबाजी हुई जिसमें सारी हदें भी पार हो गई। एक वक्त तो ऐसा लग रहा था कि सचिन पायलट पार्टी से बगावत कर सकते हैं। हाल फिलहाल में भी सचिन पायलट लगातार राज्य की अपनी ही गहलोत सरकार को चुनौती देते नजर आ रहे थे। हालांकि, चुनावी नुकसान को भांफते हुए कांग्रेस आलाकमान सक्रिय हुई। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच समझौते की कोशिश हुई। पर्दे के पीछे कितनी बात बन पाई है, इसको बता पाना मुश्किल है, लेकिन पर्दे के सामने से जो बात निकल कर आई है, उसमें कांग्रेस की ओर से साफ तौर पर कहा जा रहा है कि हम एकजुट होकर चुनाव लड़ेंगे। सचिन पायलट की लोकप्रियता और उनकी नाराजगी को देखते हुए कांग्रेस की ओर से दावा किया जा रहा है कि हम सामूहिक चुनाव लड़ेंगे। कोई भी मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं होगा। ऐसे में कहीं ना कहीं इसे सचिन पायलट की जीत मानी जा रही है। कांग्रेस को पता है कि पार्टी में स्थिरता बनाए रखने के लिए सचिन पायलट जरूरी है। इतना ही नहीं, अशोक गहलोत अपने राजनीति के आखिरी पड़ाव पर हैं। वहीं सचिन पायलट युवा है, वह पार्टी के भविष्य हैं और राजस्थान में उनकी जमीनी पकड़ मजबूत है। 2018 में प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए सचिन पायलट ने जबरदस्त मेहनत की थी जिसका नतीजा कांग्रेस को चुनावी जीत मिली थी। 

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भाजपा के लिए जरूरी हैं वसुंधरा

2018 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान में एक नारा खूब गूंज रहा था, 'मोदी से बैर नहीं, वसुंधरा तुम्हारी खैर नहीं।' दावा किया गया था कि वसुंधरा को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं में ही नाराजगी है। 2018 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान में भाजपा को हार मिली थी। उसके बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया के कार्यकाल में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे थोड़ी अलग-थलग की जाने लगीं। वसुंधरा राजे पार्टी के पोस्टर और होर्डिंग से भी गायब होने लगीं जिससे कि वसुंधरा समर्थकों में आक्रोश की भावनाएं भी सामने आईं। हालांकि, चुनावी साल में पार्टी के कार्यक्रमों के भीतर वसुंधरा राजे को प्राथमिकता दी जा रही है। इसका कारण कर्नाटक चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार है। भाजपा अब किसी भी राज्य के बड़े नेता को दरकिनार करने की कोशिश में नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की ओर से यह संदेश वसुंधरा राज्य को दे दिया गया है कि आने वाले चुनाव में आपको महत्वपूर्ण भूमिका दी जाएगी। उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ मंच भी साझा किए हैं। अमित शाह ने वसुंधरा राजे के कार्यकाल की तारीफ की। चुनावी साल में वसुंधरा राजे राजस्थान के पूरे दौरे पर हैं। 

कांग्रेस के लिए पायलट तो भाजपा के लिए वसुंधरा जरूरी

कांग्रेस हर हाल में इस बार राजस्थान में इतिहास बदलना चाहती है। कांग्रेस अपनी सत्ता वापस लाना चाहती है। इसको लेकर कांग्रेस कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। पार्टी कार्यकर्ता दो गुट में ना बंट जाए इसलिए सचिन पायलट की भी अहमियत को बढ़ाने की कोशिश कांग्रेस की ओर से की गई है। वहीं, भाजपा वसुंधरा राजे की राजनीतिक अनुभव और कद को ध्यान में रखते हुए उन्हें साथ लेकर बढ़ने की कोशिश कर रही है। भाजपा पिछले 5 सालों में वसुंधरा के समान राजस्थान में कोई बड़ा नेता खड़ा नहीं कर पाए हैं। समय-समय पर गजेंद्र सिंह शेखावत, भूपेंद्र यादव और अर्जुन राम मेघवाल का नाम उछाला तो गया लेकिन लोकप्रियता और जनाधार के मामले में यह वसुंधरा से काफी पीछे रह गए। 

चुनावी साल में हर राजनीतिक दल फूंक-फूंक कर कदम उठाना चाहती है। वह किसी की भी नाराजगी किसी भी कीमत पर नहीं मोलना चाहती। चुनावी नफा नुकसान को ध्यान में रखते हुए पार्टियां अपनी रणनीति बनाती है और उसी के हिसाब से जनता को साधने की कोशिश करती है। यही तो प्रजातंत्र है।

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