काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-51

By विजय कुमार | Apr 20, 2022

बाण लगा तो गिर पड़े, झट से पवन कुमार

रामनाम उच्चार, मूरछा भारी छाई

भरतलाल ने देखा तो आंखें भर आयीं।

कह ‘प्रशांत’ हे राघव कृपा दास पर कीजे

इन वानर को पहले जैसा ही कर दीजे।।61।।

-

यह सुनते ही उठ गये, पवनपुत्र हनुमान

सारी गाथा जानकर, हुए भरत दुखमान।

हुए भरत दुखमान, बाण पर बैठो मेरे

कुछ ही क्षण में पहुंचोगे तुम सागर तीरे।

कह ‘प्रशांत’ हनुमत ने शीश झुकाया उनको

कृपा आपकी पहुंचा देगी निश्चित मुझको।।62।।

-

आज्ञा लेकर उड़ चले, बजरंगी बलधाम

सागर तट पर सिर झुका, बैठे थे श्रीराम।

बैठे थे श्रीराम, नहीं आये हनुमाना

उठो तात, कह करके रोते कृपा निधाना।

कह ‘प्रशांत’ मेरे कारण हर सुख को त्यागा

तुम सोये हो, जीवित है पर राम अभागा।।63।।

-

बहुत देर करते रहे, राघव वहां विलाप

योद्धा सभी उदास हो, बैठे थे चुपचाप।

बैठे थे चुपचाप, नहीं वापस जाऊंगा

मात सुमित्रा को कैसे मुख दिखलाऊंगा।

कह ‘प्रशांत’ हे लखनलाल अब आंखें खोलो

अपने मुंह से एक बार ‘भैया’ तो बोलो।।64।।

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रात बीतने को चली, अंधियारी सुनसान

तभी शोर सा मच गया, लो आये हनुमान।

लो आये हनुमान, राम ने गले लगाया

वैद्यराज ने बूटी का कमाल दिखलाया।

कह ‘प्रशांत’ उठ गये सुमित्रानंदन ऐसे

गहरी निद्रा से कोई जागा हो जैसे।।65।।

-

एक काम था शेष जो, पूर्ण किये हनुमान

वैद्यराज को ठीक से, पहुंचाया निज स्थान।

पहुंचाया निज स्थान, खबर रावण ने पाई

सुनकर धक्का लगा, बचा अब कौन सहाई।

कह ‘प्रशांत’ था कुंभकरण बस एक सहारा

उसे जगा करके बतलाया किस्सा सारा।।66।।

-

कुंभकरण ने भी कही, सीधी-सच्ची बात

सीता माता का हरण, उचित नहीं था तात।

उचित नहीं था तात, जहां सेवक हनुमाना

गलती भारी हुई, राम को मानव जाना।

कह ‘प्रशांत’ जो बीत गया, उसको बिसराओ

आओ अंतिम बार, गले मेरे लग जाओ।।67।।

-

रावण ने मंगवा लिया, खानपान सामान

खा-पीकर के हो गया, कुंभकरण बलवान।

कुंभकरण बलवान, किले से बाहर आया

अहंकार था इतना, सैन्य नहीं बुलवाया।

कह ‘प्रशांत’ यह देख विभीषण आगे आये

कर प्रणाम, अपने दिल की सब व्यथा बताए।।68।।

-

कुंभकरण ने धैर्य से, सुन ली सारी बात

राक्षस कुलभूषण हुआ, धन्य विभीषण भ्रात।

धन्य विभीषण भ्रात, काल है सिर पर छाया

इसीलिए रावण को समझ नहीं कुछ आया।

कह ‘प्रशांत’ है मुझको आज्ञापालन करना

चाहे जो हो, नहीं मृत्यु से है अब डरना।।69।।

-

उसके हमलों से हुआ, वानर दल हैरान

मारकाट भारी मची, था वह अति बलवान।

था वह अति बलवान, वीर नल-नील गिराये

बजरंगी-सुग्रीव उसे पर डिगा न पाए।

कह ‘प्रशांत’ थे सभी एक दूजे पर भारी

देख रही थी भौचक्की हो सेना सारी।।70।।

- विजय कुमार

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