By नीरज कुमार दुबे | Oct 14, 2026
दिल्ली के जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने, छात्रों की गिरफ्तारी और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को लेकर छिड़ा विवाद अब महज कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। इसके मंच पर देश की सियासत का एक नया नाटक भी आकार लेने लगा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं की गिरफ्तारी पर जिस अंदाज में आवाज बुलंद की है, उससे साफ है कि विपक्ष अब इस आंदोलन को अपने बड़े राजनीतिक अभियान से जोड़ने की कोशिश में है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को अचानक CJP के आंदोलन में लोकतंत्र की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है, या फिर इसके पीछे चुनाव आयोग, मतदाता सूची और भाजपा के खिलाफ विपक्षी मोर्चे को मजबूत करने की रणनीति काम कर रही है?
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देखा जाये तो बात सुनने में दमदार है। आखिर लोकतंत्र में विरोध की आवाज को जगह मिलनी ही चाहिए। लेकिन राजनीति में केवल भाषण नहीं, उसके पीछे की टाइमिंग भी बहुत कुछ कहती है। राहुल गांधी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CJP के आंदोलन को लेकर कांग्रेस का रुख अब तक इतना खुला और स्पष्ट नहीं था। सवाल उठता है कि पहले दूरी, अब दोस्ती क्यों? हम आपको याद दिला दें कि परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ जुलाई में CJP ने जंतर-मंतर पर 17 दिनों तक प्रदर्शन किया था। सोशल मीडिया पर इस संगठन की चर्चा बढ़ी, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं ने शुरुआत में उससे दूरी बनाए रखी। पार्टी का जोर अपने अभियानों ‘छात्रों की गूंज’ और ‘वोट चोरी' पर रहा। संदेश साफ था कि पेपर लीक और मतदाता सूची की कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों पर कांग्रेस पहले से लड़ाई लड़ रही है।
यानी आंदोलन का मुद्दा वही था, लेकिन मंच अलग-अलग थे। कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन पर किसी दूसरे संगठन को ज्यादा जगह देने के मूड में नहीं दिख रही थी। देखा जाये तो विपक्ष की राजनीति में मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण कई बार यह हो जाता है कि मुद्दे का श्रेय किसे मिलेगा।
इसके बाद, 10 अक्टूबर को CJP ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन का आह्वान किया, लेकिन कांग्रेस उससे दूर रही। 12 अक्टूबर को जब विपक्षी दलों ने अपना मार्च निकाला, तब CJP भी उस कार्यक्रम से अलग रही। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग प्रदर्शन विपक्ष की एकजुटता के दावों पर सवाल खड़े कर रहे थे। अब राहुल गांधी का कहना है कि कोई समानांतर प्रदर्शन नहीं है, बल्कि लड़ाई एक ही है। यही वह राजनीतिक मोड़ है, जहां कांग्रेस ने CJP के आंदोलन को अपने व्यापक विपक्षी अभियान से जोड़ने का संकेत दिया है।
CJP के नेताओं सौरव दास और अभिषेक रांका को जंतर-मंतर में अनधिकृत प्रवेश के आरोप में गिरफ्तार किए जाने और पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद विपक्ष ने सरकार पर हमला तेज कर दिया है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने तिरंगा लहराने पर भारतीयों की गिरफ्तारी को लेकर भाजपा पर निशाना साधा और भारत को ‘पाकिस्तानाइज्ड’ करने का आरोप लगाया। वहीं, CPI(ML) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने जंतर-मंतर को जनता का प्रदर्शन स्थल बताते हुए गिरफ्तारी और हिरासत को अनुचित करार दिया।
विपक्ष का तर्क है कि जब नागरिक अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। दूसरी तरफ, किसी भी प्रदर्शन के मामले में प्रशासन को प्रवेश, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों का हवाला देने का अधिकार होता है। साथ ही इस विवाद का एक और अहम पहलू है। सरकार के जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में समाप्त करने के फैसले के बाद विपक्ष इसे जनता के विरोध के अधिकार से जोड़ रहा है। ऐसे में जंतर-मंतर अब राजनीतिक प्रतीक बनता जा रहा है।
