काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-49

By विजय कुमार | Apr 06, 2022

राघव के आशीष से, हुई थकावट दूर

अभी दंभ में चूर, विकट माया फैलाई

अंधकार का जाल बिछाया, अति दुखदाई।

कह ‘प्रशांत’ हो गयी राक्षसों को अति सुविधा

मगर राम की सेना को थी भारी दुविधा।।41।।

-

देख रामजी ने किया, अग्निबाण संधान

चहुंदिश उजियारा हुआ, जैसे सूर्य समान।

जैसे सूर्य समान, वानरों ने हुंकारा

राक्षस योद्धाओं को पटक-पटक कर मारा।

कह ‘प्रशांत’ जो बचने को कूदे सागर में

सांप-मगर से जीव खा गये उनको क्षण में।।42।।

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भाग गये राक्षस सभी, रिक्त हुआ मैदान

वानर दल भी लौटकर, आया अपने स्थान।

आया अपने स्थान, रामजी ने जब देखा

श्रम से रहित हुए सारे, था दृश्य अनोखा।

कह ‘प्रशांत’ थी रावण को अति चिंता भारी

वानर दल ने उसकी आधी सेना मारी।।43।।

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मंत्रीगण के साथ में, करने लगा विचार

कैसे अब हो पाएगा, सबका बेड़ा पार।

सबका बेड़ा पार, माल्यवंतजी आये

थे रावण के नाना, बात खरी समझाए।

कह ‘प्रशांत’ जबसे तुमने है सिया चुराई

तबसे ही हम सबके ऊपर आफत आयी।।44।।

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रामविमुख होकर नहीं, पा सकते विश्राम

छोड़ जानकी दीजिए, और भजो श्रीराम।

और भजो श्रीराम, क्रोध में रावण बोला

निकल यहां से बूढ़े, करके चेहरा काला।

कह ‘प्रशांत’ यह सुनकर मालवंत ने जाना

इसे मार उद्धार करेंगे कृपानिधाना।।45।।

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मेघनाद ने क्रोध में, भरी प्रबल हुंकार

कल मैं जो कर आऊंगा, देखेगा संसार।

देखेगा संसार, चैन रावण को आया

बड़े प्रेम से उसको गोदी में बैठाया।

कह ‘प्रशांत’ इस चिंतन में हो गया सवेरा

तब तक वानर दल ने दरवाजों को घेरा।।46।।

-

फिर क्या दोनों दल भिड़े, शुरू हो गया युद्ध

मारकाट ऐसी मची, हुए मार्ग अवरुद्ध।

हुए मार्ग अवरुद्ध, मेघनाद सुन आया

राम-लखन हैं कहां, जोर से वह चिल्लाया।

कह ‘प्रशांत’ अंगद-सुग्रीव और हनुमाना

भाई-द्रोही चचा विभीषण सम्मुख आना।।47।।

-

उसके बाणों से मचा, चहुंदिश हाहाकार

वानर सब करने लगे, भारी चीख-पुकार।

भारी चीख-पुकार, बोल राघव जयकारा

बजरंगी ने इक पहाड़ उस पर दे मारा।

कह ‘प्रशांत’ उसने अपनी माया दिखलाई

पहुंच गया आकाश, हो गया हवा-हवाई।।48।।

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नीचे आकर के गया, रघुनंदन की ओर

गाली फिर बकने लगा, उनको बड़ी कठोर।

उनको बड़ी कठोर, रामजी कुछ ना बोले

हथियारों के मेघनाद ने फिर मुंह खोले।

कह ‘प्रशांत’ राघव ने ऐसे बाण चलाये

क्षण में उसके अस्त्र-शस्त्र सब काट गिराये।।49।।

-

फिर उसने माया रची, बरसाए अंगार

बाल पीब-हड्डी सहित, बही खून की धार।

बही खून की धार, धूल फैलाई ऐसे

अंधकार हो गया, अमावस काली जैसे।

कह ‘प्रशांत’ राघव ने भी कौशल दिखलाया

अंधकार छंट गया, कट गयी सारी माया।।50।।

- विजय कुमार

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