Rahul Gandhi की 'धरना-छाप' राजनीति क्या गुल खिलाएगी? LoP छात्रों का वास्तव में भला चाहते हैं या सिर्फ सुर्खियों में जगह चाहते हैं?

By नीरज कुमार दुबे | Aug 21, 2026

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज एक प्रदर्शनकारी छात्र साहिल लोचव को साथ लेकर पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे और आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई के छात्र आंदोलन के दौरान कथित पेलेट गन कार्रवाई में घायल हुए छात्र की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही है। पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के बाद जब राहुल गांधी संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने वहीं धरना शुरू कर दिया और संदेश साफ था, “एफआईआर नहीं, तो धरना जारी रहेगा।”

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धरना देना लोकतंत्र में गलत नहीं है। सरकार और पुलिस के खिलाफ विरोध करना भी विपक्ष का अधिकार है। लेकिन जब देश का नेता प्रतिपक्ष पुलिस स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठकर कहे कि जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, वह नहीं हटेगा, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक दबाव ही अब राहुल गांधी की प्राथमिक रणनीति बन गया है?

यहां मामला और दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि राहुल गांधी जिस घटना को लेकर धरने पर बैठे, वह घटना अब केवल एक छात्र की शिकायत या पुलिस थाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत ने हाल में पुलिस की कथित ज्यादती और बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड समिति गठित करने का फैसला किया है। साथ ही पुलिस अधिकारियों ने राहुल गांधी को यह भी बताया है कि 20 जुलाई की घटना से जुड़े कई मामले दर्ज हैं और उनकी जांच क्राइम ब्रांच तथा स्पेशल सेल को सौंपी गई है।

यानी सवाल यह नहीं है कि साहिल लोचव की शिकायत पर अलग से कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। यदि किसी संज्ञेय अपराध की शिकायत है और कानून के अनुसार एफआईआर बनती है, तो कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए। पीड़ित को न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन सवाल राहुल गांधी की राजनीतिक शैली का है। सवाल उठता है कि क्या लोकसभा में विपक्ष के नेता को यह जानकारी नहीं थी कि मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है? क्या उन्हें नहीं पता था कि घटना की जांच पहले से विभिन्न स्तरों पर चल रही है? और यदि उन्हें यह सब पता था, तो फिर पुलिस स्टेशन के बाहर धरने का राजनीतिक उद्देश्य क्या था?

यहीं से इस पूरी कहानी की जड़ तक जाना जरूरी है। सवाल उठता है कि जंतर-मंतर पर आखिर हुआ क्या था? दरअसल, 20 जुलाई को दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। आंदोलन का आयोजन कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के नेतृत्व में हुआ था और प्रदर्शनकारियों की मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार तथा शिक्षा से जुड़े सवाल प्रमुख थे।

जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। आरोप लगे कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया, लाठीचार्ज किया और पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ। कई वीडियो और तस्वीरों के बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लिया। लेकिन दिल्ली पुलिस का पक्ष बिल्कुल अलग रहा। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि प्रदर्शन अवैध था और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अधिकतम संयम बरता। पुलिस का दावा है कि बल का इस्तेमाल हालात बिगड़ने और हिंसा या अव्यवस्था की स्थिति पैदा होने के बाद किया गया। घटना के दौरान पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी सामने आई थी।

यही वजह है कि इस मामले को केवल एकतरफा राजनीतिक नारे में समेटना आसान नहीं है। यदि छात्रों पर अनावश्यक या अनुपातहीन बल प्रयोग हुआ है तो दोषियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन यदि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिसकर्मी भी घायल हुए, तो जांच में उस पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शायद इसी जटिलता के कारण सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति का महत्व बढ़ जाता है।

इसलिए सवाल उठता है कि ऐसे में राहुल गांधी का धरना क्यों हो रहा है? सवाल उठता है कि क्या यह न्याय के लिए दबाव है, या फिर राजनीतिक दृश्य रचने की कोशिश है? दरअसल, राहुल गांधी की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक पैटर्न दिखाई देता है। मुद्दा उठाइए, सरकार पर सीधा हमला कीजिए और फिर सड़क पर उतरकर उस मुद्दे को राजनीतिक प्रतीक में बदल दीजिए। यह रणनीति विपक्षी राजनीति में असरदार हो सकती है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति से सवाल भी बड़ा होता है। सवाल उठता है कि क्या हर मामले में धरना ही अंतिम राजनीतिक हथियार होना चाहिए?

कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर धरने की राजनीति और अब पुलिस थाने पहुंचकर एफआईआर की मांग पर बैठ जाना...राहुल गांधी की यह छापामार शैली उन्हें सुर्खियां तो दिलाती है, लेकिन क्या इससे उनकी संस्थागत भूमिका कमजोर नहीं पड़ती? संसद में सरकार से जवाब मांगना, दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाना, संसदीय जांच की मांग करना और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करना, ये भी नेता प्रतिपक्ष के उतने ही महत्वपूर्ण हथियार हैं।

इसके अलावा, एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यह छात्रों की राजनीति में राहुल गांधी की अपनी जगह बनाने की कोशिश है? देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक संदर्भ भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी विभिन्न राज्यों में स्कूलों की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की समस्याओं को लेकर अभियान चलाकर लगातार सुर्खियां बटोर रही है। जंतर-मंतर का आंदोलन भी इसी व्यापक छात्र असंतोष का हिस्सा बनकर सामने आया था। ऐसे में राहुल गांधी भी शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि छात्रों की आवाज उठाने वाला सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा वही हैं।

साहिल लोचव के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचना, उनकी चोटों का मुद्दा उठाना और एफआईआर के लिए धरने पर बैठना, यह सब एक मजबूत राजनीतिक दृश्य भी है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को लगने लगा है कि छात्र राजनीति का यह मैदान उनके हाथ से निकल सकता है? क्या कॉकरोच जनता पार्टी के शिक्षा और स्कूलों से जुड़े अभियान ने राहुल गांधी को यह एहसास कराया है कि केवल संसद में भाषण देना काफी नहीं, बल्कि छात्रों के बीच जाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी? या फिर यह राहुल गांधी की उस पुरानी राजनीतिक शैली का विस्तार है, जिसमें वह सत्ता के खिलाफ खुद को सीधे संघर्षरत व्यक्ति के रूप में पेश करना चाहते हैं?

देखा जाये तो राहुल गांधी को छात्रों के साथ खड़े होने का पूरा अधिकार है। पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना भी उनका कर्तव्य है। पेलेट गन के कथित इस्तेमाल की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग भी पूरी तरह वैध राजनीतिक मुद्दा है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष की राजनीति केवल धरने की राजनीति नहीं हो सकती। जब सुप्रीम कोर्ट जांच की प्रक्रिया शुरू कर चुका हो, जब पुलिस के अनुसार संबंधित मामलों की जांच क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल कर रही हो, तब राहुल गांधी को यह भी बताना चाहिए कि उनका धरना जांच को किस तरह आगे बढ़ाएगा। अगर अलग शिकायत पर एफआईआर जरूरी है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत दर्ज कराया जाना चाहिए और उस प्रक्रिया की निगरानी की मांग की जानी चाहिए। लेकिन हर बार कैमरों के सामने धरना देकर राजनीतिक दबाव बनाना एक गंभीर सवाल छोड़ जाता है कि क्या राहुल गांधी व्यवस्था से लड़ रहे हैं, या व्यवस्था से लड़ने का दृश्य तैयार कर रहे हैं?

राहुल गांधी को समझना होगा कि छात्रों की आवाज बनने के लिए केवल पुलिस थाने की सीढ़ियों पर बैठना काफी नहीं। छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, मजबूत स्कूल, जवाबदेह संस्थाएं और ठोस शिक्षा नीति चाहिए। राहुल गांधी चाहें तो वह जो सुधार करना चाहते हैं वह कांग्रेस शासित राज्यों में शुरू करवा सकते हैं। राहुल गांधी को समझना होगा कि धरना तस्वीर बनाता है, लेकिन राजनीति की असली परीक्षा तस्वीर के बाद शुरू होती है।

- नीरज कुमार दुबे

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