चिंतन: धर्म, कर्म, ज्ञान और प्रेम का अद्भुत समागम है प्रयागराज

By डॉ दिनेश चंद्र सिंह | Mar 01, 2025

प्रयागराज मेरी कर्मभूमि है। मैंने इसे हर नजरिए से पढ़ा है और आत्मीयता भाव पूर्वक उसे गढ़ा है। इस शहर की इंद्रधनुषी सांस्कृतिक छँटा आपको भाव विभोर किये बिना नहीं रहेगी। महाकुंभ 2025 के आयोजन से इसकी विश्वव्यापी प्रसिद्धि बढ़ी है। धार्मिक आस्था और पौराणिक महत्व वाले इस शहर के विभिन्न पहलुओं की चर्चा मैं यहां कर रहा हूँ ताकि इसके विभिन्न महत्ता से आप भी अवगत हो सकें। 


वैसे तो ज्ञान, धार्मिक एवं सांस्कृतिक समागम की पवित्र भूमि प्रयागराज की महिमा, गरिमा, पूण्य प्रताप और आशीर्वाद के बारे में मैंने विभिन्न लेख में बहुत आत्मीय अनुभूति और गहन अध्ययन के साथ लिखता आया हूँ। अपनी सुदीर्घ वर्षों की साधना एवं लगभग तीन दशकों लंबे के प्रशासनिक अनुभव के बारे में विस्तार से लिखा है। जो भी समझा, उसे अपनी अल्प बुद्धि, ज्ञान और अनुभव के आधार पर लिखा और मन के उद्गार को देश-समाज हित में अभिव्यक्त किया। 


लिहाजा, यहां पर मैं अपने मन में प्रयागराज विश्वविद्यालय (पूर्व नाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय), जिसे Oxford of East यानी पूर्व का ऑक्सफोर्ड करार दिया जाता है और ऐसा ही गौरव उसे प्राप्त है, के कुछ अनछुए पहलुओं की चर्चा करूँगा। साथ ही गंगा-जमुना संस्कृति की उस तहजीब और प्रयागराज की पावन भूमि के साथ प्रयागराज की कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली उस अपठनीय और मन को द्रवित करने वाली चुनौतियों के दृष्टिगत अपने कर्मभूमि के कार्यकाल की अकथनीय दास्तान को वर्णित करने का प्रयास किया, जो वाकई कठिन कार्य है।

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मेरा स्पष्ट मत है कि यदि लेखन में अनुभूति, सत्यता और निर्भीक होकर अपने अनुभूति जन्य भावों को प्रकट करने की क्षमता का अभाव है तो ऐसा लेखन निंदनीय और अपठनीय होता है। सच कहूं तो मैंने अपने जीवन में महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी, जनकवि कबीर जी को जिया है, अर्थात निराला जी की योग्यता के साथ आर्थिक विपन्नता का दंश भी झेला और क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी नाम के आगे टाइटिल नहीं लगाने का साइड इफेक्ट्स भी झेला। परंतु जैसे सत्य पराजित नहीं होता है, उसी प्रकार शिक्षा पर आधारित ज्ञान, योग्यता, दक्षता को भी किसी प्रकार से पराजित नहीं किया जा सकता है।


काव्यात्मक शब्दों में कहूँ तो- संपदा से कहीं अधिक जग में, मान-सम्मान की जरूरत/जरारत है, यार, मेरा ख्याल है तुझको, सिर्फ ईमान की जरुरत है। जिसने बख्शी तुम्हें बुलंदी, तुम, उसको पांवों की धूल मत समझो, खींच लेगा जमीन पर तुमको, दर्द उसका फिजूल मत समझो।           


