Prabhasakshi NewsRoom: Rahul Gandhi का ‘हाइड्रोजन बम’ निकला फुलझड़ी, बार-बार चुनाव आयोग पर हमले से गर्माई सियासत

By नीरज कुमार दुबे | Sep 18, 2025

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने दावा किया कि आयोग चुनावी गड़बड़ियों को छिपाने में मदद कर रहा है और करोड़ों वोटरों के नाम जानबूझकर हटाए जा रहे हैं। उन्होंने इसे भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने की साजिश बताते हुए कहा कि उनके पास इसका "ब्लैक एंड व्हाइट" सबूत मौजूद है।

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हम आपको यह भी बता दें कि राहुल गांधी के आरोपों पर निर्वाचन आयोग पहले भी कहता रहा है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों की शिकायतें मिलने पर नियमित रूप से जाँच की जाती है। वोटरों के नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है और इसमें बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक कई स्तरों पर निगरानी रहती है। आयोग ने यह भी कहा है कि अगर किसी स्तर पर तकनीकी या मानवीय त्रुटि होती है तो उसे समय पर ठीक किया जाता है।

दूसरी ओर, विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी और कांग्रेस अपनी लगातार हार और संगठनात्मक कमजोरी से ध्यान हटाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। दरअसल, पार्टी न तो संगठनात्मक स्तर पर मजबूत दिखाई दे रही है और न ही जनता के बीच कोई वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत कर पा रही है। ऐसे में बार-बार निर्वाचन आयोग, ईवीएम और अब मतदाता सूची पर सवाल खड़े करना यह दर्शाता है कि हार की जिम्मेदारी लेने से बचने के लिए एक "बलि का बकरा" तलाशा जा रहा है।

वहीं, भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वह विदेशी ताकतों के इशारे पर लोकतंत्र की विश्वसनीयता को बदनाम करने का प्रयास कर रही है। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने यहां तक दावा किया कि राहुल गांधी की वेबसाइट पर अपलोड की गई पीडीएफ फाइलों का टाइम ज़ोन म्यांमार का पाया गया, जिससे साफ है कि यह सामग्री भारत में तैयार नहीं की गई। भाजपा ने कहा कि यह विपक्ष द्वारा “वोट चोरी” का नया नैरेटिव गढ़कर जनता को गुमराह करने की कोशिश है।

देखा जाये तो चिंता का विषय यह है कि बार-बार चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की साख पर हमला करने से लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है। लोकतंत्र में हार और जीत दोनों का सम्मान करना जरूरी है। अगर हर चुनाव परिणाम को धांधली बताकर खारिज किया जाएगा तो जनता का भरोसा ही डगमगा जाएगा। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इसे "षड्यंत्रात्मक राजनीति" करार दे रहे हैं, जहाँ संस्थानों की विश्वसनीयता को पद्धतिगत रूप से कमजोर करने की कोशिश की जाती है।

देखा जाये तो राहुल गांधी के हालिया आरोपों से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस अब भी आत्ममंथन की बजाय बाहरी कारणों को दोषी ठहराने की राह पर है। "हाइड्रोजन बम" के नाम पर जनता को उत्सुक करने के बावजूद जब कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया, तो इसने कांग्रेस की गंभीरता पर ही सवाल खड़े कर दिए। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाएँ होती हैं। इन संस्थाओं की गरिमा और विश्वसनीयता को लेकर लगातार बयानबाजी न केवल जनता में अविश्वास पैदा करती है बल्कि विपक्ष की राजनीति को भी नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करती है।

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