By नीरज कुमार दुबे | Jan 12, 2026
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भाषा और पहचान को लेकर विवाद तेज हो गया है। हम आपको बता दें कि तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे के बीच तीखी बयानबाजी सामने आई है। मामला तब गरमाया जब राज ठाकरे ने एक सार्वजनिक रैली में अन्नामलाई को लेकर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए उन्हें रस मलाई कहा और यह सवाल उठाया कि तमिलनाडु से आए व्यक्ति का महाराष्ट्र की राजनीति से क्या लेना देना है।
राज ठाकरे ने इस दौरान पुराने क्षेत्रीय नारों का भी संदर्भ दिया और यह संकेत देने की कोशिश की कि महाराष्ट्र में बाहरी लोगों का दबदबा बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि मुंबई और महाराष्ट्र मराठी लोगों की मेहनत से खड़े हुए हैं और यहां किसी भी तरह की भाषा थोपने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने इसे मराठी अस्मिता का सवाल बताया और मुंबई महानगरपालिका चुनाव को मराठी समाज के लिए निर्णायक बताया। राज ठाकरे ने उठा लुंगी बजा पुंगी नारा भी लगवाया जिससे माहौल गर्मा गया।
इसके जवाब में के. अन्नामलाई ने बेहद आक्रामक और आत्मविश्वास से भरा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अगर मुंबई आने पर उन्हें धमकाया जाएगा या उनके साथ हिंसा की बात की जाएगी तो वह इससे डरने वाले नहीं हैं। उन्होंने साफ कहा कि अगर डर ही उनका स्वभाव होता तो वह सार्वजनिक जीवन में आते ही नहीं। अन्नामलाई ने यह सवाल भी उठाया कि अगर भारत एक है तो फिर किसी नेता को उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय जैसे शब्दों में लोगों को बांटने का अधिकार किसने दिया। उन्होंने कहा कि देश के हर कोने के लोग मुंबई में मेहनत करते हैं और शहर की प्रगति में योगदान देते हैं। इस बयानबाजी के बाद राजनीतिक माहौल और ज्यादा गरमा गया है और यह साफ हो गया है कि चुनावों में भाषा और पहचान एक बड़ा मुद्दा बनने वाला है।
देखा जाये तो राज ठाकरे द्वारा कभी उत्तर भारतीयों तो कभी दक्षिण भारतीयों के खिलाफ दिए जाने वाले बयान कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों में इसके परिणाम अब पहले से कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं। मुंबई जैसे महानगर में राजनीति केवल मराठी बनाम गैर मराठी तक सीमित नहीं रही है। आज यह शहर आर्थिक अवसरों और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है। ऐसे में किसी भी एक समाज को निशाना बनाकर की गई बयानबाजी व्यापक नाराजगी को जन्म दे सकती है।
हम आपको बता दें कि राज ठाकरे की राजनीति लंबे समय से मराठी अस्मिता के इर्द गिर्द घूमती रही है। शुरुआती दौर में इससे उन्हें लाभ भी मिला, लेकिन समय के साथ मुंबई और महाराष्ट्र का सामाजिक ताना बाना बदल चुका है। आज मुंबई में उत्तर भारतीय, गुजराती और मारवाड़ी समाज का बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा है। इसके अलावा मराठी समाज का भी एक महत्वपूर्ण वर्ग अब भाजपा के साथ जुड़ चुका है। ऐसे में जब किसी समाज के खिलाफ आक्रामक और गुंडई की भाषा का प्रयोग किया जाता है तो उसका सीधा फायदा भाजपा को ही मिलता है।
शिवसेना यूबीटी पहले ही विभाजन और संगठनात्मक कमजोरी से जूझ रही है। ऐसे माहौल में अगर उसके सहयोगी या उससे जुड़े नेता किसी एक समुदाय के विरोध में तीखे बयान देते हैं तो पार्टी के लिए राजनीतिक जमीन और सिकुड़ सकती है। मुंबई महानगरपालिका जैसे चुनावों में जहां हर वर्ग का वोट अहम होता है वहां इस तरह की बयानबाजी गैर मराठी मतदाताओं को पूरी तरह दूर कर सकती है और मराठी मतदाताओं का भी एक हिस्सा इससे असहज हो सकता है।
दूसरी ओर के. अन्नामलाई की छवि एक निर्भीक और स्पष्ट बोलने वाले नेता की रही है। अन्नामलाई का राजनीतिक सफर यह संदेश देता है कि राजनीति केवल जाति, भाषा या क्षेत्र के सहारे नहीं बल्कि साहस, विचार और ईमानदारी से भी की जा सकती है। वह युवाओं के लिए इसलिए भी आदर्श बनते हैं क्योंकि वह टकराव से डरते नहीं हैं लेकिन अपनी बात को राष्ट्र की एकता से जोड़कर रखते हैं। आज का युवा मतदाता ऐसे नेतृत्व को पसंद करता है जो आत्मविश्वासी हो और संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर बात करे। अन्नामलाई की भाषा में आत्मरक्षा और आत्मसम्मान का भाव अधिक दिखता है न कि किसी समुदाय के प्रति घृणा। यही कारण है कि उनकी लोकप्रियता युवाओं में बढ़ रही है।
बहरहाल, राज ठाकरे की विभाजनकारी बयानबाजी अल्पकाल में सुर्खियां जरूर बटोर सकती है लेकिन दीर्घकाल में इसके राजनीतिक नुकसान अधिक हैं। वहीं अन्नामलाई जैसे नेता यह संकेत देते हैं कि भविष्य की राजनीति पहचान की दीवारें खड़ी करने से नहीं बल्कि उन्हें तोड़ने से आगे बढ़ेगी। मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति अब उस मोड़ पर है जहां मतदाता भावनाओं से अधिक व्यवहारिकता और समावेशी सोच को महत्व देने लगा है।