दिव्य महाकुम्भ 2025 के सफलता पूर्वक आयोजन से उपरोक्त भारतीय संस्कृति के मूल की पुनः पुष्टि हुई। क्योंकि संगम के पवित्र जल में सभी विचारधाराओं के नागरिकों ने, देश विदेश के नागरिकों ने एक ही पवित्र स्थान पर एवं पवित्र जल में आस्था की डुबकी लगाईं और सभी ने अपने आप को धन्य समझा है। और मैं प्रयागराज की पवित्र भूमि पर निवासित नागरिकों को भी साधुवाद दूंगा कि मात्र 45 दिवस की अवधि में 66 करोड़ से ज्यादा अनुशासित श्रद्धालुओं के प्रयागराज में आने पर भी यहाँ के नागरिकों ने शहरी यातायात और मुलभुत सुविधाओं पर आए भारी दबाव को सहर्ष स्वीकार करते हुए श्रद्धालुओं की सेवा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 


मसलन यही भारत की तपोभूमि की सरकार है। "अतिथि देवो भवः" जिसके साक्षात् दर्शन प्रयागराज में एवं आसपास के जनपदों के नागरिकों के द्वारा कराए गए। पड़ोसी जनपद जौनपुर में तैनाती के कारण अतिथियों की व्यवस्था या अन्य प्रशासनिक कार्यों से उनकी सेवा का अवसर मुझे भी मिला, इसके लिए मैं विनम्रता के साथ अपने को अहोभाग्य्शाली एवं जनसेवक मानता हूँ। ऐसा सौभाग्य मुझे सेवा के रूप में जीवनपर्यंत मिले, यही मनोकामना है। पुनः प्रयागराज वासियों की सहृदयता, सहनशीलता तथा अतिथियों के प्रति आदर-सम्मान की भावना से हृदय से सम्मान और माननीय मुख्यमंत्री योगी जी की प्रशासनिक दक्षता, राजनीतिक दूरदर्शिता, जनमानस तथा भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा का कायल हूँ, क्योंकि इन सबका अनूठा संगम आपके व्यक्तित्व में प्रखरता से प्रकाश पुंज की तरह आलोकित हुआ है।        


चिरंतन सत्य उक्ति है कि सत्य कभी पराजित नहीं होता है। हां, सत्य की जीत में प्रतीक्षा होती है। आज मैं ध्यान दिलाता हूँ प्रयागराज की कुछ तहजीब और हेकड़ी जनित व्यवस्था की ओर, जिसके बारे में आपको जानना समझना चाहिए। मसलन, प्रयागराज की तहजीब और ज्ञान के प्रति अनुराग को देखना हो तो कहना न होगा कि तदसमय रिक्शा चालक भी हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के समस्त दैनिक पेपर (अखबार) पढ़े बिना किसी भी दाम पर सवारियों को रिक्शा पर नहीं बैठता था। आज क्या स्थिति है, मुझे मालूम एवं अनुभूति नहीं है।


वहीं, हेकड़ी की बात करूँ तो प्रत्येक शिक्षित, अशिक्षित व्यक्ति जिसको अपने बाहुबल पर अपनी सियासत और दबदबा कायम करना होता था, वह बात-बात पर "अमा बम्ब दागकर चीथड़े उड़ा दूंगा" कहते हुए सुना ही नहीं जाता था अपितु अनेक घटनाओं को कारित होते हुए सुना एवं देखा है। इसलिए बिना किसी का नाम अभिव्यक्त किए यह बताना पर्याप्त है। चूंकि धर्म, आस्था, ज्ञान व प्रेम की नगरी प्रयागराज में कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाले 'ज्ञान के सागर' अपराधी भी कई प्रकार के संरक्षण में खूब नामी-गिरामी बने रहे। वह इस शहर से चमकने वाले लेखक, शिक्षाविद, न्यायाधीश, राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकारियों से भी ज्यादा शक्तिशाली और पॉपुलर (प्रसिद्ध) हुए। हालांकि, वर्तमान उत्तरप्रदेश सरकार में मुख्यमंत्री योगी जी के सशक्त नेतृत्व में ऐसे सभी तत्व अब पाताल वासी हो गए हैं। 


