Travel Tips: Pune का 'Iron Fort' लोहगढ़: Monsoon में घूमने की Best जगह, जानें इतिहास और Trekking का पूरा Plan

By अनन्या मिश्रा | Jul 01, 2026

आजकल हर ओर लोहगढ़ किले का जिक्र सुनने को मिल रहा है। लोहगढ़ किले से केतन अग्रवाल हुई मौत के बाद से यह किला चर्चा का केंद्र बन गया। इस घटना के बाद से ही हर कोई लोहगढ़ किले के बारे में जानना चाहता है। वहीं अगर आप भी इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं या फिर आप भी एडवेंचर लवर हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए है। क्योंकि आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हाराष्ट्र की शान लोहागढ़ किले से जुड़ी कुछ हैरान कर देने वाली बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।

कई साम्राज्यों का गवाह है ये किला

लोहगढ़ किले का इतिहास काफी प्राचीन और कई राजवंशों से जुड़ा है। सबसे पहले इसको 'लोहतमिया राजवंश' द्वारा 10वीं शताब्दी में बनवाया गया था। फिर समय-समय पर इस किले पर राष्ट्रकूट, चालुक्य, बहमनी, यादव, निजाम, मुगल और मराठा शासकों ने राज किया।

महान छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस किले की रणनीतिक अहमियत को समझते हुए 1648 में इस पर कब्जा कर लिया। लेकिन साल 1665 में पुरंदर की संधि के तहत छत्रपति महाराज को यह किला मुगलों को सौंपना पड़ा। फिर साल 1670 में शिवाजी ने इसको दोबारा जीत लिया और खजाने को सुरक्षित रखने के लिए इस किले का इस्तेमाल किया था।

फिर पेशवा काल के दौरान मशहूर राजनेता नाना फडणवीस ने इसी किले में शरण ली थी। बाद में उन्होंने इस किले में पानी का बड़ा टैंक और एक बावड़ी भी बनवाई थी। जो आज भी यहां पर मौजूद है।

जैन धर्म से कनेक्शन

पुणे के ट्रैकर्स के एक समूह ने सितंबर 2019 में किले के दक्षिणी हिस्से की एक गुफा में जैन ब्राह्मी लिपि में लिखा एक शिलालेख खोजा था। यह शिलालेख पहली या दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का है। जिससे यह पता चलता है कि किसी समय पर यह किला जैन धर्म का एक पवित्र स्थान हुआ करता था।

किले की वास्तुकला

लोहगढ़ किले की बनावट औऱ सैन्य डिजाइन बेजोड़ है। बता दें कि किले में प्रवेश के चार भव्य प्रवेश द्वार हैं। गणेश दरवाजा, नारायण दरवाजा, हनुमान दरवाजा और महा दरवाजा। आज भी यह सभी काफी हद तक सुरक्षित हैं। वहीं इस पर की गई बेहतरीन नक्काशी पुराने समय के बेहतरीन इंजीनियरिंग कौशल को दिखाती हैं।

इस किले का सबसे रोमांचित हिस्सा 'Vinchu Kada' है। जिसको अर्थ है 'बिच्छू की पूंछ।' यहां पर एक प्राकृतिक रूप से बनी लंबी और संकरी चट्टान है। जो किले के मुख्य हिस्से से बाहर की तरफ निकली है। यह एकदम बिच्छू के डंक जैसी दिखती है। यहां से सह्माद्री की पहाड़ियों का नजारा मनमोहक लगता है।

ट्रैकिंग

बता दें कि लोहागढ़ की चढ़ाई रोमांचक होने के अलावा आसान भी है।

इसका सबसे आसान रास्ता मलावली रेलवे स्टेशन से शुरू होता है। जोकि करीब 10 किमी दूर है। वहीं 2 से 3 घंटे की इस ट्रैकिंग के दौरान रास्ते में प्राचीन 'भाजा गुफाएं' भी पड़ती हैं। 

अगर आप अधिक चलना नहीं चाहते हैं, तो लोहगढ़वाड़ी गांव से लोहगढ़ फोर्ट के बेस तक एक सड़क जाती है, जो पूरे साल चालू रहती है।

घूमने का सबसे सही समय

अक्तूबर से मार्च का समय इस किले को एक्सप्लोर करने के लिए सबसे अच्छा है। इस दौरान यहां का मौसम ठंडा और सुहावना होता है। मानसून के बाद यह पूरी घाटी हरी-भरी हो जाती है।

बारिश के मौसम में यहां के झरने बहने लगते हैं और यहां की हरियाली देखते ही बनती है। लेकिन यहां के रास्ते थोड़े से फिसलन भरे हो सकते हैं। इसलिए ट्रैकर्स को सावधानी से आना चाहिए।

अप्रैल से मई के महीने में यहां काफी गर्मी और उमस होती है। अगर आप यहां पर गर्मियों में आते हैं, तो सुबह जल्दी या देर शाम को जाना बेहतर होगा।

सुबह जल्दी या फिर शाम को आप सूर्योदय और सूर्योस्त के समय यहां के सुनहरे और अद्भुत नजारों का लुत्फ उठा सकते हैं और भीड़ से भी बच सकते हैं।

ऐसे पहुंचें लोहागढ़

लोहागढ़ फोर्ट मुंबई से करीब 100 किमी और पुणे से 60 किमी दूर है। आप मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के जरिए लोनावला होते हुए बेस विलेज 'मलावली' तक जा सकते हैं। लोनावला से ऑटो-रिक्शा और प्राइवेट टैक्सी काफी आसानी से मिल जाती है।

अगर आप यहां पर रेल मार्ग से आना चाहते हैं, तो नजदीकी रेलवे स्टेशन 'मलावली' है। जोकि किले से सिर्फ 5 किमी दूरी है। वहीं यहां से 10 किमी दूर लोनावला रेलवे स्टेशन है। आप लोनावला से मलावली के लिए लोकल ट्रेन से आ सकती है। मलावली से किला तक का रास्ता बेहद खूबसूरत है।

वहीं हवाई मार्ग से आने के लिए पुणे इंटरनेशनल एयरपोर्ट और मुंबई का छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट सबसे नजदीकी हवाई अड्डे हैं।

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