यंत्र से तंत्र तक, नए Question Paper के साथ सामने आए राहुल, क्या सच में आपका वोट चोरी हो रहा है?

By अभिनय आकाश | Aug 13, 2025

एक दौर था जब बाहुबलि वोट लूट कर चुनाव जीत जाया करते थे। आज चुनाव आयोग पर ही वोट चोरी का आरोप है। राहुल गांधी के पुराने आरोपों और इस बार के आरोपों में अंतर ये रहा कि  इस बार उनके निशाने पर तंत्र पर है, यंत्र नहीं। ऐसे में क्या लोकसभा के चुनाव में वोट चोरी की गई। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव में चोरी हुई है? क्या बिहार में चोरी की तैयारी की जा रही है। राहुल गांधी और सारा विपक्ष वोट चोरी के मुद्दे पर सड़क पर उतरा। अखिलेश यादव ने तो खुद बैरिकेड फांदकर समाजवादी पार्टी के सांसदों में जोश भरा। तृममूल कांग्रेस के सांसद भी उमस भरी गर्मी के बाद आक्रमक नजर आए। प्रियंका गांधी वाड्रा सड़क पर बैठकर नारे लगाने लग गई। 

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दावा-1 

महादेवपुरा सीट पर कांग्रेस ने 1,00,250 संदिग्ध मतों की पहचान की राहुल गांधी ने दावा किया कि महादेवपुरा क्षेत्र की मतदाता सूची की जांच करने पर उनकी टीम को लाखो कागज के पन्ने खंगालने पड़े, क्योंकि चुनाव आयोग ने मशीन रीडेबल फॉर्मेट में डेटा उपलब्ध नहीं कराया। हमने जब इन कागजों को इकट्ठा किया तो उनकी ऊचाई 7 फीट से ज्यादा हो गई थी। जांच के बाद कांग्रेस की टीम ने 1,00,250 संदिग्ध मतो की पहचान की, जो वोट चोरी है।

दावा-2 

एक कमरे के घर में दर्ज मिले 80 वोटर, लाभ बीजेपी को मिला राहुल गांधी ने बताया कि सबसे चौकाने वाला खुलासा यह था कि कई मामलो में एक कमरे के मकान में 80 वोटर दर्ज पाए गए। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि क्या यह सभव है कि एक छोटे से कमरे में 80 लोग रहते हो? ये फर्जीवाड़ा नहीं तो और क्या है? उन्होंने आगे कहा कि एक ही पते पर 50-50 मतदाता दर्ज थे। राहुल गांधी ने कहा कि यह सिर्फ महादेवपुरा की कहानी नहीं है।

दावा-3 

बेंगलुरु सेंट्रल के 7 में से 6 विधानसभा में पीछे रही बीजेपी उन्होंने दावा किया कि बीजेपी बेगलुरु सेंट्रल के 7 विधानसभा क्षेत्रो में से 6 में पीछे रही, सिर्फ महादेवपुरा में भारी बढ़त ने उसकी जीत सुनिश्चित की। आरोप लगाया कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह का फर्जीवाड़ा हुआ। महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच सिर्फ 5 महीने में वहां एक करोड़ नए मतदाता जोड दिए गए, जबकि इससे पहले 5 साल में इतने नाम नहीं जुड़े थे।

चुनाव आयोग पर सवाल  

भारत के इतिहास में चुनाव आयोग की साख पर कभी इतना बड़ा सवाल नहीं उठा। 10 अगस्त को समय मांगा गया कि 11 अगस्त को विपक्ष के सांसद मार्च करेंगे और आयोग से मिलकर अपनी बात रखना चाहते हैं। एएनआई ने फिर आयोग के सचिवालय का एक लेटर पोस्ट किया जिसमें जयराम रमेश को दोपहर 12 बजे मिलने का समय दिया गया। लेकिन जगह की कमी बता 30 नाम मांगे गए। फिर जयराम रमेश ने जवाब देते हुए एक्स पर लिखा कि विपक्ष ने शुरू से ही डेलीगेशन के मिलने की बात नहीं की थी। शांतिपूर्ण  मार्च के बाद विपक्ष के सभी सांसद आयोग से मिलकर कई मुद्दों पर बात करना चाहते हैं। कांग्रेस और विपक्ष की दूसरी पार्टियां लंबे वक्त से चुनाव आयोग पर हमलावर रही हैं। ईवीएम को लेकर काफी बहस हो चुकी है और इस पर हंगामा भी हुआ है। लेकिन, देश के सामने अभी जो सीन चल रहा है, वह अभूतपूर्व है। राहुल गांधी के आरोप सीधे-सीधे चुनाव आयोग की निष्पक्षता, ईमानदारी और लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल हैं। 