वहीं, चर्चा जब प्रयागराज की हो तो इलाहाबाद के प्रसिद्ध सुपाच्य यानी पाचन योग्य और प्रोटेम रिच तथा सभी प्रकार से गुणकारी "इलाहाबादी अमरूद" के गुणों का उल्लेख किये बिना लेख को समाप्त करना उचित नहीं होगा। मेरी अल्प बुद्धि, ज्ञान और अनुभव से मैंने यह अनुभूति की है कि प्रयागराज की ज्ञान की प्रतिभा को आयुर्वेदिक दृष्टि से प्रौढ़ता के साथ अपने पराक्रमी रूप में छात्र-छात्राओं, योग्य सभी क्षेत्र के ज्ञानी मनीषियों के पाचनतंत्र को शुद्ध और हाजमे को उत्कृष्ट रखने के लिए "इलाहाबादी अमरूद" की महिमा का वर्णन भी अत्यंत महत्वपूर्ण, अति आवश्यक है।


यहाँ के गरीब छात्र-छात्राएं या आर्थिक दृष्टि से कहीं भी अभाव वाले, किसी भी क्षेत्र के नागरिकों की जीवन चर्या को एवं व्यक्तित्व को रोगमुक्त करने में "इलाहाबादी अमरूद" अत्यंत महत्वपूर्ण, आवश्यक रहा है। कम पैसों में यह वर्णन मेरे समय का है। अभी भी कम रुपये में वहां के नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए रामबाण और उपयोगी है और रहेगा। जिसके कारण यह अध्ययन रत छात्र-छात्राओं और माननीय न्यायाधीश, विद्वान अधिवक्ताओं, लेखकों, और शिक्षा विद राजनीतिज्ञों, कर्मकारों और सामान्य नागरिकों की जीवन चर्या का अभिन्न, कम मूल्य मिलने वाला विश्व का सबसे प्रतिष्ठित एवँ बिकने वाला फ़ल इलाहाबादी लाल अमरूद सदैव पवित्र तीर्थराज प्रयागराज की पावन भूमि पर आकर्षण का केंद्रबिंदु रहेगा।


इलाहाबादी गुलाबी अमरूद में पर्याप्त मात्रा में मौजूद विटामिन सी इम्यून सिस्टम को दुरूस्त करता है। उत्कृष्ट गुणवत्ता यानी बेस्ट क्वालिटी के फाइबर हमारे पाचनतंत्र के लिए फायदेमंद हैं। फाइबर की वजह से पेट में गैस जैसी समस्याएं नहीं होती हैं और हमारी आँतें साफ रहती हैं। अमरूद में पोटैशियम और मैग्नीशियम के कारण दिल के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। खट्टेपन की वजह से कम कैलोरी मोटापे को रोकता है और शुगर एवं ब्लड शुगर कंट्रोल करता है। इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन भी पाया जाता है। इससे स्वस्थ त्वचा बनती है तथा विटामिन ए आंखों को ठीक रखता है। इसलिए इलाहाबादी अमरूद छात्र-छात्राओं को और प्रयागराज के बुद्धिजीवियों तथा सभी का प्रिय है।उपरोक्त कारणों से भी यहां के छात्र-छात्राएं प्रतियोगिता परीक्षा में बाजी मार लेते हैं, क्योंकि स्वस्थ रहने के कारण उनकी सफलता का प्रतिशत भी औसत रूप से अधिक रहता है। अतः इलाहाबादी अमरूद भी यहां की शान है और ज्ञान के अलख को प्रकाशित रखने के लिए आवश्यक है।


एक खास बात और, अमरशहीद चंद्रशेखर और अल्फ़्रेड पार्क के बिना प्रयागराज की चर्चा अधूरी रहेगी, क्योंकि इनकी बदौलत भी प्रयागराज/इलाहाबाद को ख्याति मिली है। उनसे जुड़ा यह पार्क राष्ट्रीयता और निर्भीकता का प्रेरणा स्थल है।


वहीं, पुस्तकें खरीदने, पढ़ने और सुरक्षित रखने का जज़्बा देखना हो तो किसी पुरातन छात्र से सुनें, देखें और सीखें। प्रयागराज का छात्र भूख को मारकर भी पुस्तकों को खरीदता था और पढ़ता था। आज भी कुछ क्षरण के साथ वहां अभी मौजूद मुस्लिम शासकों और ईसाईयत की भी दूरदृष्टि रही है कि प्रयागराज की गरिमा के कारण वहां उस काल में भी यहां के अतीतकालीन गौरव की महिमा और गरिमा को बढ़ाने के लिए पौराणिक बट वृक्ष के पास यमुना किनारे किले बनाये गए और अंग्रेजों ने सबसे बड़े शिक्षा केन्द्र एवं न्याय क़ी पीठ को प्रयागराज में स्थापित किया। 


