RamKrishna Paramhans Birth Anniversary: रामकृष्ण परमहंस ब्रह्मर्षि, देवर्षि एवं त्रिकालदर्शी थे

By ललित गर्ग | Feb 17, 2024

अंगुलियों पर गिने जाने योग्य कुछ महान् व्यक्तियों को समय-समय पर भारत की रत्नगर्भा वसुंधरा ने पैदा किया, जिनकी आध्यात्मिक चेतना एवं सिद्धियों से समूची दुनिया चमत्कृत होती रही है। जो युग के साथ बहे नहीं, युग को अपने बहाव के साथ ले चले। ऐसे लोग सच्चे जीवन के धनी और जीवन-चैतन्य से ओतप्रोत है। वे स्वयं आगे बढें, जन-जन को बढ़़ाते चलें। ऐसे महापुरुषों-युगपुरुषों-युगांतरकारी सिद्धपुरुषों का जीवन साधनामय होता है और जन-जन को वे साधना की पगडंडी पर ले जाते हैं, प्रकाश स्तंभ की तरह उन्हें जीवन पथ का निर्देशन देते हैं एवं प्रेरणास्रोत बनते हैं। जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व से न सिर्फ स्वयं को प्रतिष्ठित किया वरन् उनके अवतरण से समग्र विश्व मानवता धन्य हुई है। इसी संतपुरुषों, गुरुओं एवं महामनीषियों की शृंखला में एक महापुरुष हैं रामकृष्ण परमहंस।

इसे भी पढ़ें: Baba Amte Death Anniversary: कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए जाने जाते हैं बाबा आमटे, राजकुमारों की तरह बीता था बचपन

यो तो रामकृष्ण के जीवन में अनेक गुरु आये पर अन्तिम गुरुओं का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। जिनमें एक थी भैरवी जिन्होंने उन्हें अपने कापालिक तंत्र की साधना करायी और दूसरे थे श्री तोतापुरी उनके अन्तिम गुरु। गुरु तोतापुरी सिद्ध तांत्रिक तथा हठ योगी थे। उन्होने रामकृष्ण को परमशिव के निराकार रूप के साथ पूर्ण संयोग की दीक्षा दी। पर आजीवन तो उन्होने मां काली की ही आराधना की थी। वे जब भी ध्यान करते तो मां काली उनके ध्यान में आ जाती और वे भावविभोर हो जाते। मां से सीधा उनका साक्षात्कार एवं संवाद होता था। गंगा के तट पर दक्षिणेश्वर के प्रसिद्व मंदिर में रहकर रामकृष्ण मां काली की पूजा किया करते थे।

रामकृष्ण परमहंस के पास जो कोई भी जाता वह उनकी सरलता, निश्चलता, भोलेपन और त्याग से इतना अभिभूत हो जाता कि अपना सारा पांडित्य भूलकर उनके पैरों पर गिर पड़ता था। गहन से गहन दार्शनिक सवालों के जवाब भी वे अपनी सरल भाषा में इस तरह देते कि सुनने वाला तत्काल ही उनका मुरीद हो जाता। इसलिए दुनियाभर की तमाम आधुनिक विद्या, विज्ञान और दर्शनशास्त्र पढ़े महान लोग भी जब दक्षिणेश्वर के इस निरक्षर परमहंस के पास आते तो अपनी सारी विद्वता भूलकर उन्हें अपना गुरु मान लेते थे। उनके शिष्यों की भी लम्बी श्रृंखला है, जिनमें स्वामी विवेकानन्द, दुर्गाचरण नाग, स्वामी अद्भुतानंद, स्वामी ब्रह्मानंदन, स्वामी अद्यतानन्द, स्वामी शिवानन्द, स्वामी प्रेमानन्द, स्वामी योगानन्द थे। ईश्वरचंद्र विद्यासागर, विजयकृष्ण गोस्वामी, केशवचन्द्र सेन जैसे बंगाल के शीर्ष विचारक उनसे प्रेरणा प्राप्त करते थे। उन्होंने खुद एवं अपने शिष्यों के माध्यम से सारा जीवन निःस्वार्थ मानव सेवा के लिये व्यतीत किया, इनके विचारों का न केवल बंगाल के बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के बुद्धिजीवियों पर गहरा सकारात्मक असर पड़ा तथा वे सभी इन्हीं की राह पर चल पड़े। 

