By नीरज कुमार दुबे | Oct 17, 2026
राहुल गांधी राजनीति सही से नहीं कर पा रहे तो उन्होंने कूटनीति में हाथ आजमाना चाहा लेकिन यहां भी उन्हें लेने के देने पड़ गये। दरअसल विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुंबई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से प्रस्तावित मुलाकात को लेकर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा लेकिन जैसा ही कांग्रेस के अतीत का एक वाकया सामने आया वैसे ही विपक्ष के नेता बगलें झांकने लगे। जयशंकर के मुंबई में विदेशी मेहमानों से मिलने पर सवाल उठाने से पहले राहुल गांधी शायद यह भूल गए कि उनकी पार्टी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के दौरान तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी जयपुर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की मेजबानी की थी। तब विदेशी मेहमानों से मुलाकात के लिए दिल्ली के बजाय किसी दूसरे शहर को चुनने पर कांग्रेस को कोई असहजता नहीं थी। ऐसे में सवाल उठता है कि जो तरीका कांग्रेस की सरकार में स्वीकार्य था, वही आज मोदी सरकार के समय राजनीतिक हमले का मुद्दा कैसे बन गया?
दरअसल, विवाद तब शुरू हुआ, जब राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट कर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि रुबियो ने अपने कर्मचारी को मुंबई बुलाया है और विदेश मंत्रालय के अधिकारी ही इस मुलाकात को लेकर असमंजस में हैं। राहुल ने प्रधानमंत्री से पूरे मामले पर सफाई देने की मांग की और यहां तक कह दिया कि जरूरत पड़े तो वह खुद भी इसे समझा सकते हैं। इससे पहले अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के रुबियो और जयशंकर की मुंबई में प्रस्तावित मुलाकात की जानकारी देने पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए थे।
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वहीं राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि विदेशी नेताओं और मंत्रियों की मेजबानी दिल्ली के बजाय दूसरे शहरों में करना कोई नई बात नहीं है। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पिछले कई वर्षों से भारत में यह परंपरा जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्पेन के प्रधानमंत्री से वडोदरा और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज से अहमदाबाद में मुलाकात कर चुके हैं। मॉरीशस के प्रधानमंत्री की मेजबानी वाराणसी में हुई, जबकि विदेश मंत्रियों की बैठक गोवा और ‘हार्ट ऑफ एशिया’ सम्मेलन अमृतसर में आयोजित किया गया। इतना ही नहीं, गुजरात के केवड़िया में बोत्सवाना के विदेश मंत्री का भी स्वागत किया गया था।
देखा जाये तो कांग्रेस के लिए सबसे असहज करने वाला उदाहरण मार्च 2013 का है। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी और सलमान खुर्शीद विदेश मंत्री थे। नौ मार्च 2013 को उन्होंने जयपुर के रामबाग पैलेस होटल में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ के लिए दोपहर के भोज की मेजबानी की थी। दरअसल, अशरफ भारत की एक दिवसीय निजी यात्रा पर अजमेर शरीफ दरगाह में जियारत करने आए थे।
उस समय सरकार ने स्पष्ट किया था कि इस मुलाकात में किसी ठोस द्विपक्षीय मुद्दे पर बातचीत का कार्यक्रम नहीं था। इसे सीमित भागीदारी वाला ‘वर्किंग लंच’ बताया गया था। विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता ने यह भी कहा था कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश के नेता हैं और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध हैं। यानी, कांग्रेस सरकार के समय भी एक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मेजबानी दिल्ली के बजाय जयपुर में हुई थी, भले ही यात्रा निजी धार्मिक उद्देश्य से जुड़ी थी और औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता प्रस्तावित नहीं थी। इस ऐतिहासिक तथ्य को नजरअंदाज करके मुंबई में जयशंकर की कूटनीतिक मुलाकात पर सवाल उठाना कांग्रेस के तर्कों को कमजोर करता है।
देखा जाये तो विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषय पर सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन सवाल तथ्यों के आधार पर होने चाहिए, न कि हर सरकारी कदम को संदेह के घेरे में खड़ा करने के लिए। किसी विदेशी नेता या मंत्री से दिल्ली के बाहर मुलाकात होना अपने आप में न तो असामान्य है और न ही किसी तरह की कूटनीतिक कमजोरी का प्रमाण। साथ ही राहुल गांधी को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि यदि जयपुर में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मेजबानी कांग्रेस सरकार के लिए सामान्य राजनयिक व्यवहार था, तो मुंबई में अमेरिकी विदेश मंत्री से बातचीत को लेकर इतना हंगामा क्यों हो रहा है? आखिर कूटनीति का मूल्यांकन मुलाकात के स्थान से होगा या उसके उद्देश्य, एजेंडे और परिणामों से?
बहरहाल, राजनीतिक बयानबाजी से सुर्खियां जरूर बटोरी जा सकती हैं, लेकिन विदेश नीति पर गंभीर बहस के लिए तथ्यों और निरंतरता को समझना जरूरी है। राहुल गांधी को जयशंकर पर सवाल उठाने से पहले अपनी ही पार्टी के शासनकाल का रिकॉर्ड देखना चाहिए। राहुल गांधी को समझना होगा कि लोकतंत्र में जवाबदेही सबकी होती है सत्ता पक्ष की भी और विपक्ष की भी।
-नीरज कुमार दुबे