Ukraine देखता रह गया, Putin-Trump ने डील करके दुनिया को चौंका दिया, रूस की शर्तों पर खत्म होगा यूक्रेन युद्ध!

By नीरज कुमार दुबे | Oct 21, 2026

रूस-यूक्रेन युद्ध की आग बुझाने के नाम पर अब महाशक्तियों के बीच बड़ी कूटनीतिक बाजी खेली जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ पहले यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की से मिले और फिर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दरबार में पहुंच गए। लेकिन इस दौड़ का मकसद सिर्फ युद्ध रुकवाना नहीं है। इसके पीछे जमीन पर कब्जे, यूक्रेन की सुरक्षा, रूस पर प्रतिबंधों, तेल कारोबार और चीन तक फैले हितों का बड़ा खेल है। अब सवाल यह है कि इस शांति की शर्तें कौन तय करेगा अमेरिका, रूस या यूक्रेन? सवाल यह भी है कि क्या इस सौदे में युद्ध रोकने की कीमत यूक्रेन को अपनी जमीन और सुरक्षा से समझौता करके चुकानी पड़ेगी?

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यूक्रेन की चिंता स्पष्ट है। उसे डर है कि युद्धविराम के नाम पर रूस को कब्जे वाले इलाकों पर नियंत्रण बनाए रखने का अवसर मिल सकता है और भविष्य में हमले रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा गारंटी भी नहीं मिलेगी। कीव अपनी जमीन छोड़ने के दबाव का विरोध करता रहा है। वहीं, रूस पूरे डोनबास क्षेत्र पर नियंत्रण, यूक्रेन की सैन्य क्षमता में कटौती और नाटो में शामिल न होने की गारंटी चाहता है।

साथ ही ओस्लो में चर्चा का एक अहम पहलू यह भी था कि यूक्रेन के ऊर्जा ठिकानों पर हमलों को रोकने के लिए क्या आपसी व्यवस्था बन सकती है। जेलेंस्की ने रूसी ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकने की पेशकश को रूस की ओर से भी समान कदम उठाने की शर्त से जोड़ा। इसके साथ अमेरिकी खुफिया सूचनाओं की उपलब्धता, सैन्य संचार और पैट्रियट वायु रक्षा प्रणालियों की आपूर्ति को लेकर पैदा तनाव भी व्यापक वार्ता की पृष्ठभूमि में मौजूद रहा।

पुतिन के सामने अमेरिका का नया प्रस्ताव

उधर, ओस्लो से मिले प्रस्तावों और विचारों को लेकर विटकॉफ पुतिन के पास पहुंचे। रूसी समाचार एजेंसी इंटरफैक्स के अनुसार, उन्होंने संभावित समाधान से जुड़े दस्तावेज पेश किए और रूस, यूक्रेन तथा अमेरिका के बीच त्रिपक्षीय वार्ता फिर शुरू करने की वकालत की। ऐसी वार्ता में युद्धविराम और संभावित शांति समझौते से जुड़े तकनीकी प्रश्नों पर काम किया जा सकता है। लेकिन कूटनीतिक बयानबाजी के पीछे टकराव बेहद गंभीर है। मॉस्को अपनी क्षेत्रीय मांगों और नाटो संबंधी शर्तों से पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने विटकॉफ की यात्रा से पहले साफ कर दिया था कि रूस राजनीतिक रियायतों की उम्मीद में नहीं बैठा है और किसी चमत्कार की अपेक्षा भी नहीं करता। यानी वाशिंगटन के सामने चुनौती केवल दोनों पक्षों को बातचीत के लिए तैयार करने की नहीं, बल्कि ऐसी शर्तें तय करने की है जिन्हें रूस स्वीकार करे और यूक्रेन अपनी संप्रभुता के लिए घातक न माने।

74 वर्षीय अमेरिकी कैदी की रिहाई, कूटनीति का मानवीय पहलू

बैठक का एक महत्वपूर्ण परिणाम अमेरिकी नागरिक स्टीफन हबर्ड की रिहाई रहा। मिशिगन के 74 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक हबर्ड को रूस ने यूक्रेनी सेना के साथ भाड़े के लड़ाके के रूप में काम करने के आरोप में लगभग सात साल की सजा सुनाई थी। अमेरिकी प्रशासन ने उनकी हिरासत को गलत तरीके से की गई हिरासत घोषित किया था। पुतिन से मुलाकात के दौरान विटकॉफ ने उनकी रिहाई के लिए धन्यवाद दिया। यह कदम दोनों देशों के बीच संवाद के लिए सद्भावना का संकेत है।

डीजल के बहाने प्रतिबंधों की राजनीति

इसके साथ ही इस पूरी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक पहलू ऊर्जा व्यापार है। रूस और अमेरिका ने रूसी डीजल आपूर्ति को लेकर समझौता किया है। रूसी उपप्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक के अनुसार, शुरुआती खेप में 40,000 मीट्रिक टन डीजल अमेरिका भेजा जाना था और आगे भी आपूर्ति की संभावना है। विटकॉफ ने रूसी डीजल निर्यात पर लगी पाबंदियां हटाने के लिए पुतिन का धन्यवाद किया। पुतिन ने दावा किया कि समझौते के बाद डीजल की कीमतों में गिरावट आई है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस रूस पर यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए, उसी रूस से अब अमेरिका कारोबार बढ़ा रहा है। रूस को डीजल बेचकर कमाई होगी, जबकि अमेरिका को तेल-ईंधन की जरूरत पूरी करने और कीमतें घटाने में मदद मिल सकती है। मगर इस सौदे का फायदा रूस को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक ताकत भी दे सकता है। ऐसे में प्रतिबंधों में ढील देने से यूक्रेन पर दबाव बढ़ने और पश्चिमी देशों की रूस को कमजोर करने की रणनीति पर सवाल उठने तय हैं।

