खेल हारने के कारण (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Nov 22, 2023

पारम्परिक नाटकीयता, भावनाओं के मैदान के बावजूद हार मिली। कथित सर्वश्रेष्ठता की शहनाई खूब बजाई, खूब भुजाएं फड़काई। मगर जैसे जैसे विकट समय आया, मन खट्टा होता गया लेकिन खेल तो खेल होता है। खेल सभी को खेलने का मौक़ा देता है। किसी को जिता देता है किसी को हरा। भावना खिलाड़ी नहीं बन पाती। अब मीडिया और विशेषज्ञ इस बात पर बात कर रहे कि कमी कहां रह गई। क्या, कैसे होना चाहिए था। यह तो पीला होना था हरा क्यूं दिख रहा है। चैनल्स पर समझा दिया जाएगा कि अपनी गलतियों से सबक लेना चाहिए हालांकि सबक तो चैनल्स वाले भी नहीं लेते। संकल्प लेकर घोषणा की जाएगी, चाहे कुछ हो जाए, आसमान का रंग काला हो जाए तो क्या अगला कप विश्वकप, विश्वगुरु ही जीतेंगे।  


प्रेरित करना शुरू कर दिया है कि तैयारी अभी से शुरू कर देनी चाहिए। एक प्रखर विशेषज्ञ ने कहा कि इस मामले में सीधी और स्पष्ट गलती यहां आकर खेलने और जीतने वालों की है। उन्हें सोचना चाहिए था कि वे मेहमान हैं, हमारे यहां पकाया स्वादिष्ट खाना खा रहे हैं। आव भगत में कोई कमी नहीं है। मेज़बान दस बार जीत चुके हैं जिनका आत्मविश्वास पता नहीं कौन से आसमान पर है। उन्हें आदरसहित, सहिष्णु, गरिमामय शैली में इस तरह खेलना चाहिए था कि हार जाएं। लेकिन उन्होंने बड़ी चतुराई से काम लिया। वे सभी तरह की तैयारी कर कर आए थे। उन्होंने शांत और सौम्य रहकर दर्शकों की शुभ या अशुभ कामनाओं की परवाह न करते हुए परिणाम रच दिया। वैसे तो हर जीतने वाला ऐसी ही बातें करता है।

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इसमें पिच की गलती भी है जिसने हमें डिच किया। उसे अपनी मिटटी का साथ देना चाहिए था क्यूंकि वह मिटटी सदियों से हमारी है। हमारी मेहनत और पडोस की नदी के जल से उसे सींचा है। लेकिन पिच तो दोनों टीमों के लिए एक जैसी रही। गेंद हमारे पक्ष में रहती तो बेहतर परिणाम हो सकते थे लेकिन उसने भी फेंकने वाले की उँगलियों के कौशल का साथ दिया। हमारे यहां भविष्य बताने वाले एक से एक धुरंधर हैं, फुटबाल वालों की तरह उनसे बात कर लेते। पूछकर उपाय कर लेते तो टॉस हमारी इच्छानुसार होता, हम निश्चय लेते कि हम पहले क्या करेंगे। लेकिन सुभाग्य ने उनका साथ दिया और अच्छा वक़्त उनके साथ रहा।  


मीडिया और उसके मित्रों ने काफी मदद की। कहते हैं जीवन में उत्साह होना चाहिए लेकिन उन्माद और पागलपन नहीं। लेकिन क्या करें जब हैरान, परेशान होने की आदत हो। दीवानगी पसंद हो, मातम के मौसम में भी। हम तो गालियों से भी हिसाब किताब कर लेते हैं। इस दौरान दूसरी तरह की सब चिंताएं सताना बंद कर देती हैं। हालांकि हमारे प्रसिद्ध लोग भी कहते हैं कि हम खेल देखने जाएं तो हार होती है। इस बार तो वह भी नहीं गए, हां दूसरे महाप्रसिद्ध ज़रूर वहां थे। कहीं हमारा विज्ञापनी जीवन तो वहां प्रवेश नहीं कर गया, उसके साथ लापरवाही भी। दोनों ने मिलकर मस्ती शुरू कर दी होगी। शायद ठीक से नहाए नहीं होंगे। कुछ गलत तो नहीं खा लिया कहीं। हम तो शाकाहारी हैं। खेल को भी जिमीकंद समझते हैं जिसे हमारे से अच्छा कोई नहीं पका सकता। गलत फहमियां भी तो ज़िंदगी का हिस्सा हैं। खैर... खेल तो खेल है। जीतेगा वही जो खेलेगा।   


- संतोष उत्सुक

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