आज भी यहां कुछ क्षरण के बाद पुस्तकों को पढ़ना, लेखन के प्रति अभिरुचि जीवित है। मुस्लिम शासकों ने भी प्रयागराज के पौराणिक महत्व, ज्ञान, त्याग और व्यापारिक महत्व की उपादेयता को समझा था। इसलिए यहां पवित्र बट वृक्ष के समीप मां यमुना के किनारे युद्ध सामरिक किले का निर्माण कराया। जो आज भी सभी को अपने दर्शन, शिल्प एवं वास्तुकला के लिए आकर्षित करता है। इसी महत्व को अंग्रेजों ने भी समझा। इसलिए ट्रेड की दृष्टि से इसके महत्व को समझकर शिक्षा एवं न्याय के लिए अनेकों विद्यालय जैसे इवनिंग क्रिश्चियन कॉलेज, नैनी कृषि विश्वविद्यालय, उच्च न्यायालय एवं ऑक्सफ़ोर्ड ऑफ ईस्ट के नाम से प्रसिद्ध इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो आज भी अपनी उपादेयता के लिए सभी को आकर्षित करता है।


आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भारत का संविधान सर्वोपरि है। इसलिए संविधान में प्रदत्त व्यवस्था के आधार पर लोकतंत्रीय व्यवस्था का संचालन होगा। यही भारत के लिए अपरिहार्य एवं युगीन विकास का वाहक होगा। संविधान के प्रति सच्ची आस्था एवं विश्वास ही हमारे भारत वर्ष की विकास यात्रा का मार्च प्रशस्त करेगा। अन्य व्यवस्था अब गौण हो चुकी है। इसलिए जातिगत, धर्मगत, भाषागत आधार पर हम अपने राष्ट्र की उन्नति का मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकते हैं। भारत का संविधान ही हमें कार्य के लिए बल प्रदान करता है और हमारे अधिकारों की रक्षा करता है। परंतु भारतीय संविधान हमारी पीढ़ी/नस्लों को वटवृक्ष की तरह पोषित करती है। और भारत का संविधान भी हमारी भारतीय संस्कृति से ही जीवंतता एवं शक्ति प्राप्त करता है एवं करेगा। इसलिए आवश्यक है हम ज्ञान, परिश्रम, शिक्षा, उद्योग पर, कृषि पर ध्यान देकर विकास की राह को गति प्रदान करें।


महत्वपूर्ण शैक्षणिक व्यवस्था में कठिनाई उतपन्न हुई, परन्तु पराक्रम, सत्यनिष्ठा पूर्वक साधना एवं परिश्रम से सफलता मिली और योग्यता, असाध्य परिश्रम, अनवरत साधना से स्थापित किये जाने में सफलता भी मिली। इस राह में पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की पक्तियां प्रेरणा बनीं- "काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ। हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूँगा।" यह सबकुछ इसलिए हुआ, क्योंकि प्रयागराज में मिलता है ज्ञान, कर्म और आस्था की महात्रिवेणी मां गंगा, यमुना, सरस्वती की अविरल, अनंत कोटि काल अविचल, अविरल, चिरंतन आगामी काल तक अपने पूण्य प्रताप से मानवता के कल्याण के लिए अपने अस्तित्व के साथ बहने वाली मां, जिनको नदियां कहना तीनों माताओं का अनादर होगा। यह तो साक्षात परम पूण्य मानवता के प्रति अविरल बहने वाली उन सबकी माताएं हैं। 


