Shaurya Path: Rajnath Singh की Vietnam, South Korea Visit ने Asia में बिछाया China विरोधी जाल! चिढ़ गया Dragon

By नीरज कुमार दुबे | May 20, 2026

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की आक्रामक रक्षा कूटनीति का डंका इन दिनों वियतनाम और दक्षिण कोरिया में जोरदार तरीके से बज रहा है। हनोई से सियोल तक भारत की बढ़ती सामरिक सक्रियता ने चीन को बगलें झांकने पर मजबूर कर दिया है। राजनाथ सिंह की इन दोनों देशों की यात्राओं ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि भारत अब केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एशिया में चीन की विस्तारवादी रणनीति को चुनौती देने के लिए मजबूत रक्षा साझेदारियों का नया जाल बिछा रहा है। वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल सौदे, संयुक्त सैन्य उत्पादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम तकनीक में सहयोग तथा दक्षिण कोरिया के साथ रक्षा औद्योगिक साझेदारी ने बीजिंग की चिंता बढ़ा दी है। हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत की यह नई सक्रियता चीन के लिए रणनीतिक दबाव का बड़ा कारण बनती जा रही है।

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भारत और वियतनाम के बीच समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, साइबर सुरक्षा, सैन्य प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम तकनीक में सहयोग के लिए समझौते भी किए। यह दर्शाता है कि संबंध अब केवल हथियार खरीद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भविष्य की युद्ध तकनीकों और सामरिक ढांचे तक पहुंच चुके हैं।

सबसे महत्वपूर्ण पहलू ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर सामने आया। वियतनाम भारत से ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदने में गंभीर रुचि दिखा रहा है। यदि यह सौदा अंतिम रूप लेता है तो फिलीपींस के बाद वियतनाम दक्षिण पूर्व एशिया का दूसरा देश होगा जिसके पास भारत की सुपरसोनिक मिसाइल प्रणाली होगी। यह चीन के लिए सीधी सामरिक चुनौती होगी क्योंकि दक्षिण चीन सागर में चीन की समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने और जवाबी क्षमता मजबूत करने में ब्रह्मोस बेहद प्रभावी मानी जाती है। यही कारण है कि बीजिंग भारत की इस रक्षा कूटनीति को बेहद गंभीरता से देख रहा है।

देखा जाये तो भारत की रक्षा निर्यात नीति अब केवल व्यापार का माध्यम नहीं रह गई है। नई दिल्ली समझ चुकी है कि हथियारों का निर्यात रणनीतिक प्रभाव स्थापित करने का सबसे प्रभावी साधन है। वर्ष 2014 में भारत का रक्षा निर्यात जहां कुछ सौ करोड़ रुपये के स्तर पर था, वहीं अब यह कई हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। ब्रह्मोस मिसाइल इस परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है। फिलीपींस पहले ही इस मिसाइल को खरीद चुका है और उसकी सेना ने इसकी कार्यक्षमता को उत्कृष्ट बताया है। अब इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, दक्षिण अफ्रीका और अन्य देश भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं।

देखा जाये तो भारत केवल हथियार नहीं बेच रहा, बल्कि पूरा सामरिक तंत्र विकसित कर रहा है। वियतनाम की दूरसंचार विश्वविद्यालय, नौसेना अकादमी और वायुसेना महाविद्यालय में भारतीय प्रशिक्षण दल काम कर रहे हैं। न्हा ट्रांग में सेना सॉफ्टवेयर पार्क और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रयोगशाला की स्थापना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। भारतीय सहायता से वियतनामी वायुसेना अधिकारी महाविद्यालय में भाषा प्रयोगशाला स्थापित की गई है। इन पहलों का दीर्घकालिक प्रभाव यह होगा कि वियतनाम की सैन्य संरचना धीरे धीरे भारतीय रक्षा प्रणाली के साथ गहरे स्तर पर जुड़ जाएगी।

इसके अलावा, भारत और वियतनाम अब संयुक्त रूप से सैन्य उपकरणों के उत्पादन पर भी विचार कर रहे हैं। यह कदम चीन के लिए और अधिक चिंता पैदा कर सकता है क्योंकि इसका अर्थ है कि भारत दक्षिण पूर्व एशिया में केवल रक्षा निर्यातक नहीं बल्कि रक्षा औद्योगिक साझेदार के रूप में उभर रहा है। चीन लंबे समय से अपने रक्षा उद्योग और आर्थिक प्रभाव के जरिए क्षेत्रीय दबदबा कायम करने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में भारत का यह नया मॉडल कई देशों को बीजिंग के विकल्प के रूप में नई दिल्ली की ओर आकर्षित कर सकता है।

दूसरी ओर दक्षिण कोरिया यात्रा भी कम महत्वपूर्ण नहीं मानी जा रही। दक्षिण कोरिया की सुरक्षा चिंताएं मुख्य रूप से कोरियाई प्रायद्वीप और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से जुड़ी हैं। सियोल अब ऐसे भरोसेमंद साझेदारों की तलाश में है जो रक्षा उत्पादन और तकनीकी सहयोग में दीर्घकालिक भागीदारी निभा सकें। भारत और दक्षिण कोरिया के बीच रक्षा उद्योग, तकनीकी सहयोग और हिंद प्रशांत रणनीति को लेकर गहरा तालमेल उभर रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दक्षिण कोरिया में रक्षा व्यापार गोलमेज सम्मेलन की अध्यक्षता की और वहां की रक्षा अधिग्रहण एजेंसी के प्रमुखों से भी मुलाकात की।

हम आपको यह भी बता दें कि भारत की पूर्वोन्मुख नीति का सबसे शक्तिशाली प्रदर्शन मेघालय के उमरोई में आयोजित बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास प्रगति में दिखाई दे रहा है। इस अभ्यास में आसियान क्षेत्र के पंद्रह देशों की सेनाएं भाग ले रही हैं। इसके साथ आयोजित रक्षा प्रदर्शनी में भारतीय ड्रोन, निगरानी प्रणाली, संचार उपकरण, स्वचालित समुद्री प्रणाली और सटीक हथियारों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल रक्षा उत्पाद दिखाना नहीं बल्कि एशियाई देशों के साथ स्थायी सैन्य विश्वास बनाना है।

इस तरह, भारत अब एशिया में वही रणनीति अपनाता दिखाई दे रहा है जिसे चीन वर्षों से प्रयोग करता आया है। फर्क केवल इतना है कि भारत खुद को एक ऐसे साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है जिसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा सीमित है और जो सहयोग के बदले राजनीतिक दबाव नहीं बनाता। यही कारण है कि वियतनाम, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और अन्य देश भारत के साथ तेजी से करीब आ रहे हैं। चीन के लिए यह स्थिति इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि अब उसके पड़ोस में भारत एक वैकल्पिक सामरिक धुरी के रूप में उभर रहा है।

बहरहाल, राजनाथ सिंह की हनोई और सियोल यात्राएं सामान्य कूटनीतिक दौरों से कहीं अधिक महत्व रखती हैं। ये यात्राएं इस बात का संकेत हैं कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति बनने की बात नहीं कर रहा, बल्कि वह व्यवहारिक रूप से एशिया की सामरिक राजनीति को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत जिस प्रकार रक्षा सहयोग, सैन्य तकनीक, मिसाइल निर्यात और बहुपक्षीय सैन्य अभ्यासों का जाल बिछा रहा है, उससे आने वाले वर्षों में एशिया का सामरिक समीकरण बदल सकता है।

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