काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-4

By विजय कुमार | May 12, 2021

मुनिवर नारद ने सुनी, जब ये सारी बात

नारायण गुण गात, सपत्नी शीश नवाया

शैलराज ने आदर सहित उन्हें बैठाया।

कह ‘प्रशांत’ फिर कन्या को चरणों में डाला

सब गुण दोष बताओ हे सर्वज्ञ त्रिकाला।।41।।

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उमा भवानी-अम्बिका, होंगे इसके नाम

पाया अचल सुहाग है, और सकल गुणधाम।

और सकल गुणधाम, बढ़ेगी कीर्ति तुम्हारी

इनको पूजेंगी महिलाएं पतिव्रत धारी।

कह ‘प्रशांत’ लेकिन पति होगा जोगी-नंगा

वेष अमंगल, गले सर्प सिर धारे गंगा।।42।।

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नारद की वाणी सुनी, हुए व्यथित हिमवान

मैना चक्कर खा गिरी, बोली हे भगवान।

बोली हे भगवान, उमा लेकिन हर्षाई

पुनः बनूंगी शंकर की पत्नी सुखदाई।

कह ‘प्रशांत’ जो माथे पर लिख गये विधाता

चाहे कोई लाख, नहीं पर मेटा जाता।।43।।

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जो लक्षण मैंने कहे, वे हैं शिव के साथ

नारदजी बोले सुनो, वही उमा के नाथ।

वही उमा के नाथ, दोष गुण बन जाते हैं

जब समर्थ जन उनको धारण कर लेते हैं।

कह ‘प्रशांत’ वह मूर्खराज पागल कहलाता

सूरज आग और गंगा में दोष बताता।।44।।

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होते शीघ्र प्रसन्न हैं, भोलेनाथ महेश

पार्वती तुम तप करो, होंगे दूर कलेस।

होंगे दूर कलेस, सुनो हे पर्वत राजा

होगा सब कल्याण, न दुख का कोई काजा।

कह ‘प्रशांत’ नारदजी चले ब्रह्म के लोका

दे करके आशीष मिटे जिससे सब सोका।।45।।

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मैना ने एकांत में, कहा सुनो हे नाथ

उत्तम वर होगा अगर, तब सौंपेंगे हाथ।

तब सौंपेंगे हाथ, उमा मुझको अति प्यारी

दुख पाने से है अच्छा वह रहे कुंवारी।

कह ‘प्रशांत’ सब शुभ होगा बोले हिमवाना

कहो उमा से करे तपस्या शिव भगवाना।।46।।

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उमा तपस्या को चली, शीश झुका मां-बाप

सभी कुटुम्बी हैं दुखी, लेकिन हैं चुपचाप।

लेकिन हैं चुपचाप, घने वन को अपनाया

सब भोगों को त्याग, ध्यान शिव-चरण लगाया।

कह ‘प्रशांत’ फल मूल हवा जल-पत्ते खाकर

हुआ ‘अपर्णा’ नाम हजारों वर्ष बिताकर।।47।।

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सुनो कुमारी शैलजा, वाणी हुई अकाश

सफल तुम्हारा तप हुआ, जाओ पितृ निवास।

जाओ पितृ निवास, पुरानी यादें जागी

सती हुई जब भस्म, बने शंकर बैरागी।

कह ‘प्रशांत’ श्री रामचंद्र जगती में आये

करो उमा से फिर विवाह, उनको समझाए।।48।

-

भोले बाबा ने रखी, सिर पर उनकी बात

प्रगट हुए ऋषिगण वहां, जो थे पूरे सात।

जो थे पूरे सात, उमा हमको समझाओ

किसकी खातिर है कठोर तप, भेद बताओ।

कह ‘प्रशांत’ नारद ने मुझे बताया मुनिवर

जनम-जनम में मेरे पति होंगे शिव शंकर।।48।।

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सारे मुनि बोले बिहंस, छोड़ो ये खटराग

उसे वरोगी तो सुनो, फूटेंगे तव भाग।

फूटेंगे तव भाग, तुम्हें हम मिलवाते हैं

सुंदर गुणी सुशील, वेद लीला गाते हैं।

कह ‘प्रशांत’ पर नहीं डिगी वह शैल कुमारी

शंभू वरूंगी, या आजीवन रहूं कुंवारी।।49।।

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मुनियों की बातें समझ, हो पुलकित हिमवान

उमा बुलाई पितृ गृह, दे आदर-सम्मान।

दे आदर-सम्मान, कहा शंकर को जाकर

पार्वती के मन की पूरी कथा सुनाकर।

कह ‘प्रशांत’ वे सातों ब्रह्मा धाम पधारे

भोले बाबा जय-जय श्री रघुनाथ उचारे।।50।।

- विजय कुमार

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