इसके अलावा, राहुल गांधी की राजनीति में एक बड़ी चुनौती लंबे समय से यही रही है कि अलग-अलग मुद्दों पर उठने वाली आवाजों को एक साझा राजनीतिक अभियान में कैसे बदला जाए? CJP के साथ खड़े होने का उनका फैसला इसी दिशा में एक कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। छात्रों का असंतोष, पेपर लीक का मुद्दा, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के आरोप और प्रदर्शन के अधिकार का सवाल, इन सबको एक सूत्र में पिरोकर कांग्रेस भाजपा के खिलाफ व्यापक मोर्चा तैयार करना चाहती है। लेकिन यहां एक पेचीदा सवाल भी है। यदि कांग्रेस पहले से इन मुद्दों पर आंदोलन कर रही थी, तो CJP के साथ खड़े होने में इतनी देर क्यों हुई? और अगर लड़ाई वास्तव में एक ही है, तो 10 और 12 अक्टूबर को अलग-अलग प्रदर्शन क्यों हुए?
इन सवालों का जवाब केवल बयानबाजी से नहीं मिलेगा। विपक्ष को यह साबित करना होगा कि उसकी एकजुटता केवल राजनीतिक सुविधा का गठजोड़ नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित साझा प्रतिबद्धता है। दूसरी ओर, सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदर्शन स्थलों और प्रशासनिक नियमों के नाम पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार अनावश्यक रूप से बाधित न हों।
इस पूरे सियासी घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल का भी है। CJP को अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक उपज माना जाता रहा है और आम आदमी पार्टी का उसके आंदोलनों के प्रति समर्थन भी इस चर्चा को हवा देता है। ऐसे में राहुल गांधी का अचानक CJP के साथ खुलकर खड़ा होना कई सियासी सवाल पैदा करता है। क्या यह महज लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन का मामला है, या इसके पीछे विपक्षी राजनीति की कोई बड़ी बिसात बिछाई जा रही है? क्या CJP के बहाने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच जमी सियासी बर्फ पिघलाने की कोशिश हो रही है? और क्या इसे अरविंद केजरीवाल की INDIA गठबंधन में संभावित वापसी के संकेत के तौर पर भी देखा जाना चाहिए? सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। ऐसे में अगर दिल्ली के राजनीतिक मंच पर दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो पंजाब की सियासत में इसका क्या असर पड़ेगा? क्या दोनों दल एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बनाने और दूसरी तरफ पंजाब में एक-दूसरे को चुनौती देने का दोहरा खेल खेलेंगे? देखा जाये तो भारतीय राजनीति में अक्सर सार्वजनिक मंचों पर दिखने वाली एकजुटता भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की जमीन भी तैयार करती है। ऐसे में राहुल गांधी का CJP के समर्थन में उतरना केवल एक आंदोलन के पक्ष में दिया गया बयान है या कांग्रेस और केजरीवाल के बीच नए सियासी संवाद की शुरुआत, इस पर निगाहें बनी रहेंगी।
बहरहाल, राहुल गांधी का CJP के समर्थन में उतरना कांग्रेस की रणनीति में बदलाव का संकेत है। यह कदम विपक्ष को एक साझा मंच देने की कोशिश भी हो सकता है और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक बढ़त हासिल करने का अवसर भी क्योंकि भारतीय राजनीति में दोनों संभावनाएं एक साथ मौजूद रहती हैं। साथ ही तिरंगा किसी एक पार्टी की जागीर नहीं, संविधान किसी एक गठबंधन की संपत्ति नहीं और जंतर-मंतर किसी एक संगठन की निजी जमीन नहीं है। यदि विपक्ष सचमुच जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ना चाहता है, तो उसे विश्वसनीय संघर्ष करना होगा।
-नीरज कुमार दुबे