इसलिए माननीय योगी जी के नेतृत्व में दिव्य, भव्य, वैश्विक आस्था के महाकुंभ 2025 में अभी तक सभी महाकुंभ से अधिक श्रद्धालु आस्था की पवित्र डुबकी लगाकर पुण्यता से परिपूर्ण हो रहे। परन्तु ऐसे नागरिक जो आयु की और अन्य कठिनाइयों से महाकुंभ 2025 में पवित्र आस्था की डुबकी संगम में नहीं लगा पाए या नहीं लगा सकते हैं। मैं अल्पज्ञानी और सुदीर्घ अनुभव के आधार पर अनुरोध कर रहा हूँ कि आप केवल प्रयाग राज के संगम की तीनों पूज्य माताओं गंगा, यमुना, सरस्वती को ध्यान कर आत्मिक एवं आध्यात्मिक डुबकी मन से लगाकर अपने अपने घरों की दिव्यता और स्वच्छता से स्नान करें, निश्चित ही पुण्य लाभ होगा।


अंत में अपने मनोभाव और अभिव्यक्ति को कबीरदास जी की निम्नवत साखियों के माध्यम से व्यक्त करना चाहूंगा- सभी अध्ययन करते हैं, अपनी-अपनी योग्यता, माता-पिता के आशीर्वाद और गुरुजनों के आशीर्वाद तथा पुण्य प्रारब्ध से विभिन्न क्षेत्र में प्रतिष्ठा पूर्ण पदों पर पहुंचते या कुछ लोग अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल हो जाते हैं। एवं किताबी ज्ञान की अपेक्षा पांडित्य पूर्ण ज्ञान, प्रेम की भाषा को भी पढ़ना, समझना और उसको जीवन में अनुपालन करना आवश्यक है, तभी विजयी मानवता होगी।


"पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोई; ढाई आखर प्रेम का, पढ़ि से पंडित होय।"


देखा जाए तो दिव्य महाकुंभ 2025 में सभी ज्ञानी प्रबंधकीय व्यवस्था में लगे हुए। परन्तु प्रेम की भाषा का अनुभव और प्रेम को ज्ञान की अनुभूति से कैसे असंख्य करोड़ों, सभी वर्गों के श्रद्धालुओं में प्रचारित, प्रसारित कराकर, प्रयागराज की अकथनीय संगम की पवित्र त्रिवेणी धारा में डुबकी के महत्व को समझाया जाए। यही उत्कृष्ट प्रबंधकीय व्यवस्था होती है। जिसे अभी हम सबको सीखना एवं अध्ययन करना है। 


योगी जी की प्रबंधकीय व्यवस्था कल्पनातीत एवं अकथनीय, परंतु हमें अभी प्रबंधन में प्रेम की अनुभूति की चाशनी में परिपक्व कर्म, ज्ञान और अहंकार रहित मनोदशा की मानसिक अनुभूति से कार्य करने की महती भूमिका एवं संस्कार को पढ़ना, अध्ययन करना और अनुपालन सीखने की कला को आत्मसात करना होगा। क्योंकि दिव्य महाकुंभ 2025 सामान्य नहीं है। इससे निकले अमृत से वैश्विक मानवता के कल्याण की भावना है। जयशंकर प्रसाद जी की कुछ मार्मिक पंक्तियां यहां उद्धृत हैं- "शक्ति के विद्युत कण में, विरल विखरे हो निरुपाय, सम्भव्य उनका करो विजयिनी मानवता हो जाए।" 


....और यह तभी सम्भव है जब सभी ज्ञान, कर्म और विज्ञान (इच्छा) की अनुभूति को एकाकार कर कार्य करेगा। तभी तो कहा गया है कि "ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न हो, इच्छा क्यों हो पूरी मन की, तीनों मिलकर एक न हो सके, यह बिडम्बना है जीवन की।" दिव्य महाकुंभ 2025 ने सम्पूर्ण मानवता को दिव्यता के साथ सभी वर्गों को आस्था की डुबकी का अवसर अनेकों चुनौतियों के बावजूद योगी जी के नेतृत्व में मिला है। इसलिए यह दिव्य महाकुंभ 2025 सदैव के लिए अपनी उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए मील का पत्थर बन चुका है। जय हिंद, जय भारत।


- डॉ दिनेश चंद्र सिंह

(लेखक उत्तरप्रदेश के जौनपुर जनपद के जिलाधिकारी हैं।)

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