उत्तर प्रदेश में सारा बोझ सरकारी अस्पतालों पर, निजी अस्पताल सहयोग नहीं कर रहे

By अजय कुमार | Jun 11, 2020

आश्चर्य होता है कि कोरोना महामारी के समय भी सरकारों के पास इस बात के पर्याप्त अधिकार मौजूद नहीं हैं जिसके बल पर वह निजी अस्पताल संचालकों के ‘कान पकड़ कर’ उनको आदेश दे सकें कि उन्हें कोरोना पीड़ितों का इलाज करने के लिए अपने यहां नई व्यवस्था बनाना ही होगी, ताकि कोरोना पीड़ित मरीजों को उनके यहां भर्ती किया जा सके। अनुकूल परिस्थितियों में भी निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर जिस तरह से मरीजों का शोषण होता है और इलाज की आड़ में निजी अस्पताल मालिक अपनी जेबें भरते हैं, उनके लिए कुछ दायित्व और गाइड लाइन भी तय किया जाना जरूरी है। निजी अस्पतालों को मोटी कमाई का जरिया मात्र बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता है। अक्सर छोटी-सी बीमारी को गंभीर बताकर लाखों का वारा-न्यारा करने वाले प्रदेश के 99 प्रतिशत निजी अस्पतालों ने कोरोना वायरस के संक्रमण काल में कोरोना पीड़ितों का इलाज करने को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं। अभी तक सिर्फ एक को छोड़कर कोई भी निजी अस्पताल कोरोना उपचार को आगे नहीं आया है। संसाधनों की कमी की आड़ में यह लोग अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुरा रहे हैं, जो मानवीय आधार पर तो अनुचित है ही, व्यवहारिक तौर पर भी ऐसा कृत्य निजी अस्पताल मालिकों को शोभा नहीं देता है।

दरअसल, कोरोना मरीजों का इलाज किस अस्पताल में हो सकता है और कहां नहीं, इसको लेकर केन्द्र सरकार ने मानक तय कर रखे हैं। निजी अस्पतालों के संचालक जानबूझ कर इन मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं ताकि कोरोना मरीजों का इलाज उन्हें नहीं करना पड़े। उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अमित मोहन प्रसाद का इस संबंध में कहना था कि बड़े निजी अस्पताल व प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ट्राएज एरिया, आइसोलेशन वार्ड और एग्जिट व इंट्री के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार की व्यवस्था करने पर ही उन्हें इलाज करने की छूट दी गई है। बस इसी का फायदा अस्पताल संचालक उठा रहे हैं। उधर, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) का कहना है कि निजी अस्पतालों में पर्याप्त संसाधन और स्टाफ नहीं है। अलीगढ़ के एक निजी अस्पताल की घटना का उदाहरण देते हुए आइएमए कहता है गत दिनों सामान्य इलाज में एक मरीज कोरोना पाजिटिव निकल आया है तो पूरे स्टाफ की कोरोना जांच अस्पताल प्रशासन को करानी पड़ गई। ऐसे में जितनी कमाई नहीं हुई उससे अधिक खर्च कोरोना जांच में चला गया। फिर एक रोगी के इलाज में कम से कम एक लाख रुपये तक का खर्चा आ रहा है। ऐसे में इतना महंगा इलाज करवाने कौन निजी अस्पताल आएगा। अभी तक सरकार की मंशा के अनुरूप उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो निजी मेडिकल कॉलेजों ने कोरोना मरीजों के इलाज के लिए प्राइवेट वार्ड खोलने की इच्छा जताई हैं। इसमें मेरठ के सुभारती मेडिकल कॉलेज और ग्रेटर नोएडा का शारदा हास्पिटल शामिल है।

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यह काफी दुखद है कि एक तरफ सरकारी अस्पताल कोरोना से जंग लड़ रहे हैं। वहीं निजी अस्पतालों का महामारी के समय कोरोना पीड़ितों का इलाज करने की बजाए ढुलमुल रवैया अपनाया जाना इसलिए अधिक चिंताजनक और शर्मनाक है क्योंकि कोरोना महामारी में अस्पतालों, डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों को ही प्रथम मोर्चा लेना है। बात यूपी की कि जाए तो यहां के सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों और स्टाफ ने अदम्य साहस, समर्पण और सेवाभाव का परिचय देते हुए कोरोना संक्रमण को यूपी में बेकाबू होने से रोक दिया, लेकिन निजी अस्पतालों द्वारा संकट की इस घड़ी में अपने दायित्व से नजरें फेर लेना न तो चिकित्सा पेशे की भावना के अनुरूप है और न ही निजी अस्पताल चिकित्सकों का व्यवहार राष्ट्रीय एकजुटता को मजबूत करने वाला है। जबसे कोरोना ने रौद्र रूप धारण किया है तब से देश-प्रदेश के शीर्षस्थ उद्यमियों, पुलिस से लेकर आम जनता तक ने जिस तरह-एक दूसरे को सहारा दिया है, उसे देखते हुए विश्वास करना कठिन है कि तमाम सरकारी सुविधाएं हासिल करके  अपना ‘धंधा’ चलाने और चमकाने वाले निजी अस्पताल के संचालक कोरोना महामारी के समय अपनी भूमिका से मुंह फेरे हुए हैं। यह दौर आया है और चला भी जाएगा, लेकिन निजी चिकित्सकों की जो छवि पहले से ही खराब थी, वह कोरोना काल में और भी दागदार हो गई है। डॉक्टर कहीं भी प्रैक्टिस करें, उन्हें धरती का भगवान मानकर सम्मान दिया जाता है, पर कोरोना के संदर्भ में निजी अस्पतालों और डॉक्टरों का रवैया इस धारणा को चोट पहुंचाने वाला रहा। योगी सरकार को निजी अस्पतालों के इस गैर जिम्मेदाराना रवैये का गंभीरता पूर्वक संज्ञान लेना चाहिए, संविधान के अनुसार इनकी जिम्मेदारी खंगाल कर इन्हें बताना चाहिए कि ऐसी महामारी के समय उनके क्या दायित्व बनते हैं। जब प्रदेश के निजी अस्पतालों के पास योग्य चिकित्सकों और मेडिकल सुविधाओं का बड़ा नेटवर्क है तो बेहतर रहता इसका इस्तेमाल कोरोना मरीजों का इलाज में किया जाता।

-अजय कुमार

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