इंदिरा गांधी की राह पर राहुल, अब दक्षिण की तरफ आजमा रहें किस्मत

By अभिनय आकाश | Apr 01, 2019

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी परंपरागत सीट अमेठी के अलावा केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ेंगे। इसकी घोषणा के साथ ही देश भर में सियासी गहमा-गहमी तेज हो गई है। जहां इस एलान के बाद अमित शाह ने चुनावी रैली में इस निर्णय पर निशाना साधते हुए कहा कि राहुल गांधी केरल भाग गए हैं क्योंकि उन्हें डर है अमेठी के मतदाता उनसे हिसाब मांगेंगे। वहीं भाकपा के नेता डी राजा ने भी कांग्रेस के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसका कोई मतलब नहीं है। राहुल के वायनाड से चुनाव लड़ने के फैसले के बाद पार्टी प्रवक्ता और राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले रणदीप सुरजेवाला ने उस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि यह दक्षिण भारत के राज्यों को संदेश है कि उन्हें महत्व और सम्मान दिया जाता है। राहुल गांधी ने कहा है कि वह अमेठी का प्रतिनिधित्व करेंगे, लेकिन वह दक्षिणी राज्यों का भी प्रतिनिधित्व करेंगे जो देश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

गांधी परिवार के लिए महफूज रहा है दक्षिण भारत

साल 1978 जब इंदिरा गांधी ने अपनी राजनीतिक वापसी के अभियान के तहत कर्नाटक के चिकमंगलूर से उपचुनाव लड़ने का फैसला किया और तब ‘एक शेरनी,  सौ लंगूर;  चिकमंगलूर, चिकमंगलूर’ का यह नारा अपने निहित राजनीतिक संदेश के कारण एक सदाबहार नारा बना था। जिसके दो साल बाद हुए आम चुनाव में इंदिरा गांधी कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लाने में सफल हुई थीं, तब उन्होंने आंध्र प्रदेश में मेडक और उत्तर प्रदेश में रायबरेली की सीटें जीती थीं। साल 1999 जब धरातल पर जा चुकी कांग्रेस को फिर से एकजुट करने की कवायद के साथ सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभालते हुए कर्नाटक के बेल्लारी में भाजपा की सुषमा स्वराज को हराने के साथ ही अमेठी सीट भी जीती थी। 

सीट का समीकरण क्या कहता है? 

राहुल के इस कदम को केरल में 20 लोकसभा सीटों पर अपने चुनावी आधार को मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है जहां वो लगातार मजबूत होती भाजपा को रोकना चाहती है। वायनाड में हिंदुओं की आबादी 49.48 प्रतिशत है वहीं मुस्लिम 28.65 प्रतिशत व ईसाई 21.34 प्रतिशत हैं। राहुल के वायनाड से चुनाव लड़ने के असर केरल के साथ ही तमिलनाडु और कर्नाटक की सीटों पर भी पड़ेगा।  बता दें कि तमिलनाडु में 39 लोकसभा सीटें और कर्नाटक में 28 सीटें हैं। 

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वायनाड ही क्यों चुना ?

राहुल के लिए अमेठी के अलावा दूसरी सीट के रुप में वायनाड ही क्यों चुना गया?  इसकी वजह जीत की गारंटी भी है। दरअसल, ये सीट कांग्रेस के लिए गढ़ की तरह मानी जाती है। 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आए केरल की वायनाड सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। एमआई शनवास दो बार से यहां के सांसद हैं और भाजपा यहां दौड़ में नहीं है। 2014 में एमआई शनवास ने सीपीआई को हराकर इस सीट पर पहली बार जीत दर्ज की थी। उन्हें तीन लाख 77 हजार 35 वोट मिले थे, जबकि भाकपा नेता सत्यान मोकेरी को तीन लाख 56 हजार 165 वोट हासिल हुए थे। 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस को इस सीट पर 41.21 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। हालांकि भाकपा ने भी 39 प्रतिशत वोट पाकर कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी थी। जबकि भाजपा को महज 9 प्रतिशत वोट मिले थे। 

पहले भी नेता एक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ते रहे हैं

साल 1957 में अटल बिहारी वाजपेयी ने बलरामपुर, मथुरा और लखनऊ की सीट से चुनाव लड़ा रहा था। 1980 में इंदिरा गांधी मेडक और रायबरेली दो जगहों से चुनावी रण में उतरी थीं। 1991 में लाल कृष्ण आडवाणी ने नई दिल्ली और गुजरात के गांधी नगर की सीट से हुंकार भरी थी। 1999 के आम चुनाव में सोनिया गांधी ने बेल्लारी और अमेठी से चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की थी। 2009 के चुनाव में अखिलेश यादव ने भी उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटें फिरोजाबाद और कन्नौज से चुनाव लड़ा था तो वहीं 2009 के ही चुनाव में लालू प्रसाद यादव सारण और पाटलिपुत्र की सीट से चुनावी रण में उतरे थे। साल 2014 में मुलायम सिंह यादव ने आजमगढ़ और मैनपुरी से चुनाव लड़ते हुए जीत दर्ज की थी। 2014 में ही नरेंद्र मोदी ने गुजरात के वडोदरा के साथ ही उत्तर प्रदेश के वाराणसी से चुनावी उद्घोष किया था।

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