काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-50

By विजय कुमार | Apr 13, 2022

लखनलाल यह देखकर, हुए बहुत ही क्रुद्ध

प्रभु से आज्ञा ले चले, वे भी करने युद्ध।

वे भी करने युद्ध, बहुत से बाण चलाये

मेघनाद के प्राण आज संकट में आये।

कह ‘प्रशांत’ फिर वीरघातिनी शक्ति चलायी

लक्ष्मणजी गिर पड़े, मूरछा गहरी आयी।।51।।

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मेघनाद हर्षित हुआ, मन में भरा उछाह

उन्हें ले चले साथ में, थी भारी यह चाह।

थी भारी यह चाह, पास में उनके आया

सबने मिलकर लखनलाल को हाथ लगाया।

कह ‘प्रशांत’ हो गये लक्ष्मण इतने भारी

नहीं उठे, थे शेषनाग के वे अवतारी।।52।।

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तब हनुमत लेकर उन्हें, गये राम के पास

उनकी हालत देखकर, सारे हुए उदास।

सारे हुए उदास, जामवंतजी आये

लंका में सुषेण वैद्य का पता बताए

कह ‘प्रशांत’ हनुमत ने छोटा रूप बनाया

और वैद्य को ला राघव-सम्मुख बैठाया।।53।।

-

वैद्यराज ने देखकर, लक्ष्मणजी का हाल

बोले औषध चाहिए, काम करे तत्काल।

काम करे तत्काल, पवनसुत तुम ही जाओ

जितनी जल्दी हो, बूटी लेकर के आओ।

कह ‘प्रशांत’ ऊंचे पर्वत का नाम बताया

कैसी होगी बूटी, ठीक तरह समझाया।।54।।

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एक गुप्तचर था वहां, धारे नकली वेश

रावण तक पहुंचा दिया, उसने यह संदेश।

उसने यह संदेश, सुना तो रावण चैंका

नहीं हाथ से जाने पाए ऐसा मौका।

कह ‘प्रशांत’ कोई सुंदर भ्रमजाल बिछाएं

जो बजरंगी पर्वत तक ही पहुंच न पाएं।।55।।

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कालनेमि के घर गया, खुद ही राक्षसराज

बतलाया विस्तार से, क्या करना है आज।

क्या करना है आज, कालनेमि तब बोला

जिसने नगर जलाया, तव सिंहासन डोला।

कह ‘प्रशांत’ किसमें ताकत जो रस्ता रोके

बजरंगी है नाम, कौन फिर उनको टोके।।56।।

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रावण बोला क्रोध से, मुंह में लगा लगाम

जो भी बतलाया तुझे, करना होगा काम।

करना होगा काम, कालनेमि उठ धाया

रस्ते में ही उसने आश्रम एक बनाया।

कह ‘प्रशांत’ मरना है तो फिर कैसा डरना

अच्छा ही है रामदूत के हाथों मरना।।57।।

-

हनुमत उतर पड़े वहां, करने को जलपान

कालनेमि करने लगा, राघव का गुणगान।

राघव का गुणगान, स्नान करके तुम आओ

चर्चा करें ज्ञान की, थोड़ा समय बिताओ।

कह ‘प्रशांत’ बजरंगी पहले किये प्रणामा

फिर उस कपटी को पहंुचाया राघव-धामा।।58।।

-

रामकाज करना जिसे, उसे कहां विश्राम

पहुंचे पर्वत शिखर पर, बजरंगी बलधाम।

बजरंगी बलधाम, तलाशा उस बूटी को

समझ न पाए लेकिन उसके रंग-रूप को।

कह ‘प्रशांत’ हनुमंतलाल को गुस्सा आया

बूटी के संग पूरा पर्वतखंड उठाया।।59।।

-

उड़ते-उड़ते ही दिखी, पुरी अयोध्या धाम

भरत वहां बैठे मगन, जपते रघुवर नाम।

जपते रघुवर नाम, दृश्य था बड़ा अनोखा

ऊपर से विशाल काया को जाते देखा।

कह ‘प्रशांत’ वे समझे है ये राक्षस कोई

मारा बाण बिना फल का, देखें क्या होई।।60।।

- विजय कुमार

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