रामकृष्ण परमहंस ने भाग्य की रेखाएं स्वयं निर्मित करने की जागृत प्रेरणा दी। स्वयं की अनन्त शक्तियों पर भरोसा और आस्था जागृत की। अध्यात्म और संस्कृति के वे प्रतीकपुरुष हैं। जिन्होंने एक नया जीवन-दर्शन दिया, जीने की कला सिखलाई। इन्होंने सभी धर्मों और जातियों की एकता तथा समानता हेतु जीवनभर कार्य किया, परिणामस्वरूप इन्हें राम-कृष्ण नाम सर्व साधारण द्वारा दिया गया एवं इनके उदार विचार एवं व्यापक सोच के प्रति सभी समभाव रखते थे इसी कारण उन्हें परमहंस की उपाधि प्राप्त हुई। इन्होंने मुस्लिम तथा ईसाई धर्म की भी साधनाएँ की और सभी में एक ही ईश्वर को देखा। परमहंस के भोले प्रयोगवाद में वेदांत, इस्लाम और ईसाइयत सब एक रूप हो गए थे। निरक्षर और पागल तक कहे जाने वाले रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन से दिखाया था कि धर्म किसी मंदिर, गिरजाघर, विचारधारा, ग्रंथ या पंथ का बंधक नहीं है।

श्री रामकृष्ण परमहंस की भक्ति एवं साधना ने हजारों-लाखों को भक्ति-साधना के मार्ग पर अग्रसर किया। उनके जादुई हाथों के स्पर्श ने न जाने कितने व्यक्तियों में नयी चेतना का संचार हुआ, उन जैसे आत्मद्रष्टा ऋषि के उपदेशों का अचिन्त्य प्रभाव असंख्य व्यक्तियों के जीवन पर पड़ा। उनके प्रेरक जीवन ने अनेकों की दिशा का रूपान्तरण किया। उनकी पावन सन्निधि भक्ति, साधना एवं परोपकार की नयी किरणें बिखेरती रही अतः वे साधक ही नहीं, साधकों के महानायक थे। वे ब्रह्मर्षि और देवर्षि थे- साधना-भक्ति के नये-नये प्रयोगों का आविष्कार किया इसलिये ब्रह्मर्षि और ज्ञान का प्रकाश बांटते रहे इसलिये देवर्षि। माँ काली की कृपा से वे त्रिकालदर्शी महापुरुष बन गए थे। 

स्वामी विवेकानंद उनके प्रमुख शिष्य थे, उनके विचारों तथा भावनाओं का स्वामीजी ने सम्पूर्ण विश्व में प्रचार किया तथा हिन्दू सभ्यता तथा संस्कृति की अतुलनीय परम्परा को प्रस्तुत किया। स्वामीजी ने परमहंस जी के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो सम्पूर्ण विश्व में समाज सेवा, शिक्षा, योग, हिन्दू दर्शन पर आधारित कार्यों में संलग्न रहती हैं तथा प्रचार करती हैं, इनका मुख्यालय बेलूर, पश्चिम बंगाल में हैं। रामकृष्ण परमहंस, ठाकुर नाम से जाने जाने लगे थे, बंगाली में ठाकुर शब्द का अभिप्राय ईश्वर होता हैं, सभी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगे थे। उन्होंने स्वयं ही प्रेरक जीवन नहीं जीया, लोकजीवन को ऊंचा उठाने का जो हिमालयी प्रयत्न किया है, वह भी अद्भुत एवं विस्मयकारी है। ऐसे दिव्य संतपुरुष की नया भारत-सशक्त भारत में महत्वपूर्ण भूमिका है। उनके जन्म दिवस श्रद्धासुमन समर्पित है।

- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार

प्रमुख खबरें

French Open 2026: World No. 1 Aryna Sabalenka का तूफानी आगाज, पहले दौर में प्रतिद्वंद्वी को रौंदा।

IPL 2026 विवादों के बाद दबाव में Arshdeep Singh? Instagram से 200 से ज्यादा पोस्ट हटाए

Lionel Messi की Hamstring Injury पर बड़ा Update, World Cup से पहले 10 दिन का मिला Rest

Manchester United में छिड़ी कप्तानों की जंग, Roy Keane और Bruno Fernandes सरेआम भिड़े