By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Nov 30, 2021
भारत में गरीबों की हालत कितनी शर्मनाक है। आजादी के 74 वर्षों में भारत में अमीरी तो बढ़ी है लेकिन वह मुट्ठीभर लोगों और मुट्ठीभर जिलों तक ही पहुंची है। आज भी भारत में गरीबों की संख्या दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। हमारे देश के कई जिले ऐसे हैं, जिनमें आधे से ज्यादा लोगों को पेट भर रोटी भी नहीं मिलती। वे दवा के अभाव में ही दम तोड़ देते हैं। वे क ख ग भी न लिख सकते हैं न पढ़ सकते हैं। मैंने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी जिलों में लोगों को नग्न और अर्ध-नग्न अवस्था में घूमते हुए भी देखा है।
दूसरे शब्दों में व्यक्तिगत आमदनी के साथ-साथ जब तक पर्याप्त राजकीय सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी, नागरिक लोग संतोष और सम्मान का जीवन नहीं जी सकेंगे। सभी सरकारें ये सब सुविधाएं बांटने का काम भी करती रहती हैं। उनका मुख्य लक्ष्य तो इन सुविधाओं की आड़ में वोट बटोरना ही होता है लेकिन जब तक भारत में बौद्धिक श्रम और शारीरिक श्रम का भेदभाव नहीं घटेगा, यहां गरीबी खम ठोकती रहेगी। शिक्षा और चिकित्सा, ये दो क्षेत्र ऐसे हैं, जो नागरिकों के मष्तिष्क और शरीर को सबल बनाते हैं। जब तक ये सबको सहज और मुफ्त न मिलें, हमारा देश कभी भी सबल, संपन्न और समतामूलक नहीं बन सकता। ऊपर दिए गए आंकड़ों के आधार पर आज भी आधे से ज्यादा बिहार, एक-तिहाई से ज्यादा झारखंड और उप्र तथा लगभग 1/3 म.प्र. और मेघालय गरीबी में डूबे हुए हैं। यदि विश्व गरीबी मापन संस्था के मानदंडों पर हम पूरे भारत को कसें तो हमें मालूम पड़ेगा कि भारत के 140 करोड़ लोगों में से लगभग 100 करोड़ लोग वंचितों, गरीबों, कमजोरों और जरुरतमंदों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। पता नहीं, इतने लोगों का उद्धार कैसे होगा और कौन करेगा?
-डॉ. वेदप्रताप वैदिक