By नीरज कुमार दुबे | Feb 13, 2026
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज ‘सेवा तीर्थ’ परिसर का उद्घाटन करते हुए एक बार फिर अपनी उस राजनीतिक और प्रशासनिक सोच को रेखांकित किया, जिसमें सत्ता को सेवा का माध्यम बताने पर जोर रहा है। यह वही विचार है जिसे मोदी वर्षों से “प्रधान सेवक” की अपनी पहचान के साथ जोड़ते रहे हैं। नए परिसर में अब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय एक साथ काम करेंगे। अब तक प्रधानमंत्री कार्यालय रायसीना हिल्स के साउथ ब्लॉक में स्थित था।
यदि पिछले एक दशक के कदमों को देखा जाए तो यह केवल भवन परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रतीकों की राजनीति और प्रशासनिक संस्कृति में बदलाव का प्रयास भी है। 2014 के बाद से केंद्र सरकार ने औपनिवेशिक विरासत से जुड़े नामों और प्रतीकों को बदलने की दिशा में कई फैसले लिए। राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ, केंद्रीय सचिवालय को कर्तव्य भवन और प्रधानमंत्री आवास वाले मार्ग का नाम रेस कोर्स रोड से लोक कल्याण मार्ग किया गया।
देखा जाये तो ‘सेवा तीर्थ’ उसी श्रृंखला की अगली कड़ी है, जहां सत्ता के पारंपरिक शक्ति केंद्रों को सेवा और कर्तव्य की भाषा में पुनर्परिभाषित किया जा रहा है। स्पष्ट है कि मोदी सरकार शासन की भाषा और प्रतीकों को बदलकर एक ऐसा संदेश देना चाहती है, जिसमें सरकार खुद को शासक नहीं, सेवक के रूप में प्रस्तुत करे और ‘सेवा तीर्थ’ उसी विचार का ताजा उदाहरण बनकर उभरा है।
हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ में पहला फैसला महिलाओं और किसानों के संदर्भ में लिया। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता की और फिर अपने एक संबोधन के जरिये सबका मार्ग प्रशस्त किया।