By नीरज कुमार दुबे | Oct 14, 2026
भले ही राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में अपने राजनीतिक मार्च को ‘शिव बारात’ कहकर केवल एक उपमा दी हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या भगवान शिव की बारात जैसे पवित्र धार्मिक प्रसंग को राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल करना उचित था? जिस बारात का संबंध देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती के दिव्य विवाह से है, उसे एक राजनीतिक आंदोलन का नाम देते समय क्या उसकी धार्मिक गरिमा और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए था?
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देखा जाये तो यहाँ सवाल केवल एक उपमा का नहीं, बल्कि उस धार्मिक प्रतीक के अर्थ का है जिसे भारतीय समाज में विशेष श्रद्धा के साथ देखा जाता है। राहुल गांधी को शायद पता नहीं कि शिव बारात कोई सामान्य जुलूस नहीं है। शिवपुराण की रुद्रसंहिता के पार्वतीखंड में भगवान शिव की विवाह-यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। अध्याय 40 में शिव की बारात का प्रसंग है। इसके बाद विवाह की तैयारियों, शिव के हिमालय पहुँचने और विवाह-संस्कार का वर्णन आगे के अध्यायों में आता है। अध्याय 48 में पुरोहितों द्वारा तिथि आदि बताए जाने और शुभ समय आने के बाद विवाह-संस्कार प्रारंभ होने का उल्लेख है।
शिव बारात का धार्मिक महत्त्व इसी दिव्य विवाह से जुड़ा है। इसमें शिवगणों, नंदी, देवताओं और ऋषियों की सहभागिता का वर्णन मिलता है। लोकपरंपरा में भूत-प्रेत और विचित्र रूप वाले गणों के चित्रण ने इस बारात को एक विशिष्ट पहचान दी है। यह शिव के उस स्वरूप की याद दिलाता है जो बाहरी रूप, वैभव और सामाजिक प्रतिष्ठा की सीमाओं से परे है। इसीलिए शिव बारात को केवल लोगों की भीड़, नारेबाजी या किसी राजनीतिक आंदोलन के लिए सुविधाजनक उपमा मान लेना श्रद्धालुओं को असहज कर सकता है। धार्मिक प्रतीक की अपनी गरिमा होती है और उसका इस्तेमाल किस संदर्भ में किया जा रहा है, यह महत्त्वपूर्ण है।
साथ ही यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या शिव बारात किसी भी दिन निकल सकती है? देखा जाये तो हिंदू धर्म में धार्मिक पर्व, विवाह-संस्कार और शोभायात्रा के अपने अलग-अलग नियम और परंपराएँ हैं। महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का सबसे प्रमुख पर्व है। इस अवसर पर देशभर में शिव बारात निकाली जाती है और शिव-पार्वती विवाह की झाँकियाँ सजाई जाती हैं। वहीं, शास्त्रोक्त विवाह-संस्कार में तिथि, पंचांग और शुभ मुहूर्त का विशेष महत्त्व होता है। शिवपुराण में भी शिव-पार्वती विवाह के प्रसंग में तिथि और शुभ समय का उल्लेख मिलता है। साथ ही परम्परागत रूप से शिव बारात महाशिवरात्रि के दिन ही निकाली जाती है और देश में शायद ही किसी अन्य दिवसों पर शिव बारात का आयोजन होता हो। सामान्य धार्मिक शोभायात्रा किसी स्थानीय उत्सव या मंदिर की परंपरा के अनुसार अन्य अवसरों पर भी निकाली जा सकती है। इसके विपरीत, यदि आयोजन को विधिवत शिव-विवाह या किसी विशिष्ट पर्व का शास्त्रोक्त अनुष्ठान बताया जा रहा है, तो संबंधित तिथि, पूजा-विधान, मुहूर्त और परंपरा का पालन अपेक्षित है।
साथ ही राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि भगवान शिव की बारात में धक्के मारने या कोहनी से दूसरों को मारने या किसी को कॉलर पकड़ कर पीछे धकेलने की कोई परम्परा नहीं है। शिव बारात में भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का भाव होता है, न कि किसी को धक्का देने या कोहनी मारकर आगे बढ़ने का। भले ही राहुल गांधी की उपमा का उद्देश्य अपने राजनीतिक मार्च को सबके लिए खुला बताना रहा हो, लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए भगवान शिव की बारात जैसे पवित्र प्रसंग को ही क्यों चुना गया? क्या एक राजनीतिक आंदोलन में शामिल भीड़ की तुलना शिव बारात से करना उचित था? और क्या ऐसी तुलना शिव बारात की धार्मिक छवि को एक अनियंत्रित भीड़ के रूप में प्रस्तुत नहीं करती?
बहरहाल, राहुल गांधी के इस बयान ने धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल और सनातन परंपराओं के प्रति संवेदनशीलता को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। देखा जाये तो लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन उस विरोध को व्यक्त करने के लिए करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करते समय उनकी गरिमा का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।
-नीरज कुमार दुबे