चीन में पुतिन-ट्रंप मुलाकात की संभावना

इसके अलावा, पुतिन ने चीन में ट्रंप से मुलाकात की संभावना भी उठाई है। दरअसल, अगले महीने होने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ त्रिपक्षीय बैठक का विचार भी चर्चा में रहा है। हालांकि, इस मुलाकात पर कोई अंतिम सहमति घोषित नहीं हुई है। देखा जाये तो यदि ऐसा शिखर सम्मेलन होता है, तो उसका महत्व यूक्रेन से कहीं आगे तक जाएगा। रूस अमेरिका के साथ संबंध सुधारने और चीन के साथ अपने रणनीतिक तालमेल को प्रदर्शित करने की कोशिश कर सकता है। अमेरिका वैश्विक तनाव कम करने का दावा कर सकता है, जबकि चीन को महाशक्तियों के बीच कूटनीतिक केंद्र के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर मिलेगा। लेकिन यूक्रेन को बाहर रखकर उसके भविष्य पर निर्णय लेने की कोई भी कोशिश शांति समझौते की वैधता पर सवाल खड़े कर सकती है।

ईरान, उर्वरक और व्यापक भू-राजनीतिक सौदेबाजी

साथ ही वार्ता में ईरान युद्ध के समाधान में रूस की संभावित भूमिका और अमेरिका को रूसी उर्वरकों की आपूर्ति बढ़ाने के मुद्दे भी उठे। इससे संकेत मिलता है कि दोनों देश यूक्रेन के प्रश्न को व्यापक आर्थिक और भू-राजनीतिक सौदेबाजी से अलग नहीं देख रहे। ऊर्जा, कृषि आपूर्ति और मध्य पूर्व में कूटनीतिक प्रभाव, इन सभी मोर्चों पर सहयोग की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

शांति या शक्ति-संतुलन का नया सौदा?

दूसरी ओर, इस पूरी वार्ता का निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या अमेरिका युद्ध समाप्त करने के लिए ऐसा समझौता तैयार कर पाएगा जो रूस की सुरक्षा संबंधी मांगों, यूक्रेन की संप्रभुता और यूरोप की सामूहिक सुरक्षा के बीच टिकाऊ संतुलन बना सके? देखा जाये तो यदि यूक्रेन को विश्वसनीय सुरक्षा गारंटी नहीं मिलती, तो युद्धविराम रूस को दोबारा सैन्य तैयारी का समय दे सकता है। वहीं यदि मॉस्को को अपनी अधिकतम क्षेत्रीय मांगें पूरी होती दिखाई देती हैं, तो यूरोप के दूसरे देशों में भी सीमा और संप्रभुता को लेकर चिंता बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि बातचीत विफल होती है, तो युद्ध, ऊर्जा संकट और पश्चिमी गठबंधन के भीतर मतभेद और गहरे हो सकते हैं।

फिर भी विटकॉफ की यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके केंद्र में अब केवल बंदूकें खामोश कराने का सवाल नहीं, बल्कि युद्ध के बाद की दुनिया का शक्ति-संतुलन है। पुतिन को आर्थिक राहत और कूटनीतिक मान्यता चाहिए, ट्रंप को युद्ध समाप्त करने और घरेलू आर्थिक दबाव घटाने का परिणाम चाहिए, जबकि जेलेंस्की को ऐसी शांति चाहिए जो यूक्रेन की जमीन और भविष्य को असुरक्षित न छोड़ दे।

बहरहाल, शांति का असली इम्तिहान समझौते की घोषणा नहीं, बल्कि उसकी शर्तें होंगी। अगर यूक्रेन की सुरक्षा की ठोस गारंटी, कब्जे वाली जमीन और युद्धविराम पर सहमति नहीं बनी, तो यह पहल शांति के बजाय अगले युद्ध की जमीन तैयार कर सकती है। साथ ही ट्रंप ने जेलेंस्की पर दबाव बढ़ाते हुए जिस तरह कहा है कि यूक्रेन को युद्ध खत्म करने के लिए समझौता करना ही होगा, उसने भी यूक्रेन की चिंता बढ़ा दी है। उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने जेलेंस्की को चेतावनी दी है कि अब समझौते का वक्त है और यह भी कहा है कि शायद यूक्रेन को बातचीत के लिए कोई दूसरा नेता चुनना चाहिए। ऐसे में सवाल है कि क्या ट्रंप की यह दबाव की रणनीति युद्ध रुकवाएगी या यूक्रेन को ऐसी शर्तें मानने पर मजबूर करेगी, जिनसे उसकी संप्रभुता और भविष्य की सुरक्षा खतरे में पड़ जाए?

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