विपक्ष को एकजुट होने का एक मौका मिल गया

राहुल ने इससे पहले महाराष्ट्र चुनाव में इलेक्टोरल रोल को लेकर धांधली का आरोप लगाया था। इस बार उन्हें दूसरे विपक्षी दलों का भी साथ मिल रहा है। राहुल का आरोप है कि महाराष्ट्र, हरियाणा और मध्य प्रदेश में हुए हालिया विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा इलेक्शन तक, चुनावों के ऐन पहले बड़े पैमाने पर नए नाम जोड़े और काटे गए, जिसका फायदा कथित तौर पर बीजेपी को मिला। राहुल के इन आरोपों को बीजेपी बेबुनियाद बताती आई है। वह कहती है कि राहुल की यह चुनावी हार की खीझ है। वहीं, राहुल गांधी के आरोपों पर चुनाव आयोग ने उनसे हलफनामा मांगा है। साथ ही, कर्नाटक समेत तीन राज्यों के चुनाव आयोग ने उन मतदाताओं के नाम देने को कहा है, जो उनके हिसाब से गलत ढंग से काटे या जोड़े गए। इस मामले में चुनाव आयोग को बिंदुवार और स्पष्ट ढंग से अपना पक्ष रखना चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए।

चुनौतियां कम नहीं

राहुल गांधी के लिए लड़ाई सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कानूनी, राजनीतिक और जन समर्थन से जुड़े कई पहलू हैं। राहुल गांधी एक संवैधानिक पद पर हैं, और विपक्ष में होने के नाते उनका काम है कमियां उजागर करना व सरकार से जवाब मांगना। चुनाव आयोग भी संवैधानिक संस्था है। इन दोनों की ही बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में। इस क्रम में इनकी एक-दूसरे से असहमति, शिकायत मान्य है। लेकिन, अभी का घटनाक्रम असहमति से बहुत आगे निकल चुका है। जिस तरह से दोनों के बीच सार्वजनिक रूप से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा है, वह ठीक नहीं है। इस पर जल्द विराम लगना चाहिए। सबसे पहले, चुनाव आयोग से मिले नोटिस का ठोस, दस्तावेज-आधारित और निर्विवाद जवाब तैयार करना अहम होगा, क्योंकि जरा-सी चूक इस पूरे अभियान राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित कर सकती है। दूसरी चुनौती बीजेपी के राजनीतिक हमलों का जवाब देने की होगी, जो पहले ही इस मुद्दे को बेबुनियाद और भ्रामक करार दे रही है। तीसरी बड़ी चुनौती विपक्षी एकता को सिर्फ मंचीय बयानों और बैठकों तक सीमित न रखकर उसे जमीनी अभियान में बदलना होगा, वरना यह क्षणिक एकजुटता जल्द बिखर सकती है। विपक्ष को ठोस सबूत और व्यापक जमीनी अभियान से यह भरोसा दिलाना होगा कि यह लड़ाई वास्तव में संविधान बचाने की है। आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव इस मुद्दे की पहली बड़ी परीक्षा होंगे। अगर वहां इसका ठोस असर नहीं दिखा तो यह नैरेटिव कमजोर भी पड़ सकता है। यह मुद्दा फिलहाल विपक्ष के लिए एकजुटता का केंद्र बिंदु बन चुका है। लेकिन इस नैरेटिव को टिकाऊ बनाने के लिए राहुल गांधी और उनके सहयोगियों को कानून, सियासत और जनसंपर्क- तीनों मोर्चों पर लंबी लड़ाई लड़नी होगी। अगर विपक्ष इसे सही ढंग से लेकर निरंतरता के साथ आगे बढ़ पाता है तो यह मुद्दा न केवल उसके लिए चुनावी पूंजी बन सकता है, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता पर गंभीर चर्चा की जमीन भी तैयार कर सकता है।

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