Gyan Ganga: रामचरितमानस- जानिये भाग-18 में क्या क्या हुआ

By आरएन तिवारी | May 09, 2025

श्री रामचन्द्राय नम:

मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।

श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये

ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥

गोस्वामी जी अब रामचरित मानस का स्वरूप और उसके महात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं ----

मानस का रूप और माहात्म्य 


जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।

अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु॥

यह रामचरित मानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतु से जगत में इसका प्रचार हुआ, अब वही सब कथा मैं श्री उमा-महेश्वर का स्मरण करके कहता हूँ॥

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥

करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥

श्री शिवजी की कृपा से उसके हृदय में सुंदर बुद्धि का विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्री रामचरित मानस का कवि हुआ। अपनी बुद्धि के अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है, किन्तु फिर भी हे सज्जनो! सुंदर चित्त से सुनकर इसे आप सुधार लीजिए॥

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सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥

बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी॥

सुंदर बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं। वे श्री रामजी के सुयश रूपी सुंदर, मधुर, मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा करते हैं॥

लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥

प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥

सगुण लीला का जो विस्तार से वर्णन करते हैं, वही राम सुयश रूपी जल की निर्मलता है, जो मल का नाश करती है और जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुंदर शीतलता है॥

सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥

मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥

भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥

वह जल सत्कर्म रूपी धान के लिए हितकर है और श्री रामजी के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धि रूपी पृथ्वी पर गिरा और सिमटकर सुहावने कान रूपी मार्ग से चला और मानस रूपी श्रेष्ठ स्थान में भरकर वहीं स्थिर हो गया। वही पुराना होकर सुंदर, रुचिकर, शीतल और सुखदाई हो गया॥

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।

तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।

इस कथा में बुद्धि से विचारकर जो चार अत्यन्त सुंदर और उत्तम संवाद भुशुण्डि-गरुड़, शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज और तुलसीदास और संत रचे हैं, वही इस पवित्र और सुंदर सरोवर के चार मनोहर घाट हैं॥

सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥

रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा॥

सात काण्ड ही इस मानस सरोवर की सुंदर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञान रूपी नेत्रों से देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। श्री रघुनाथजी की निर्गुण और निर्बाध महिमा का जो वर्णन किया जाएगा, वही इस सुंदर जल की अथाह गहराई है॥

राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम॥

पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई॥

श्री रामचन्द्रजी और सीताजी का यश अमृत के समान जल है। इसमें जो उपमाएँ दी गई हैं, वही तरंगों का मनोहर विलास है। सुंदर चौपाइयाँ ही इसमें घनी फैली हुई पुरइन (कमलिनी) हैं और कविता की युक्तियाँ सुंदर मणि  उत्पन्न करने वाली सुहावनी सीपियाँ हैं॥

छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा॥

अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा॥

जो सुंदर छन्द, सोरठे और दोहे हैं, वही इसमें बहुरंगे कमलों के समूह सुशोभित हैं। अनुपम अर्थ, ऊँचे भाव और सुंदर भाषा ही पराग (पुष्परज), मकरंद (पुष्परस) और सुगंध हैं॥

सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला॥

धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती॥

सत्कर्मों के पुंज भौंरों की सुंदर पंक्तियाँ हैं, ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं। कविता की ध्वनि वक्रोक्ति, गुण और जाति ही अनेकों प्रकार की मनोहर मछलियाँ हैं॥

अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी॥

नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा॥

अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ये चारों, ज्ञान-विज्ञान का विचार के कहना, काव्य के नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्य के प्रसंग- ये सब इस सरोवर के सुंदर जलचर जीव हैं॥

सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जलबिहग समाना॥

संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई॥

सुकृती (पुण्यात्मा) जनों के, साधुओं के और श्री रामनाम के गुणों का गान ही विचित्र जल पक्षियों के समान है। संतों की सभा ही इस सरोवर के चारों ओर की अमराई हैं और श्रद्धा वसन्त ऋतु के समान कही गई है॥

भगति निरूपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥

सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पद रति रस बेद बखाना॥

नाना प्रकार से भक्ति का निरूपण और क्षमा, दया तथा दम इन्द्रिय निग्रह लताओं के मण्डप हैं। मन का निग्रह, यम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, नियम शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्री हरि के चरणों में प्रेम ही इस ज्ञान रूपी फल का रस है। ऐसा वेदों ने कहा है॥

औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा॥

इस रामचरित मानस में और भी जो अनेक प्रसंगों की कथाएँ हैं, वे ही इसमें तोते, कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी हैं॥

पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।

माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥

कथा में जो रोमांच होता है, वही वाटिका, बाग और वन है और जो सुख होता है, वही सुंदर पक्षियों का विहार है। निर्मल मन ही माली है, जो प्रेमरूपी जल से सुंदर नेत्रों द्वारा उनको सींचता रहता है॥

शेष अगले प्रसंग में -------------

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।

सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥

- आरएन तिवारी

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