Gyan Ganga: रावण भले धन-धान्य से परिपूर्ण रहा हो मगर उसे ऐश्वर्य संपन्न नहीं माना जाता

By सुखी भारती | Dec 14, 2023

रावण द्वारा अपने जीवन में ऐश्वर्य व भलाई के क्षेत्र में भी नित नये शिखरों को छुआ हुआ प्रतीत होता है। लेकिन यह सब उन्हीं लोगों को दिखेगा, जो रावण को, रावण की ही दृष्टि से देखते हैं। अगर आप गोस्वामी श्रीतुलसीदास जी के विराट अध्यन से देखना चाहेंगे, तो रावण ऐश्वर्य और भलाई के संदर्भ में भी दरिद्र ही रहा।

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आप ऐसा भी कह सकते हैं, कि उसका ऐश्वर्य एक नकली पुष्प की भाँति है। एक ऐसा पुष्प, जो दिखने में तो वास्तविक पुष्प की ही मानिंद है, लेकिन उसके समीप आने पर पता लगता है, कि उसमें न तो सुगंध है, और न ही सच्चा रंग। क्योंकि उस पुष्प को तनिक सी धूप लगेगी, तो उसका रंग व सुगंध ढलते सूर्य की भाँति ही ढल जायेगा। मन को प्रसन्नता देने की बजाय, वह पुष्प उदासी का स्रोत बन जायेगा।

रावण के ऐश्वर्य की इतनी-सी आयु है, कि उसे एक साधारण-सा दिखने वाला वानर अग्नि के हवाले कर, उसे भस्मीभूत करके चला जाता है। वास्तव में रावण का ऐश्वर्य तो उसी दिन ही समाप्त हो गया था, जिस दिन उसने माता सीता जी को मलिन भाव से देखा था। माता सीता के पावन चरण तो हैं ही ऐसे, कि वे जहाँ भी पड़ेंगे, उस स्थान को भक्ति व शक्ति से ओत प्रोत कर देंगे। लेकिन रावण की लंका ही एक ऐसा स्थान था, जहाँ पर मईया ने जब से अपने श्रीचरण रखे थे, तब से लंका वासियों के दृष्टिकोण से वहाँ पर अपशगुन ही अपशगुन हो रहे थे। रावण का पुत्र अक्षय कुमार मारा गया था, लंका अग्नि की भेंट चढ़ गई थी। ऐसे में तो हमें यह सोचना चाहिए था, कि माता सीता के लंका में चरण डालते ही, रावण की लंका का ऐश्वर्य ओर चार गुणा बढ़ जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा होता नहीं है। कारण यह कि नकली स्वर्ण तभी तक असली के भाव दिखता व बिकता है, जब तक उसे असली स्वर्ण की भाँति कसोटी पर कसा नहीं गया। असली स्वर्ण के समक्ष आते ही वह नकली स्वर्ण का मूल्य सवाह हो जाता है। ठीक इसी प्रकार से लंका का नकली ऐश्वर्य तभी तक था, जब तक माता सीता जी के पावन श्रीचरणों का ऐश्वर्य वहाँ विद्यमान नहीं हुआ था।

हम भलाई की चर्चा करें, तो रावण के चरित्र में भलाई भी नहीं थी। हाँ लंका में रहने वाले राक्षस भले ही यह मानते हों, कि रावण से श्रेष्ठ बंदा तो इस धरा पर है ही नहीं है। कारण कि रावण को जब लंका प्राप्त हुई, तो लंका बहुत भव्य व विराट क्षेत्र में फैली हुई थी। रावण ने अपने सभी राक्षसों को खुला निमंत्रण दिया था, कि जिसे जो भी महल अथवा कक्ष पसंद हो, वह उसकी और अपना इशारा भर करे, वह मैं उसी क्षण उसे दे दूंगा। बस फिर क्या था, रावण ने सबको मन चाहे महल दिये। ऐसे में कौन ऐसा राक्षस होगा, जो रावण को बुरा कहेगा? हर कोई उसकी भलाई के गान गाता था। लेकिन यह स्तुतियां व गान तब तक ही चले, जब तक श्रीहुनमान जी ने लंका को दहन नहीं किया। जो राक्षस, रावण पर अपनी जान छिड़कते थे, वही राक्षस सोच में पड़ गए, कि जब रावण का अपना महल ही सुरक्षित नहीं है, तो हमारा क्या होगा?

कुछ समय के पश्चात जब श्रीअंगद जी भी लंका में धमाल मचाकर वापिस लौटे, तो सभी राक्षस भीतर ही भीतर, रावण से चिढ़ने लगे, कि हो ना हो! लंकेश हमारी पीढ़ियां इसी पखवाड़े में समाप्त करवा कर छोड़ेगा।

सोच कर देखिए, रावण को भलाई भी मिली, लेकिन उसकी आयु थी ही कितनी? वहीं श्रीराम जी की भलाई देखिए। उन्हें इस मायावी संसार से दैहिक रूप से विदा हुए, हज़ारों वर्ष बीत गए, लेकिन आज भी उनकी भलाई का अंत नहीं है।

कहने का तात्पर्य, कि संसार में यह पाँचों गुण (बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, ऐश्वर्य एवं भलाई), वास्तव में उसे ही प्राप्त होते हैं, जिसे संतों का सतसंग प्राप्त होता है। नहीं तो इसके इलावा, अगर किसी व्यक्ति के पास यह पाँचों रत्न दृष्टिपात हों, वह व्यक्ति सतसंग में भी रमा न हो, मान कर चलिए, कि वह रावण की भाँति भ्रम में ही है, कि वह इन पाँचों गुणों का स्वामी है---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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